बुधवार 16 सितंबर 2026 - 13:13
फक़ाहत और तब्लीग़ हौज़ा इल्मिया के दो बुनियादी दायित्व हैं, डिग्री के लिए शिक्षा हासिल न करें: हुज्जतुल-इस्लाम कराती

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन मोहसिन कराती ने फ़िक़्ह और धार्मिक शिक्षा में धर्म की गहरी समझ हासिल करने और धर्म का प्रचार करने को हौज़ा इल्मिया के दो बुनियादी दायित्व बताया। उन्होंने कहा कि छात्रों को केवल डिग्री हासिल करने के लिए शिक्षा नहीं लेनी चाहिए, बल्कि हौज़ा इल्मिया का उद्देश्य ऐसे धर्मगुरुओं को तैयार करना होना चाहिए जो ज्ञान हासिल करें, उसे दूसरों तक पहुंचाएं और अपने जीवन में उस पर अमल भी करें।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन मोहसिन कराती ने क़ुम में इमाम महदी अलैहिस्सलाम उच्च हौज़ा शिक्षा संस्थान (विशेषज्ञता केंद्र: महदवियत और नमाज़) के नए शैक्षणिक वर्ष के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए छात्रों की शैक्षिक और धार्मिक प्रचार संबंधी जिम्मेदारियों पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि छात्रों की शैक्षिक यात्रा तीन चरणों पर आधारित हो सकती है: ज्ञान का निर्माण, धार्मिक शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार और प्राप्त ज्ञान पर अमल। उच्च स्तर पर कोई छात्र शोध, इज्तिहाद और पुस्तकों की रचना के माध्यम से ज्ञान के निर्माण में योगदान देता है, जबकि हर छात्र क़ुरआन और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की शिक्षाओं को लेखन, भाषण और प्रचार के माध्यम से समाज तक पहुंचा सकता है।

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन कराती ने इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की एक रिवायत का उल्लेख करते हुए कहा कि अगर लोग अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की बातों की खूबियों को जान लें, तो वे उनकी पैरवी करेंगे। उन्होंने कहा कि धार्मिक ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य यह है कि वह इंसान के चरित्र और उसके व्यवहार में भी दिखाई दे।

उन्होंने छात्रों को लगातार ज्ञान हासिल करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि किसी को भी यह नहीं समझना चाहिए कि वह ज्ञान से बेनियाज़ हो गया है या उसकी शिक्षा पूरी हो चुकी है। क़ुरआन में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि को भी यह दुआ सिखाई गई है: «رَبِّ زِدْنِي عِلْماً» अर्थात, “ऐ मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।”

हौज़ा इल्मिया के उद्देश्य के बारे में उन्होंने कहा कि छात्रों को डिग्री हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान हासिल करने के लिए पढ़ना चाहिए। डिग्री आवश्यक हो सकती है, लेकिन इसे शिक्षा का उद्देश्य नहीं बनाना चाहिए। असल उद्देश्य ऐसे आलिम-ए-रब्बानी तैयार करना है जो क़ुरआन और ईश्वरीय शिक्षाओं से जुड़े हों और ज्ञान हासिल करने के साथ उसे दूसरों तक भी पहुंचाएं।

उन्होंने धर्म के प्रचार में दृढ़ता और निडरता पर ज़ोर देते हुए इस आयत का उल्लेख किया: «الَّذِينَ يُبَلِّغُونَ رِسَالاتِ اللَّهِ وَيَخْشَوْنَهُ وَلَا يَخْشَوْنَ أَحَداً» अर्थात, “जो लोग अल्लाह के संदेशों को पहुंचाते हैं, उससे डरते हैं और अल्लाह के अलावा किसी से नहीं डरते।” उन्होंने कहा कि धार्मिक जिम्मेदारी निभाते समय इंसान को अल्लाह के अलावा किसी से भयभीत नहीं होना चाहिए।

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन कराती ने कहा कि हौज़ा इल्मिया को ऐसे विद्वान तैयार करने चाहिए जो समाज के धार्मिक सवालों और शंकाओं का ज्ञान और तर्क के आधार पर जवाब दे सकें। इसके लिए लगातार अध्ययन, शोध और शैक्षिक प्रशिक्षण आवश्यक है।

उन्होंने छुट्टियों के दौरान भी शैक्षिक गतिविधियां जारी रखने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और कहा कि छुट्टियों का उपयोग अध्ययन, शोध और पुस्तक लेखन के लिए किया जा सकता है। उन्होंने “तफ़सीर नमूना” का उदाहरण देते हुए बताया कि इसकी 27 जिल्दों में से अधिकतर काम छुट्टियों के दौरान पूरा किया गया था।

अंत में उन्होंने छात्रों पर ज़ोर दिया कि वे हौज़ा इल्मिया की शिक्षा को गंभीरता से लें और ज्ञान, धर्म के प्रचार तथा उस पर अमल को अपने धार्मिक जीवन का स्थायी हिस्सा बनाएं।

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