मंगलवार 1 सितंबर 2026 - 21:24
एक पुरअमन और हमआहंग दुनिया के लिए ज़रूरी है कि इंसानियत से मुहब्बत और एहतिराम किया जाए, शेख नाज़िर महदी मुहम्मदी

हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) और हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) के जन्म दिवस के अवसर पर कारगिल में जमीअतुल उलेमा इसना अशरीया कारगिल के ज़ेर-ए-एहतिमाम भव्य जश्न का आयोजन हुआ; जिस में उलमा-ए-किराम समेत मोमिनीन व मोमिनात ने भरपूर शिरकत की।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ख़ातिमुन नबिय्यीन, सैय्यदुल मुरसलीन, रहमतुल लिल आलमीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) और रईस-ए-मकतब-ए-तशय्यु हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) के जन्म दिवस के अवसर पर जमीअतुल उलेमा इसना अशरीया कारगिल (जे.यू.आई.ए.के.एल) लदाख के ज़ेर-ए-एहतिमाम एहाता-ए-हौज़ा-ए-इल्मिया इसना अशरीया कारगिल में एक भव्य जश्न ब-अनवान-ए-जश्न-ए-सादिक़ैन इनअक़ाद किया गया, जिस में उलमा, दानिश्वरों और कसीर तादाद में आशिक़ान-ए-रसूलुल्लाह ने शिरकत की।

इस पुरवक़ार तकरीब में सदर-ए-जमीयतुल उलेमा इसना अशरीया कारगिल, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन शेख नाज़िर महदी मुहम्मदी ने मेहमान-ए-ख़ुसूसी की हैसियत से शिरकत की और सदारत के फ़राइज़ भी अंजाम दिए।

इस मौके पर मेंबर-ए-पार्लियामेंट लदाख हाजी मुहम्मद हनीफ़ा जान और मुतअद्दिद उलमा-ए-किराम व मुआज़्ज़िज़ीन की शिरकत ने अहल-ए-कारगिल की रसूल-ए-रहमत (स) से गहरी वाबस्तगी को नुमायाँ किया।

तकरीब का आग़ाज़ हौज़ा-ए-इल्मिया इसना अशरीया कारगिल के तालिब-ए-इल्म अनवर मुनव्वरी ने तिलावत-ए-क़ुरआन-ए-मजीद से किया। इस के बाद तलबा-ए-हौज़ा-ए-इल्मिया इसना अशरीया कारगिल, जवादिया प्रोजेक्ट केयर, जाफ़रिया अकादमी ऑफ मॉडर्न एजुकेशन कारगिल के तलबा और मआरूफ़ और नन्हे नअत-ख़्वान हज़रात ने उर्दू व बलती ज़बानों में नअत व मन्क़िबत और क़सीदा-ख़्वानी के ज़रिये महफ़िल को रूह-अफ़रोज़ बनाया। इन दिलनशीन कलामों ने सामिईन को रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम की सीरत-ए-तैय्यबा और मक़ाम-ए-रफ़ीअ की याद ताज़ा कर दी।

उलमा ने वलादत-ए-रसूल-ए-अकरम (स) और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की मुबारकबाद पेश की और रसूल-ए-ख़ुदा (स) को इंसानियत के लिए रहमत, अद्ल व इन्साफ़ और हिदायत का मीनार और आप (स) के पैग़ाम-ए-मुहब्बत व वहदत को दुनिया भर के लोगों के लिए रौशन रहनुमाई क़रार दिया।

उलमा ने कहा कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने न सिर्फ़ मज़हबी रहबरी फराहम की, बल्कि इल्म व दानिश की वह बुनियादें रखीं जो आज भी इस्लामी तहज़ीब और इंसानी फ़िक्र के लिए मशअल-ए-राह हैं। आप (अ) ने अक़्ल, इस्तिदलाल और अख़लाक़ीयात को फ़रोग़ देकर उलूम की नई जिहातें मुतआर्रिफ़ कराईं।

अपने सदारती ख़िताब में शेख नाज़िर महदी मुहम्मदी ने कहा कि इस्लाम एक कामिल ज़ाबिता-ए-हयात है जो अम्न व नजात का रास्ता दिखाता है।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक पुरअमन और हमआहंग दुनिया के लिए ज़रूरी है कि इंसानियत से मुहब्बत और एहतिराम किया जाए, यही इक़दार रसूल-ए-ख़ुदा (स) ने अपनी सारी ज़िन्दगी में अमलन पेश कीं।

शेख नाज़िर महदी मुहम्मदी ने मोमिनीन को तल्क़ीन करते हुए कहा कि वह आइम्मा-ए-ताहिरीन अलैहिमुस्सलाम को अपने लिए मशअल-ए-राह क़रार दें और क़ुरआन और अहल-ए-बैत से जुड़े रहें ताकि दुनिया में गुमराही का शिकार न हों और दुनिया और आख़िरत आबाद और पुरसकून हो।

तकरीब का इख़्तिताम इज्तिमाई दुआ पर हुआ, जिस में उम्मत-ए-मुस्लिमा और पूरी इंसानियत के लिए अम्न, इत्तिहाद, तरक़्क़ी और ख़ुशहाली की दुआएँ की गईं और आलम-ए-इस्लाम बिल-ख़ुसूस ईरान, फ़िलिस्तीन, पाराचनार, लुबनान, यमन, बहरीन और दीगर मुल्कों में शियान-ए-अली इब्ने अबी तालिब (अ) और मुसलमानों पर हो रहे ज़ुल्म व सितम, हौज़ात-ए-इल्मिया नजफ़-ए-अशरफ़, क़ुम-ए-मुक़द्दस, मश्हद-ए-मुक़द्दस में अम्न व अमान और मराजे-ए-एज़ाम बिल-ख़ुसूस हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली हुसैनी सिस्तानी और रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी हज़रत आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामनेई की सलामती के लिए ख़ुसूसी दुआएँ की गईं।

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