मंगलवार 8 सितंबर 2026 - 16:41
मुसलमानों से एक सवाल; 33 साल बनाम 3 साल, हदीसों में यह अंतर क्यों?

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि की हदीसें हमारे धर्म की महत्वपूर्ण पूंजी हैं। इसलिए इस्लाम के इतिहास को समझने वाले हर व्यक्ति के सामने एक सवाल जरूर आना चाहिए।

लेख: मौलाना सैयद करामत हुसैन शुऊर जाफ़री

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी |

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि की हदीसें हमारे धर्म की महत्वपूर्ण पूंजी हैं। इसलिए इस्लाम के इतिहास को समझने वाले हर व्यक्ति के सामने एक सवाल जरूर आना चाहिए।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने रसूल-ए-खुदा की गोद में आँखें खोलीं, उनके साथ अपना बचपन बिताया और उन्हीं की तरबीयत में पले-बढ़े। बैसत से पहले लगभग 10 साल और बैसत के बाद रसूल अल्लाह की वफ़ात तक लगभग 23 साल उनके साथ रहे। यानी कुल मिलाकर लगभग 33 साल का साथ रहा। रसूल-ए-खुदा की जिंदगी का शायद ही कोई महत्वपूर्ण दौर हो, जिसमें हज़रत अली अलैहिस्सलाम उनके साथ न रहे हों। लेकिन अहले सुन्नत की मशहूर गणना के अनुसार हज़रत अली अलैहिस्सलाम से लगभग 586 हदीसें वर्णित हैं।

अब दूसरी ओर अबू हुरैरा को देखिए। वह लगभग 7 हिजरी में इस्लाम लाए और रसूल अल्लाह की वफ़ात से पहले केवल लगभग तीन साल उनकी संगत में रहे। लेकिन उनसे वर्णित हदीसों की संख्या 5374 बताई जाती है।

मुसलमानों से एक सवाल; 33 साल बनाम 3 साल, हदीसों में यह अंतर क्यों?

तो सवाल बिल्कुल सीधा है:

जिस अली अलैहिस्सलाम ने रसूल अल्लाह के साथ लगभग 33 साल बिताए, उनकी रिवायतें 586; और जो लगभग 3 साल उनके साथ रहे, उनकी रिवायतें 5374? आखिर ऐसा क्यों हुआ?

क्या यह अंतर महज संयोग है? या हमें इतिहास के उन खामोश पन्नों को भी खोलना चाहिए, जहाँ शायद यह तय हुआ कि रसूल अल्लाह के ज्ञान तक पहुँचने वाले बाब-ए-इल्म, अली अलैहिस्सलाम तक उम्मत की पहुँच कितनी रहे? कहीं ऐसा तो नहीं कि ज्ञान का दरवाज़ा हमारे सामने मौजूद था, लेकिन इतिहास के किसी मोड़ पर उस दरवाज़े तक पहुँचने का रास्ता सीमित कर दिया गया?

जबकि रसूल अल्लाह का फरमान है:

“أَنَا مَدِينَةُ الْعِلْمِ، وَعَلِيٌّ بَابُهَا، فَمَنْ أَرَادَ الْمَدِينَةَ فَلْيَأْتِ الْبَابَ मैं ज्ञान का शहर हूँ और अली उसके दरवाज़े हैं। इसलिए जो व्यक्ति शहर में प्रवेश करना चाहता है, उसे दरवाज़े से आना चाहिए।”

संदर्भ:

अल-हाकिम अल-नैसाबूरी, अल-मुस्तद्रक अलस्सहीहैन, किताब मआरिफ़तुस्सहाबा, जिल्द 3, पृष्ठ 137, हदीस 4637।

और यदि यह सब महज संयोग था, तो सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है:

33 साल की संगति से 586 रिवायतें और लगभग 3 साल की संगति से 5374 रिवायतें—क्या इतिहास हमें इस असाधारण अंतर का कोई स्पष्ट कारण पूछने की अनुमति नहीं देता?

यह किसी का अपमान नहीं है और न ही किसी पर आरोप है। यह केवल एक सवाल है, लेकिन ऐसा सवाल जो हमें अपने इतिहास, अपने हदीसी भंडार और रसूल अल्लाह के ज्ञान तक पहुँचने के साधनों को दोबारा देखने पर मजबूर करता है।

आलमे इस्लाम! अब जरा रुककर सोचिए...

यह केवल 586 और 5374 का अंतर नहीं है; यह सवाल है कि रसूल अल्लाह के ज्ञान तक उम्मत किस रास्ते से पहुँची और किस रास्ते से वंचित रही?

अगर बाब-ए-इल्म अली अलैहिस्सलाम हमारे सामने मौजूद थे, तो फिर ज्ञान के इस दरवाज़े तक हमारी पहुँच इतनी सीमित क्यों रही?

क्या यह महज संयोग था या इतिहास के किसी मोड़ पर ज्ञान का रास्ता ही बदल दिया गया?

आलमे इस्लाम! केवल आँकड़ों को मत देखिए; इन आँकड़ों के पीछे छिपे इतिहास को पढ़िए।

और फिर खुद फैसला कीजिए:

यह अंतर केवल रिवायतों का है... या रिवायत के इतिहास का भी?

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