बुधवार 12 अगस्त 2026 - 16:02
बशारत-ए-मुज्तबा (इमाम महदी (अज.) की पहचान और वैश्विक सरकार)

यद्यपि महदवियत के विषय पर इमाम मुज्तबा अलैहिस्सलाम की रिवायतें बहुत सीमित हैं, लेकिन वे अत्यंत विश्वसनीय और मजबूत हैं, क्योंकि वे विशवसनीय शिया स्रोतों में वर्णित हुई हैं और उनमें कोई अजीब या असामान्य बात दिखाई नहीं देती।

लेखक: मौलाना डॉ. आबिद रज़ा, हौज़ा इल्मिया क़ुम

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी

प्रस्तावना

इमाम हसन अलैहिस्सलाम की संक्षिप्त जीवनी

इमाम हसन अलैहिस्सलाम शियाओं के दूसरे इमाम हैं। वे हज़रत अली अलैहिस्सलाम और रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की सुपुत्री के पवित्र वैवाहिक संबंध की पहली संतान थे। आपका जन्म 3 हिजरी में 15 रमज़ान को मदीना मुनव्वरा में हुआ। हसन बिन अली अलैहिस्सलाम अपने नाना रसूले इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के सांसारिक जीवन के केवल कुछ ही वर्ष देख सके, क्योंकि जब पैग़म्बरे इस्लाम की शहादत हुई, उस समय आपकी आयु लगभग सात वर्ष थी। रसूले ख़ुदा के बाद आप लगभग 30 वर्ष तक अपने पिता अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम के साथ रहे। 40 हिजरी में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद आपने 10 वर्षों तक उम्मत की इमामत की ज़िम्मेदारी संभाली और अंततः 50 हिजरी में मुआविया की साज़िश के तहत ज़हर दिए जाने के कारण 48 वर्ष की आयु में, मशहूर कथन के अनुसार 28 सफ़रुल मुज़फ़्फ़र को शहीद हुए और मदीना के कब्रिस्तान ‘बक़ीअ’ में दफ़्न किए गए।

इमाम हसन बिन अली अलैहिस्सलाम का दौर इमाम की ग़ुर्बत तथा धर्म और वली-ए-ख़ुदा के पद और महत्व से उपेक्षा का दौर था। इमाम मुज्तबा अलैहिस्सलाम से वर्णित रिवायतों की अत्यंत सीमित संख्या उस दौर के वैचारिक वातावरण और उस सामाजिक संकट की ओर संकेत करती है, जो बनी उमय्या के प्रभुत्व की शुरुआत और शिया समाज में तीव्र उथल-पुथल तथा बेचैनी के चरम का समय था।

यद्यपि महदवियत के विषय पर इमाम मुज्तबा अलैहिस्सलाम की रिवायतें बहुत सीमित हैं, लेकिन वे अत्यंत विश्वसनीय और मजबूत हैं, क्योंकि वे निशवस्नीय शिया स्रोतों में वर्णित हुई हैं और उनमें कोई अजीब या असामान्य बात दिखाई नहीं देती।

इमाम मुज्तबा अलैहिस्सलाम की सरकार के अंत के साथ ही सुल्तानों और राजाओं की सरकारों का दौर शुरू होता है। शियाओं को ऐसे हालात के लिए तैयार रहना चाहिए, जिनमें अच्छे और बुरे लोग धरती के हर हिस्से में जीवन व्यतीत करते हैं। नेक लोगों को तैयार रहना चाहिए ताकि वे ऐसे हालात में भी अच्छाइयों की रक्षा करें और उनके प्रसार में लगे रहें। मोमिन, अली और हसन अलैहिमस्सलाम की हक़ की सरकारों के दौर में पहरेदारी और संरक्षण में लगा रहता है और बातिल सरकारों के दौर में तक़य्या के माध्यम से स्वयं को सुरक्षित रखते हुए लोगों के प्रशिक्षण तथा ख़ानदाने इस्मत के सत्ता के सिंहासन पर दोबारा लौटने के लिए परिस्थितियां तैयार करने में व्यस्त हो जाना चाहिए।

महदवियत की आवश्यकता

पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की शहादत के बाद समाज को एक ऐसी मजबूत व्यवस्था की आवश्यकता थी, जो क़यामत तक उम्मत का मार्गदर्शन करती रहे। इस विचार के अनुसार रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के बाद इमामत की व्यवस्था समाज के नेतृत्व और मार्गदर्शन की ज़िम्मेदार थी, जो उम्मत को दोबारा जाहिलियत और पिछली बातिल व्यवस्था की ओर लौटने से सुरक्षित रख सके। यही वास्तविकता क़ुरआन मजीद की इस आयत में बयान हुई है:

“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को पूर्ण कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी।”

चूंकि एक विद्वान और सिद्धांतवादी नेता समाज की निगरानी कर रहा था, इसलिए ईश्वरीय धर्म हमेशा सुरक्षित रहता। लेकिन इतिहास ने कुछ और रुख़ अपनाया और इमामत की व्यवस्था को व्यावहारिक क्षेत्र से हटाकर हाशिए पर डाल दिया गया, जिसके कारण वह अपनी वास्तविक ज़िम्मेदारी पूरी नहीं कर सकी। यही कारण था कि इस व्यवस्था के सभी इमाम एक के बाद एक अंतिम इमाम के प्रकट होने की प्रतीक्षा करते रहे, जो अल्लाह की शक्ति से इस व्यवस्था को उसके वास्तविक स्थान पर वापस ले आएंगे। और वह वादा किए गए आले-मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के अलावा कोई और नहीं हैं।

मासूमीन अलैहिमस्सलाम, विशेष रूप से इमाम अली अलैहिस्सलाम, जिन्होंने स्वयं इस्लामी सरकार स्थापित की, की रिवायतें इस वास्तविकता को पूरी तरह स्पष्ट करती हैं। इसलिए मासूमीन, जिनमें इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम भी शामिल हैं, द्वारा इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़ुहूर की आशा और प्रतीक्षा को इसी दृष्टिकोण से देखना चाहिए। अर्थात ऐसे इमाम का ज़ुहूर, जो अल्लाह की शक्ति से सभी रुकावटों को दूर करके इस्लामी व्यवस्था को फिर से समाज का केंद्र बनाएंगे। वे हर प्रकार के राजनीतिक, आर्थिक, आस्थागत, सांस्कृतिक और अन्य प्रकार के विचलन को समाप्त करके पैग़म्बरी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करेंगे और धर्म की पूर्णता तथा नेमत की पूर्णता को व्यावहारिक रूप से लागू करेंगे।

इमाम महदी अलैहिस्सलाम के बारे में इमाम हसन अलैहिस्सलाम के कथन

इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम से कुल 438 रिवायतें वर्णित हुई हैं, जिनमें से 10 रिवायतें हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त कई ऐसी रिवायतें भी मौजूद हैं जो प्रत्यक्ष रूप से नहीं, बल्कि किसी न किसी रूप में इमाम महदी अलैहिस्सलाम से संबंधित हैं, जैसे रजअत के बारे में हदीसें और इमामों से संबंधित सामान्य रिवायतें आदि।

इन 10 रिवायतों में से 6 हदीसें सीधे इमाम हसन अलैहिस्सलाम से वर्णित हैं, 2 रिवायतें इमाम हसन अलैहिस्सलाम के माध्यम से रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम से नकल हुई हैं, एक हदीस इमाम अली अलैहिस्सलाम से वर्णित है और एक हदीस हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम की है, जो इमाम हसन अलैहिस्सलाम की उपस्थिति में बयान हुई।

ये सभी रिवायतें हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़ुहूर, उनके न्याय और इंसाफ़ पर आधारित वैश्विक शासन तथा उनकी शख्सियत के बारे में मूल्यवान जानकारी प्रदान करती हैं।

अ) रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की रिवायतें

1- खुदा की आख़िरी हुज्ज

अब्दुल्लाह बिन हुसैन (हसन) बिन हसन ने अपने पिता से बयान किया है कि इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

एक दिन रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने ख़ुतबा दिया। अल्लाह की हम्द और प्रशंसा के बाद फ़रमाया:

“लोगों! मुझे शीघ्र बुला लिया जाएगा और मुझे उसका उत्तर देना होगा। मैं तुम्हारे बीच दो मूल्यवान चीज़ें छोड़कर जा रहा हूं: अल्लाह की किताब और मेरा इतरत व परिवार। यदि तुम इन दोनों को मजबूती से पकड़े रहोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे। इसलिए उनसे सीखो और उन्हें मत सिखाओ, क्योंकि वे तुमसे अधिक ज्ञान रखते हैं। धरती कभी भी उनसे खाली नहीं रहती, वरना वह अपने निवासियों को नष्ट कर देगी।”

फिर फ़रमाया:

“ऐ अल्लाह! मैं जानता हूं कि ज्ञान कभी समाप्त नहीं होता और न ही मिटता है। तू अपनी धरती को अपनी हुज्जत से खाली नहीं छोड़ता, चाहे वह प्रकट हो और लोग उसका अनुसरण न करें या वह ग़ायब हो, लेकिन हुज्जत बाक़ी रहती है ताकि तेरे औलिया हिदायत से गुमराह न हों। वे संख्या में कम हैं, लेकिन अल्लाह के निकट उनका दर्जा बहुत ऊंचा है।”

जब रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम मिंबर से नीचे उतरे, तो मैंने कहा:

“या रसूलल्लाह! आप सभी मख़लूक़ पर हुज्जत हैं।”

आपने फ़रमाया:

“हसन! अल्लाह का फ़रमान है: ‘तुम केवल डराने वाले हो और हर क़ौम के लिए एक मार्गदर्शक है।’ मैं डराने वाला हूं और अली मार्गदर्शक हैं।”

मैंने अर्ज़ किया:

“या रसूलल्लाह! आपका यह कहना कि ‘धरती कभी हुज्जत से खाली नहीं रहती’, इसका क्या अर्थ है?”

आपने फ़रमाया:

“हां, अली मेरे बाद इमाम और हुज्जत हैं, तुम उनके बाद इमाम और हुज्जत हो, और हुसैन तुम्हारे बाद इमाम और हुज्जत हैं... और अल्लाह हुसैन की संतान से क़ायम को पैदा करेगा, जो अपने समय के अनुयायियों के इमाम और अपने औलिया के उद्धारकर्ता होंगे। वे ग़ैबत में चले जाएंगे, यहां तक कि दिखाई नहीं देंगे। फिर कुछ लोग उनके आदेश से पीछे हट जाएंगे और कुछ लोग डटे रहेंगे और कहेंगे: ‘यदि तुम सच्चे हो तो यह वादा कब पूरा होगा?’”

फिर रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने फ़रमाया:

“यदि दुनिया की आयु में केवल एक दिन बाकी रह जाए, तो अल्लाह उस दिन को इतना लंबा कर देगा कि हमारा क़ायम प्रकट हो जाए। वह धरती को न्याय और इंसाफ़ से भर देगा, जिस प्रकार वह अत्याचार और अन्याय से भर गई होगी। इसलिए धरती तुमसे कभी खाली नहीं रह सकती। अल्लाह ने तुम्हें मेरा ज्ञान और मेरी समझ प्रदान की है और मैंने अल्लाह से प्रार्थना की है कि वह ज्ञान और फ़िक़्ह को मेरी संतानों, मेरी संतानों की संतानों और मेरी नस्लों में जारी रखे।”

अल्लाह की इच्छा यही थी कि वसीयत और इमामत का सिलसिला हुसैन बिन अली अलैहिस्सलाम की संतानों में जारी रहे। अहले-बैत, जो केवल अल्लाह की प्रसन्नता के बारे में सोचते थे, हसन या हुसैन अलैहिमस्सलाम की व्यक्तिगत हस्ती से अलग होकर पूरी निष्ठा के साथ उस हस्ती का समर्थन और अनुसरण करते थे, जिसके नाम पर इमामत की ईश्वरीय मुहर लग चुकी थी।

अहले-बैत अलैहिमस्सलाम से बारह इमाम

ख़ज़ाज़ क़ुम्मी ने हिशाम बिन मुहम्मद से और उन्होंने अपने पिता से रिवायत की है कि जब अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की शहादत हुई तो हसन बिन अली अलैहिस्सलाम मिंबर पर आए। जब बोलने का इरादा किया तो रोते-रोते उनका गला भर आया। कुछ देर बैठे रहे, फिर उठे और फ़रमाया:

“सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है जिसने हम अहले-बैत के लिए उत्तराधिकार को सबसे अच्छे ढंग से निर्धारित किया। हम अपने सबसे अच्छे पिता, रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के वियोग के दुख को अल्लाह के हवाले करते हैं और हम अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम के वियोग के दुख को भी अल्लाह के हवाले करते हैं। उनके शोक में पूर्व और पश्चिम दोनों दुखी हैं... मेरे नाना रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने मुझसे फ़रमाया:

‘यह मामला बारह इमामों के पास रहेगा, जो उनके अहले-बैत और चुने हुए लोगों में से होंगे। हममें से प्रत्येक या तो क़त्ल किया जाएगा या ज़हर दिया जाएगा।’”

ब) इमाम अली अलैहिस्सलाम से वर्णित रिवायत

1- धरती पर न्याय और इंसाफ़ की स्थापना

तबरसी ने ज़ैद बिन वहब जहनी से रिवायत की है कि हसन बिन अली अलैहिमस्सलाम को मदाइन के रास्ते में घायल किया गया। उस समय मैं उनकी सेवा में उपस्थित हुआ, जब वे बहुत अधिक पीड़ा में थे। मैंने अर्ज़ किया:

“ऐ रसूले ख़ुदा के बेटे! क्या आप अपने शियाओं को बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह अकेला छोड़ देंगे?”

आपने फ़रमाया:

“ऐ जहनी भाई! मैं एक ऐसी वास्तविकता जानता हूं जो मेरे लिए स्पष्ट है। अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम ने एक दिन मुझे प्रसन्न देखा तो फ़रमाया: ‘ऐ हसन! तुम उस समय कैसे रहोगे जब अपने पिता को शहीद होते देखोगे? और तुम्हारा क्या हाल होगा जब बनी उमय्या मुसलमानों की सरकार पर क़ब्ज़ा कर लेंगे?’

उनका अमीर ऐसा व्यक्ति होगा जिसका गला और पेट बहुत बड़ा होगा। वह खाता रहेगा और कभी तृप्त नहीं होगा। वह मरेगा तो न आकाश में उसका कोई सहायक होगा और न धरती पर उसके लिए कोई बहाना बाकी रहेगा। वह पूर्व और पश्चिम पर क़ब्ज़ा करेगा। लोग उसकी आज्ञा मानेंगे और उसका शासन लंबा होगा। वह बिदअतें और गुमराहियां पैदा करेगा, सत्य और रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की सुन्नत को मिटा देगा। मुसलमानों के धन को अपने समर्थकों में बांट देगा और हक़दारों को उससे वंचित कर देगा...

यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहेगा, यहां तक कि अल्लाह आख़िरी ज़माने में एक व्यक्ति को भेजेगा, उस कठिन दौर और लोगों की अज्ञानता के समय में। अल्लाह अपने फ़रिश्तों के द्वारा उसकी सहायता करेगा, उसके साथियों को सुरक्षित रखेगा और अपनी निशानियों के द्वारा उसकी मदद करेगा। वह उसे पूरी धरती पर प्रभुत्व प्रदान करेगा, यहां तक कि लोग स्वेच्छा से या मजबूरी में उसकी आज्ञा स्वीकार कर लेंगे।

वह धरती को न्याय, इंसाफ़, प्रकाश और स्पष्ट प्रमाण से भर देगा। दुनिया के पूर्व से पश्चिम तक सभी क्षेत्र उसके अधीन हो जाएंगे। यहां तक कि कोई काफ़िर नहीं बचेगा, सिवाय इसके कि वह ईमान ले आए, और कोई बुराई करने वाला नहीं बचेगा, सिवाय इसके कि वह सुधर जाए। उसके शासन में जंगली जानवर भी आपस में मेल कर लेंगे। धरती अपनी वनस्पतियां उगाएगी, आकाश अपनी बरकतें बरसाएगा और उसके लिए ख़ज़ाने प्रकट हो जाएंगे। वह पूर्व और पश्चिम के बीच चालीस वर्ष तक शासन करेगा। इसलिए धन्य है वह व्यक्ति जो उसके दिनों को पाए और उसकी बातें सुने।”

स) हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम से वर्णित रिवायत

इमाम हादी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम मस्जिदुल हराम में दाख़िल हुए। उस समय वे सलमान फ़ारसी के सहारे चल रहे थे और हसन बिन अली अलैहिमस्सलाम भी उनके साथ थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम मस्जिद में बैठ गए। उसी समय एक सुंदर व्यक्ति, जिसने बहुत अच्छे वस्त्र पहने हुए थे, उनके पास आया और सलाम किया। फिर उसने कहा:

“ऐ अमीरुल मोमिनीन! मैं आपसे तीन चीज़ों के बारे में सवाल करना चाहता हूं। यदि आपने इनके सही उत्तर दे दिए, तो मैं समझ जाऊंगा कि इन लोगों अर्थात शासकों ने ऐसे मामले पर अधिकार कर लिया है, जिसके वे योग्य नहीं हैं और मेरा निर्णय होगा कि ये लोग दुनिया और आख़िरत में सुरक्षित नहीं रहेंगे।”

यह सुनकर अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम ने हसन बिन अली अलैहिमस्सलाम की ओर देखा और फ़रमाया:

“अबू मुहम्मद! तुम उसके प्रश्नों के उत्तर दो।”

जब इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने उसके प्रश्नों के उत्तर दे दिए तो उस व्यक्ति ने कहा:

“मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के अलावा कोई पूज्य नहीं है और... मैं हुसैन अलैहिस्सलाम की संतान में से एक व्यक्ति की गवाही देता हूं, जिसकी न तो कुनियत ली जाएगी और न उसका नाम लिया जाएगा, यहां तक कि उसका मामला प्रकट हो जाए। वह धरती को न्याय और इंसाफ़ से भर देगा, जिस प्रकार वह अत्याचार और अन्याय से भर गई होगी।”

यह सुनकर अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम ने इमाम हसन अलैहिस्सलाम से फ़रमाया:

“अबू मुहम्मद! उसके पीछे जाओ और देखो कि वह कहां जाता है।”

इमाम हसन अलैहिस्सलाम उसके पीछे गए, लेकिन जैसे ही वह व्यक्ति मस्जिद से बाहर निकला, अचानक ग़ायब हो गया। मुझे पता नहीं चल सका कि अल्लाह सुब्हानहु व तआला ने उसे धरती के किस हिस्से में छिपा दिया। मैं वापस आया और अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम को इसकी सूचना दी।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

“अबू मुहम्मद! क्या तुमने उसे पहचान लिया?... वह ख़िज़्र अलैहिस्सलाम थे।”

द) इमाम हसन अलैहिस्सलाम से वर्णित रिवायतें

1- इमाम-ए-ज़माना की विशेषताएं

तबरसी ने अबू सईद उक़ैसा से रिवायत की है कि जब इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने मुआविया के साथ सुलह की तो लोग उनके पास आए और कुछ लोगों ने उन पर आपत्ति की। इस पर इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

“क्या तुम नहीं जानते कि हममें से प्रत्येक के गले में अपने समय के अत्याचारी शासक की बैअत होती है, सिवाय क़ायम के? वही हैं जिनके पीछे रूहुल्लाह, ईसा बिन मरियम अलैहिमस्सलाम नमाज़ पढ़ेंगे। निस्संदेह, अल्लाह उनकी पैदाइश को गुप्त रखेगा और उनकी शख्सियत को ग़ैबत में रखेगा, ताकि जब वे प्रकट हों तो किसी की बैअत का बोझ उनकी गर्दन पर न हो।

वह मेरे भाई हुसैन बिन सय्यदतुल इमाअ की संतान से नौवें होंगे। अल्लाह उनकी ग़ैबत को लंबा करेगा, फिर अपनी शक्ति से उन्हें प्रकट करेगा और उस समय वे चालीस वर्ष से कम आयु के एक युवा के रूप में होंगे। यह इसलिए होगा ताकि लोग जान लें कि निश्चय ही अल्लाह हर चीज़ पर सामर्थ्य रखता है।”

हज़रत महदी अज्जलल्लाहु तआला फ़रजहुश्शरीफ़ की विशेषताओं और गुणों का वर्णन धर्म की दृष्टि में शासक और शासन के मानदंड तथा अपेक्षाओं को स्पष्ट कर सकता है। हालांकि कुछ विशेष बातों की ओर संकेत, जैसे गुप्त जन्म, इमाम का छिपा और अज्ञात रहना, लंबी आयु और उनकी गर्दन पर अत्याचारियों की बैअत का न होना, शिया मानसिकता को एक बिल्कुल अपरिचित और असामान्य परिस्थिति के लिए तैयार करता है। यह ऐसी परिस्थिति है, जिस पर ईमान लाने और ग़ैबत के कठिन वातावरण को सहन करने के लिए तैयार होना एक लंबी प्रक्रिया और पूर्व तैयारी की मांग करता है। इस संबंध में इमामों अलैहिमस्सलाम की व्याख्याएं और ताकीदें इसी संदर्भ में समझी जा सकती हैं।

2- उम्मत के महदी हममें से हैं

इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम, इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम से बयान करते हैं कि इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

“इमामों की संख्या बनी इस्राईल के नक़ीबों के बराबर है और इस उम्मत के महदी हममें से होंगे।”

3- बारह शहीद इमाम

ख़ज़ाज़ क़ुम्मी ने अपनी सनद के साथ जुनादा बिन अबी उमय्या से रिवायत की है:

मैं उस समय इमाम हसन अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित हुआ, जब वे उस बीमारी में थे जिसमें उन्होंने इस दुनिया से प्रस्थान किया। आपके सामने एक तश्त रखा हुआ था। फिर आपने फ़रमाया:

“अल्लाह की क़सम! यह वह वादा है जो रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ने हमसे किया था कि इस मामले अर्थात विलायत को अली अलैहिस्सलाम और फ़ातिमा अलैहस्सलाम की संतान में से बारह इमाम संभालेंगे। हममें से हर एक या तो ज़हर देकर या क़त्ल करके शहीद किया जाएगा।”

4- क़ायम-ए-मुंतज़र

इब्ने हमज़ा ने अली बिन रिआब से रिवायत की है कि इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

एक व्यक्ति इमाम हसन अलैहिस्सलाम की सेवा में आया और पूछा:

“हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम के घटना में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम किस बात को समझने में असमर्थ रहे?”

इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

“सबसे बड़े ख़ज़ाने को पहचानने में।”

फिर आपने उस व्यक्ति के कंधे पर हाथ रखा और फ़रमाया:

“और पूछो!”

इसके बाद आप आगे बढ़े और अचानक दो व्यक्ति एक चट्टान पर दिखाई दिए। वे ज़हरीले धुएं से घिरे हुए थे और उनकी गर्दनों में शैतानी ज़ंजीरें थीं। वे पुकार रहे थे:

“या मुहम्मद! या मुहम्मद!”

और दो शैतान उन्हें जवाब दे रहे थे:

“तुम झूठे हो!”

फिर इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने चट्टान से फ़रमाया:

“उन्हें उस निर्धारित समय तक बंद रखो, जो न पहले आएगा और न देर से आएगा।”

और यही वह समय है जब क़ायम-ए-मुंतज़र, अर्थात इमाम महदी अलैहिस्सलाम का ज़ुहूर होगा।

वह व्यक्ति यह दृश्य देखकर बोला:

“यह तो जादू है!”

फिर वह इस घटना की सूचना लोगों को देने के लिए वापस लौटा, लेकिन अचानक गूंगा हो गया।

5- ग़ैबत के दौर की कठिनाई

ज़ैद बिन वहब से रिवायत है कि उन्होंने कहा:

जब इमाम हसन अलैहिस्सलाम मदाइन में घायल और बीमार थे, तो आपने मुआविया के साथ युद्ध के बारे में कुछ बातें फ़रमाईं। अंत में आपने महदवी सरकार की ओर संकेत करते हुए फ़रमाया:

“यहां तक कि अल्लाह आख़िरी ज़माने में, समय की कठिनाई और लोगों की अज्ञानता के दौर में एक व्यक्ति को भेजेगा।”

6- पूर्ण भलाई

शैख़ तूसी ने उमैर बिन्त नुफ़ैल से रिवायत की है कि इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

“यह मामला, जिसका तुम इंतज़ार कर रहे हो, उस समय तक घटित नहीं होगा जब तक तुममें से कुछ लोग एक-दूसरे से अलग न हो जाएं, कुछ एक-दूसरे पर लानत न भेजें, कुछ एक-दूसरे के चेहरे पर न थूकें और कुछ एक-दूसरे के काफ़िर होने की गवाही न दें।”

ये कथन कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए एक प्रकार की मानसिक तैयारी की ओर संकेत करते हैं, ताकि जब वादों की सच्चाई सामने आए तो निराशा और मायूसी के बजाय ईमान और समर्पण में वृद्धि हो। इसके साथ ही इससे यह आशापूर्ण दृश्य भी सामने आता है कि अंधकार की अंतिम सीमा पर ही प्रकाश के उदय की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

7- इमामों की संख्या

ख़ज़ाज़ क़ुम्मी ने अपनी सनद के साथ सुलेमान क़सरी से रिवायत की है कि मैंने इमाम हसन अलैहिस्सलाम से पूछा:

“इमामों की संख्या कितनी है?”

आपने फ़रमाया:

“साल के महीनों के बराबर!”

अर्थात बारह।

8- फ़रिश्तों के माध्यम से इमाम की सहायता और समर्थन

इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने एक स्थान पर फ़रमाया:

“अल्लाह अपने फ़रिश्तों के माध्यम से उसकी सहायता करेगा, उसके साथियों को सुरक्षित रखेगा और अपनी निशानियों के माध्यम से उसकी मदद करेगा।”

जहां इंसान अल्लाह और उसके वली के साथ वचन और संकल्प करके उनका साथ देते हैं, वहां धरती और आकाश एक हो जाते हैं। फ़रिश्ते मोमिनों की सहायता के लिए पहुंचते हैं और मोमिनों को गुमराही के रास्तों से सुरक्षित रखा जाता है। पहले से स्थापित स्पष्ट निशानियां ईमान वालों के लिए रास्ता स्पष्ट कर देती हैं और सभी लोगों पर हुज्जत पूरी कर देती हैं।

9- धरती के लोगों पर विजय

इमाम हसन अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं:

“अल्लाह उसे धरती के सभी लोगों पर प्रभुत्व प्रदान करेगा, यहां तक कि सभी लोग स्वेच्छा से या मजबूरी में उसके आदेश के अधीन हो जाएंगे। वह धरती को न्याय, इंसाफ़, प्रकाश और स्पष्ट प्रमाण से भर देगा। दुनिया के पूर्व से पश्चिम तक सभी क्षेत्र उसके अधीन हो जाएंगे। कोई काफ़िर ऐसा नहीं बचेगा जो उस पर ईमान न लाए और कोई दुराचारी ऐसा नहीं रहेगा जो सुधर न जाए।”

मासूमीन अलैहिमस्सलाम की शिक्षाओं में महदवियत से संबंधित सबसे अधिक दोहराया जाने वाला संदेश यही है। यह ऐसी बात थी जो आले-अबी सुफ़यान और आले-मुआविया के मुकाबले में प्रत्यक्ष पराजय के समय भी शियाओं के दिलों में उत्साह और आशा को जीवित रखती थी।

सारांश और निष्कर्ष

भूमिका और इमामत का महत्व

यह शोध इस मूल इस्लामी विचार को स्पष्ट करता है कि पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के निधन के बाद धर्म की रक्षा और समाज के मार्गदर्शन के लिए “इमामत की व्यवस्था” का होना अनिवार्य था। यद्यपि ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण इस व्यवस्था को प्रत्यक्ष शासन से दूर कर दिया गया, लेकिन अल्लाह का वादा है कि धरती कभी भी उसकी हुज्जत से खाली नहीं रहती। इसी सिलसिले की अंतिम कड़ी हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम हैं, जो धर्म को पूर्ण रूप से लागू करेंगे। इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम की सीरत और कथनों में इस अंतिम उद्धारकर्ता के बारे में स्पष्ट शुभ समाचार मौजूद हैं।

रिवायतों का जायज़ा

इमाम हसन अलैहिस्सलाम से वर्णित कुल 438 रिवायतों में से 10 रिवायतें विशेष रूप से इमाम महदी अलैहिस्सलाम के बारे में हैं। ये रिवायतें रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम, हज़रत अली अलैहिस्सलाम, हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम और स्वयं इमाम हसन अलैहिस्सलाम से वर्णित हैं। उनका सार निम्नलिखित बिंदुओं में बयान किया जा सकता है:

1- धरती हुज्जत से खाली नहीं रहती

रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के हवाले से इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने बयान किया कि धरती कभी भी ईश्वरीय हुज्जत से खाली नहीं होगी, चाहे वह प्रकट हो या ग़ायब। इमाम महदी अलैहिस्सलाम इमाम हसन अलैहिस्सलाम की नस्ल से, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के माध्यम से होंगे और वे धरती को उसी प्रकार न्याय और इंसाफ़ से भर देंगे, जिस प्रकार वह अत्याचार से भर गई होगी।

2- बारह इमामों का उल्लेख

इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने अपने ख़ुतबों और वसीयतों में स्पष्ट किया कि इमामों की संख्या साल के महीनों की तरह “बारह” है और ये सभी पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के चुने हुए उत्तराधिकारी हैं। उनमें से हर एक या तो शहीद किया जाएगा या ज़हर दिया जाएगा।

3- ग़ैबत और बैअत का न होना

इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने अपनी सुलह की रणनीति की व्याख्या करते हुए फ़रमाया कि इमाम महदी अलैहिस्सलाम की पैदाइश गुप्त होगी और वे ग़ैबत में रहेंगे, ताकि जब वे क़याम करें तो उनकी गर्दन पर किसी अत्याचारी शासक की बैअत का बोझ न हो। वे पूरी स्वतंत्रता के साथ न्याय स्थापित करेंगे और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम उनकी इमामत में नमाज़ अदा करेंगे।

4- ज़ुहूर से पहले के हालात

रिवायतों में वर्णित है कि ज़ुहूर से पहले समाज अत्यधिक उथल-पुथल का शिकार होगा। लोग एक-दूसरे पर लानत भेजेंगे और एक-दूसरे से अलग होने का इज़हार करेंगे। यह कठिन परीक्षा का दौर होगा, जिसके बाद इमाम अलैहिस्सलाम प्रकट होकर सभी मतभेदों को समाप्त करेंगे और खुशहाली लाएंगे।

5- वैश्विक सरकार

इमाम महदी अलैहिस्सलाम के दौर में धरती अपने ख़ज़ाने उगल देगी, आकाश से बरकतें बरसेंगी और यहां तक कि जंगली जानवर भी आपस में मेल कर लेंगे। वे पूर्व और पश्चिम पर चालीस वर्ष तक शासन करेंगे।

अंतिम बात

इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम के फ़रमूदात की रोशनी में हम निम्नलिखित महत्वपूर्ण शिक्षाएं प्राप्त कर सकते हैं:

1- धरती कभी भी हुज्जते ख़ुदा से खाली नहीं रहती

सबसे पहला और मूल पाठ यह है कि अल्लाह की हिदायत की व्यवस्था कभी समाप्त नहीं होती। परिस्थितियां कितनी भी अनुकूल या प्रतिकूल क्यों न हों, धरती पर अल्लाह का एक प्रतिनिधि अर्थात इमाम हमेशा मौजूद रहता है, जो मख़लूक़ के लिए सुरक्षा और मार्गदर्शन का ज़ामिन होता है, चाहे वह लोगों की निगाहों से ओझल अर्थात ग़ायब ही क्यों न हो।

2- आशा और विश्वास की शक्ति

ये रिवायतें हमें निराशा के घने अंधकार में आशा की किरण प्रदान करती हैं। मोमिन को कभी भी अत्याचारी शासकों या फैले हुए फ़साद के कारण निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि अल्लाह का वादा सच्चा है और अंतिम विजय सत्य तथा न्याय की होगी। अत्याचार का परिणाम पतन है और न्याय का भविष्य उज्ज्वल है।

3- परीक्षा में दृढ़ता

ज़ुहूर से पहले का दौर अत्यंत कठिन परीक्षा का दौर है। इससे स्पष्ट होता है कि ग़ैबत के ज़माने में फ़ितनों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। ऐसे समय में वास्तविक सफलता यह है कि इंसान अपने ईमान पर डटा रहे, बातिल विचारों से प्रभावित न हो और स्वयं को इमाम अलैहिस्सलाम के ज़ुहूर के लिए तैयार रखे।

4- बातिल से समझौता न करना

इमाम महदी अलैहिस्सलाम की ग़ैबत की एक बड़ी हिकमत यह बयान की गई है कि उनकी गर्दन पर किसी अत्याचारी की बैअत का बोझ नहीं होगा। यह हमें सिखाता है कि एक वास्तविक सुधारक और मोमिन सत्य को लागू करने के लिए ताग़ूत के साथ समझौता नहीं करता, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता के साथ न्याय स्थापित करता है।

5- वास्तविक भलाई की प्रतीक्षा

कभी-कभी सामाजिक बिगाड़ और कठिनाइयां भी किसी बड़ी “भलाई” की भूमिका होती हैं। सभी मतभेदों और परेशानियों का अंतिम समाधान इमाम महदी अलैहिस्सलाम का क़याम है, जो धरती को उसी प्रकार न्याय से भर देंगे, जिस प्रकार वह अत्याचार से भर गई होगी।

स्रोत

1-क़ुरआन

2-इब्ने बाबविया, मुहम्मद बिन अली, इललुश्शराए, मोमिनीन, 1380 श.

3-इब्ने हमज़ा, मुहम्मद बिन अली, अस्साक़िब फ़िल मनाक़िब, अंसारियान, क़ुम, ईरान, 1370 हिजरी क़मरी।

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12-क़ुत्ब रावंदी, सईद बिन हिबतुल्लाह, अल-ख़राइज वल जराइह, मुअस्सिसए इमाम महदी (अज.), क़ुम, ईरान, 1409 हिजरी क़मरी।

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