सोमवार 7 सितंबर 2026 - 22:43
जमात-ए-इस्लामी हिंद का प्रतिनिधिमंडल नेपाल दौरे से वापसी / जमात ने नेपाल के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य करने की योजना बनाई

26 अगस्त को नेपाल के भोटे कोशी-त्रिशूली क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ से प्रभावित इलाकों का जमीनी जायजा लेने के बाद जमात-ए-इस्लामी हिंद का प्रतिनिधिमंडल तीन दिवसीय दौरे से वापस लौट आया है। प्रतिनिधिमंडल ने बाढ़ से तबाह हुए क्षेत्रों का दौरा किया और प्रभावित लोगों तथा स्थानीय जिम्मेदार अधिकारियों से मुलाकात की।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिनिधिमंडल ने इस प्राकृतिक आपदा के कारण पैदा हुई मानवीय जरूरतों का जायजा लिया। प्रतिनिधिमंडल के निरीक्षण और सुझावों के आधार पर जमात-ए-इस्लामी हिंद ने नेपाल में आपातकालीन राहत कार्य शुरू करने की योजना बनाई है।

केंद्र के मीडिया हॉल में आयोजित मासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए जमात-ए-इस्लामी हिंद के राष्ट्रीय सचिव मौलाना शफी मदनी ने कहा कि नेपाल में आई तबाही का दायरा बहुत व्यापक है। इस समय पहली प्राथमिकता प्रभावित परिवारों तक भोजन, चिकित्सा सुविधाएं, साफ पानी और अन्य जरूरी सहायता पहुंचाना है।

उन्होंने कहा कि नेपाल सरकार और उसके संबंधित संस्थान बेहद कठिन परिस्थितियों में असाधारण सेवाएं दे रहे हैं। हालांकि, तबाही की गंभीरता और उसके व्यापक फैलाव के कारण उनके प्रयासों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि राहत और बचाव कार्य अभी भी जारी हैं और प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को जीवित बाहर निकाला जा रहा है।

मौलाना शफी मदनी ने कहा कि एक और महत्वपूर्ण चिंता यह है कि अब तक नेपाल सरकार की ओर से प्रभावित लोगों के लिए मुआवजे के संबंध में कोई घोषणा सामने नहीं आई है। इसलिए जमात-ए-इस्लामी हिंद का मानना है कि इस समय तत्काल ध्यान बचाव और आपातकालीन राहत पर केंद्रित होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि प्रतिनिधिमंडल के जमीनी निरीक्षण के आधार पर जमात-ए-इस्लामी हिंद नेपाल में लागू कानूनी दायरे के भीतर रहते हुए केवल आपातकालीन राहत गतिविधियां ही कर सकती है।

उन्होंने कहा कि जब बचाव कार्य पूरा हो जाएगा तो नुकसान का सही आकलन करना आसान हो जाएगा। इसके बाद प्रभावित आबादी के पुनर्वास और पुनर्निर्माण का काम शुरू किया जा सकता है।

इस अवसर पर जमात-ए-इस्लामी हिंद ने नेपाल सरकार, सुरक्षा संस्थानों, स्थानीय समुदायों और मानवीय सहायता प्रदान करने वाले संगठनों के प्रयासों की सराहना की और कहा कि वह राहत और पुनर्वास के लिए हर संभव सहयोग देने के लिए तैयार है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने संवैधानिक सुरक्षा और कानूनों के बावजूद जाति के आधार पर भेदभाव और अत्याचार जारी रहने पर गहरी चिंता व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के नवीनतम आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। वर्ष 2023 में अनुसूचित जातियों (Scheduled Castes) के खिलाफ 57,789 अपराध दर्ज किए गए, जबकि अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) के खिलाफ अपराधों में भी वृद्धि हुई है।

उन्होंने कहा कि हाल की घटनाएं, जिनमें मध्य प्रदेश में एक दलित छात्र पर हमला और जाति के आधार पर गाली देने की घटना तथा राजस्थान में दो दलित लोगों का अपमान शामिल है, यह दिखाती हैं कि जातिगत भेदभाव आज भी रोजमर्रा की जिंदगी में लोगों के सम्मान और गरिमा को ठेस पहुंचा रहा है।

प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि एससी/एसटी अधिनियम जैसे कानून जरूरी हैं, लेकिन केवल कानून ऐसे सामाजिक व्यवहार को समाप्त नहीं कर सकते, जो अपमान, भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार की अनुमति देता है।

उन्होंने मौजूदा कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने, मामलों के निपटारे में तेजी लाने, पीड़ितों की सुरक्षा और लोगों की मानसिकता में बदलाव के लिए नैतिक तथा शैक्षिक प्रयासों पर जोर दिया। सलीम इंजीनियर ने स्पष्ट किया कि इस्लाम जन्म, जाति, नस्ल या सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी के साथ भी भेदभाव को सख्ती से अस्वीकार करता है और हर इंसान के व्यक्तिगत सम्मान और गरिमा को मान्यता देता है।

मीडिया को जानकारी देते हुए जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष एस. अमीनुल हसन ने एसआईआर और उसके कारण मतदाताओं के अपने मताधिकार से वंचित होने की आशंका पर गहरी चिंता व्यक्त की।

उन्होंने महाराष्ट्र, दिल्ली, तेलंगाना और कर्नाटक में मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबरों की ओर ध्यान दिलाया।

विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि एसआईआर की अपीलीय न्यायाधिकरणों द्वारा निपटाई गई 82,782 अपीलों में से 75,443 नाम, यानी 91 प्रतिशत नाम, दोबारा मतदाता सूचियों में बहाल किए गए हैं।

उन्होंने कहा कि मतदान का अधिकार किसी नागरिक की इस क्षमता पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि वह खुद अपने नाम के हटाए जाने का पता लगाए, जटिल दावा प्रक्रिया से गुजरे और फिर अपील करके अपना नाम दोबारा शामिल कराने में सफल हो।

धार्मिक स्वतंत्रता के संबंध में बात करते हुए एस. अमीनुल हसन ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली कानूनी पाबंदियों और सामाजिक बाधाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक ऐतिहासिक मस्जिद को गिराया जाना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक कलंक है और इससे धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकारों और कानून के शासन की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि इस कार्रवाई के बाद सवाल यह उठता है कि क्या तोड़फोड़ की कार्रवाई के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी स्पष्ट दिशानिर्देशों का पालन किया गया या नहीं?

उन्होंने कहा कि यदि ऐसी किसी इबादतगाह की स्थिति, जो कई दशकों से जनता के इस्तेमाल में रही हो, कुछ मनमाने ढंग से काम करने वाले नेताओं और उनके अधीन अधिकारियों द्वारा तय की जा सकती है, तो ऐसी स्थिति में हमारे राजनीतिक तंत्र की पूरी व्यवस्था और कानून के शासन पर से जनता का विश्वास उठ जाएगा।

एस. अमीनुल हसन ने दिल्ली के साकेत पुलिस थाने में दो मुस्लिम महिला पत्रकारों शाहीन खान और नफीसा खान के साथ हुई हिंसा और दुर्व्यवहार का भी उल्लेख किया और कहा कि किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान को भेदभाव का आधार नहीं बनाया जा सकता।

उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रत्येक नागरिक के लिए अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता को किसी भी प्रकार के दबाव और भय के बिना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

जमात-ए-इस्लामी हिंद की मांग है कि मनमाने अधिकारों के इस्तेमाल के बजाय न्याय, कानूनी प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों को सर्वोच्च स्थान दिया जाना चाहिए।

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