हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, तारा गढ़, अजमेर, भारत के इमामे जुमा मौलाना सय्यद नकी महदी ज़ैदी ने कल नमाज़े जुमा के खुत्बों में कहा कि रबीउल अव्वल का महीना बहुत ही बरकत वाला महीना है, क्योंकि 17 रबीउल अव्वल को रसूले अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) और उनके छठे उत्तराधिकारी हज़रत इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम की विलादत हुई।
उन्होंने कहा कि रसूले ख़ुदा (स) सभी पैगंबरों और तमाम मखलूक में सबसे श्रेष्ठ हैं। इमाम जाफर सादिक (अ) ने भी रसूले अकरम (स) को अल्लाह की तमाम मखलूक का सरदार बताते हुए फरमाया कि अल्लाह तआला ने मुहम्मद (स) से बेहतर कोई मखलूक पैदा नहीं की।
मौलाना नकी महदी ज़ैदी ने एकता सप्ताह की अहमियत बताते हुए कहा कि ये दिन शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच एकता और भाईचारे को मजबूत करने का बेहतरीन अवसर हैं। मतभेदों और आपसी समस्याओं को अल्लाह और रसूल (स) की शिक्षाओं की रोशनी में हल करना चाहिए और मुसलमानों का केंद्र कुरआन, रसूले अकरम (स) और आइम्मा ए मासूमीन (अ) की शिक्षाएं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि अहले सुन्नत 12 रबीउल अव्वल, जबकि अहले तशय्यु 17 रबीउल अव्वल को रसूले अकरम (स) की विलादत का दिन मानते हैं। इसी वजह से इन दोनों तारीखों के बीच के दिनों को "सप्ताहे वहदत" कहा गया, ताकि मुसलमान पैगंबर की विलादत की तारीख के इस मतभेद से ऊपर उठकर एकता और भाईचारे का प्रदर्शन करें।
उन्होंने आगे कहा कि इस्लामी एकता का मतलब अपने अक़ाइद से पीछे हटना नहीं है, बल्कि साझा बातों को आधार बनाकर एक-दूसरे के साथ सहयोग करना है। सभी मुसलमान एक अल्लाह, एक रसूल (स) और एक किबला को मानने वाले हैं।
मौलाना नकी महदी ज़ैदी ने इमाम जाफर सादिक (अ) के मक़ाम और महानता का उल्लेख करते हुए कहा कि इमाम (अ) को अहले सुन्नत के बड़े विद्वानों के बीच भी ऊंचा मक़ाम हासिल है। इमाम अबू हनीफा और इमाम मालिक सहित कई अहले सुन्नत विद्वानों ने आपके ज्ञान, धार्मिक समझ, श्रेष्ठता और इबादत को स्वीकार किया है।
उन्होंने आगे कहा कि इस्लामी एकता केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि इस्लाम की मूल शिक्षाओं में शामिल है। कुरआन मुसलमानों को एकजुट रहने और आपसी फूट से बचने की ताकीद करता है। इसलिए इस्लामी जगत की ताकत और सम्मान के लिए एकता और भाईचारा बेहद जरूरी है।
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