हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मरहूम आयतुल्लाह महफ़ूज़ी ने जवानी को तौबा और अल्लाह की ओर लौटने का सबसे अच्छा अवसर बताते हुए कहा है कि इंसान को अपनी इस्लाह और गुनाहों से तौबा करने के लिए बुढ़ापे का इंतज़ार नहीं करना चाहिए, क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ गुनाहों की जड़ें इंसान के अस्तित्व में मज़बूत होती जाती हैं और दिल पर ग़फ़लत और गुनाह का अंधेरा अधिक छा जाता है।
मरहूम आयतुल्लाह महफ़ूज़ी ने नफ़्स की इस्लाह और तौबा में देरी के नुक़सान की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि जवानी तौबा की बहार है। इस उम्र में गुनाहों का बोझ कम होता है, दिल की गंदगी और अंदर का अंधेरा अपेक्षाकृत कम होता है और तौबा की शर्तों को पूरा करना आसान होता है।
उन्होंने आगे कहा कि बुढ़ापे में इंसान के अंदर लालच और लोभ, पद और प्रतिष्ठा तथा बाहरी सुंदरता की चाहत और लंबी उम्मीदें बढ़ जाती हैं और यह एक आज़माई हुई हक़ीक़त है।
आयतुल्लाह महफ़ूज़ी इंसान को नसीहत करते हुए कहते हैं: ऐ अज़ीज़! जितनी जल्दी हो सके अपनी इस्लाह के लिए कमर कस लो, अपने संकल्प को मज़बूत और अपने इरादे को पक्का करो तथा जवानी में ही या जब तक जीवन बाक़ी है, अपने गुनाहों से तौबा कर लो। अल्लाह की ओर से दिए गए इस अवसर को व्यर्थ न जाने दो और शैतान के वसवसों तथा नफ़्स-ए-अम्मारा के धोखे में न आओ।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि जवानी इंसान के लिए अपनी ज़िंदगी को सँवारने, गुनाहों को छोड़ने और अल्लाह की ओर लौटने का एक क़ीमती अवसर है, जिसे ग़नीमत समझना चाहिए।
स्रोत: किताब ‘इरफ़ान व इबादत’
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