हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार प्रांत के गोपालपुर में मजलिस-ए-ईसाल-ए-सवाब का आयोजन किया गया। इसमें हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन सय्यद शमा मोहम्मद रिज़वी ने सुप्रीम लीडर, इस्लामी क्रांति के वैचारिक सिद्धांतों, शहीदों की भूमिका, युवाओं की धार्मिक तरबीयत और वर्तमान दौर में उम्मत-ए-मुस्लिमा की जिम्मेदारियों पर चर्चा की। उन्होंने आयतुल्लाह सय्यद मुज्तबा ख़ामेनेई के नेतृत्व के संदर्भ में सुप्रीम लीडर की निरंतरता, धार्मिक एवं शैक्षिक तरबीयत और इस्लामी क्रांति के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला।
मौलाना सय्यद शमा मोहम्मद रिज़वी ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में किसी भी राष्ट्र के लिए अपनी वैचारिक स्वतंत्रता, सिद्धांतों और वैचारिक पहचान पर कायम रहना एक बड़ी चुनौती है। उनके अनुसार, ईरान की इस्लामी क्रांति ने विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य दबावों के बावजूद अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रहने का प्रयास किया है और इसके लिए नेतृत्व, दूरदर्शिता तथा सामूहिक दृढ़ता का बहुत महत्व है।
उन्होंने आयतुल्लाह सय्यद मुज्तबा ख़ामेनेई की रहबरी का उल्लेख करते हुए कहा कि मौजूदा नेतृत्व के लिए पिछली रहबरी के अनुभव, धार्मिक एवं शैक्षिक तरबीयत और इस्लामी क्रांति के मूल सिद्धांतों की निरंतरता महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, सुप्रीम लीडर का पद केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध वैचारिक मार्गदर्शन और उम्मत की सामूहिक दिशा निर्धारित करने से भी है।
मौलाना ने सुप्रीम लीडर के चुनाव की प्रक्रिया की ओर संकेत करते हुए कहा कि रहबरी के चुनाव में शरई और कानूनी आवश्यकताओं का पालन जरूरी है। उन्होंने मजलिस-ए-ख़ुबरेगान की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि रहबर का चुनाव विचार-विमर्श, परामर्श और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाता है।
उन्होंने आयतुल्लाह सय्यद मुज्तबा ख़ामेनेई की धार्मिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए बताया कि उन्होंने क़ुम में हौज़ा-ए-इल्मिया के उलेमा और शिक्षकों से धार्मिक शिक्षा प्राप्त की तथा अपने पिता, हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनेई से भी शैक्षिक और तरबीयत मार्गदर्शन प्राप्त किया।
मौलाना सय्यद शमा मोहम्मद रिज़वी ने परिवार और बच्चों की धार्मिक तरबीयत को भी अपनी बातचीत का हिस्सा बनाया। उन्होंने कहा कि धार्मिक तरबीयतकी शुरुआत घर से होती है और माता-पिता की भूमिका, घरेलू माहौल तथा उनके व्यवहार का बच्चों के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा, "अपने घर को जन्नत बनाओ और जहन्नम से दूर हो जाओ। अपने बच्चों को दीन से इस तरह परिचित कराओ, जिस तरह एक बच्चा अपनी मां के दूध से परिचित होता है।"
मौलाना ने मजलिसों की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि मजलिसों में फ़ज़ाइल और मसाइब के साथ-साथ ऐसे विषयों को भी जगह दी जानी चाहिए, जो युवाओं में ज्ञान, मारफ़त,बसीरत और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना पैदा करें।
उनके अनुसार, धार्मिक सभाओं का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह भी है कि नई पीढ़ी हक़ और बातिल की पहचान, शहीदों के उद्देश्यों, कुर्बानी के अर्थ तथा अपनी धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से परिचित हो।
उन्होंने शहादत के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि शहादत केवल मृत्यु का नाम नहीं है, बल्कि हक़, न्याय और दीन की रक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी को समझना और जरूरत पड़ने पर कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना है।
मौलाना सय्यद शमा मोहम्मद रिज़वी ने शहीद सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनेई की शैक्षिक, धार्मिक और क्रांतिकारी संघर्ष का भी उल्लेख किया और कहा कि नेतृत्व की वैचारिक निरंतरता को समझने के लिए रहबर के शैक्षिक एवं तरबीयती जीवन और उनकी विचारधारा का अध्ययन जरूरी है।
उन्होंने वर्तमान पीढ़ी, विशेष रूप से युवाओं को धार्मिक शिक्षा, वैचारिक तरबीयत और सामाजिक चेतना की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि आज के दौर की चुनौतियों का सामना केवल भावनाओं के माध्यम से नहीं, बल्कि ज्ञान, बसीरत, नैतिकता और जिम्मेदाराना भूमिका के जरिए किया जा सकता है।
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