मंगलवार 18 अगस्त 2026 - 10:02
पालने से मस्जिद तक: बच्चों की धार्मिक तरबीयत के तीन महत्वपूर्ण चरण

बच्चे की धार्मिक तरबीयत अचानक या थोड़े समय में पूरी होने वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाला और चरणबद्ध सफर है, जो गर्भावस्था के समय से शुरू होता है और बाद के वर्षों में धार्मिक विश्वासों की नींव मजबूत होने तक जारी रहता है। बच्चे को उसकी उम्र के अनुसार समझदारी के साथ मस्जिद और इबादत के माहौल में ले जाना उसके अंदर शुरुआती लगाव और भावनात्मक जुड़ाव पैदा कर सकता है और आगे चलकर मजबूत धार्मिक विश्वासों के निर्माण का कारण बन सकता है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आज के दौर में जब बच्चों की सोच और संस्कृति पर विभिन्न प्रकार के प्रभाव पड़ रहे हैं, धार्मिक तरबीयत केवल एक सामान्य जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। धार्मिक समाजीकरण की यह प्रक्रिया बच्चे के जन्म से पहले ही शुरू हो जाती है और इसके लिए सही योजना तथा चरणबद्ध तरीके की जरूरत होती है। इसी सिलसिले में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद अलीरज़ा तराशियून ने बच्चों को धार्मिक वातावरण में उद्देश्यपूर्ण तरीके से शामिल करने के उपायों को तीन महत्वपूर्ण चरणों में बताया है, जिन्हें आगे प्रस्तुत किया जा रहा है।

बच्चों को किस उम्र से धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण से परिचित कराना चाहिए, यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। यह लगाव गर्भावस्था के समय से शुरू करना बेहतर है। यानी मां भी उसी समय से धार्मिक वातावरण और इबादत की मजलिसों में शामिल हो।

पालने से मस्जिद तक: बच्चों की धार्मिक तरबीयत के तीन महत्वपूर्ण चरण

बच्चे के जन्म के बाद दूध पीने की उम्र में भी अगर मां धार्मिक माहौल में रहकर हज़रत अबा अब्दिल्लाह हुसैन अलैहिस्सलाम के लिए आंसू बहाती है और अपने बच्चे को दूध पिलाती है, तो वास्तव में वह बरकत और आध्यात्मिकता के साथ दूध बच्चे तक पहुंचाती है। इसका बच्चे के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ सकता है।

इसी तरह जब जमाअत की नमाज़ या जुमा की नमाज़ होती है, तो मां बच्चे को अपने पास रख सकती है, ताकि वह जीवन के शुरुआती वर्षों से ही मस्जिद और इबादत के माहौल से परिचित हो और उसके मन में इन जगहों के प्रति लगाव और अपनापन पैदा हो।

बच्चों को धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण में ले जाने का तरीका हर उम्र के अनुसार अलग होना चाहिए।

बचपन के दौर में

बच्चे अक्सर अपनी इच्छा और उत्साह से माता-पिता के साथ मस्जिद जाते हैं। कभी वे आगे की सफों में या मुकब्बिर के पास खड़े होना चाहते हैं। इस उम्र में बच्चों का खेलना और इधर-उधर हरकत करना स्वाभाविक है। इसलिए नमाज़ पढ़ने वालों को उनके प्रति अधिक धैर्य और सहनशीलता का व्यवहार करना चाहिए।

दूसरा चरण

दूसरा चरण लगभग सात से आठ वर्ष की उम्र के बाद शुरू होता है। इस समय बच्चों के हमउम्र साथियों का प्रभाव बहुत बढ़ जाता है। इसलिए परिवारों को सही योजना बनाकर ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए, जिसमें बच्चे धार्मिक स्थानों पर अपने हमउम्र बच्चों के साथ शामिल हों।

तीसरा चरण

तीसरा चरण बच्चों की धार्मिक और बौद्धिक नींव मजबूत करने का समय है। इस दौरान तौहीद, नुबूवत, इमामत, क़यामत और अल्लाह के इंसाफ जैसे बुनियादी धार्मिक विश्वासों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि ये विश्वास बच्चों के दिल और सोच में मजबूत हो जाएं।

वास्तव में यही मजबूत धार्मिक विश्वास बच्चों के अंदर ऐसा स्थायी उत्साह पैदा करेंगे, जो उन्हें आगे भी धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण में सक्रिय तथा समझदारी के साथ शामिल होने के लिए प्रेरित करेगा।

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