हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,25 सितंबर को इमाम ए जुमआ जौनपुर शाहगंज भादी हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना मासूम रज़ा कैफ़ी ने जुमआ के ख़ुत्बे में
क़ुरआन और हदीस की रौशनी में अल्लाह की नेमतों पर शुक्र अदा करने की अहमियत बयान करते हुए कहा कि इंसान को हर नेमत को अल्लाह की अता समझना चाहिए और उसे सही जगह खर्च करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि शुक्र की तौफ़ीक़ भी स्वयं एक बड़ी नेमत है और इंसान को नेमतों में इसराफ़ से बचना चाहिए।
मौलाना मासूम रज़ा कैफ़ी ने ख़ुत्बे की शुरुआत क़ुरआन मजीद की इस आयत से की:
وَاشْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّهِ إِنْ كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ
यानी, “अल्लाह की नेमत का शुक्र अदा करो अगर तुम केवल उसी की इबादत करते हो। उन्होंने कहा कि इस आयत में इंसान को अल्लाह की नेमतों को पहचानने और उनका शुक्र अदा करने की स्पष्ट हिदायत दी गई है।
उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की रिवायत बयान करते हुए कहा:
كَانَ رَسُولُ اللَّهِ إِذَا وَرَدَ عَلَيْهِ أَمْرٌ يَسُرُّهُ قَالَ: الْحَمْدُ لِلَّهِ عَلَى هَذِهِ النِّعْمَةِ
यानी जब रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वआलेहि को कोई खुशी की बात हासिल होती, तो आप फ़रमाते: «الْحَمْدُ لِلَّهِ عَلَى هَذِهِ النِّعْمَ» इस नेमत पर अल्लाह की हम्द है।
मौलाना ने कहा कि इंसान को अपनी ज़िंदगी में मिलने वाली हर नेमत को अल्लाह की तरफ़ से समझना चाहिए। माल, सेहत, इल्म, औलाद, परिवार और दूसरी तमाम सुविधाएं इंसान की अपनी मिल्कियत और काबिलियत का नतीजा नहीं, बल्कि अल्लाह की अता हैं। इसलिए नेमत मिलने पर घमंड करने के बजाय इंसान को अल्लाह के सामने शुक्रगुज़ार होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सच्चा शुक्र केवल ज़बान से “अल्हम्दुलिल्लाह” कहने का नाम नहीं, बल्कि नेमत का सही इस्तेमाल करना भी शुक्र का हिस्सा है। अगर अल्लाह ने किसी को माल दिया है तो उसे ज़रूरतमंदों की मदद और जायज़ कामों में खर्च करना चाहिए। अगर इल्म दिया है तो उसे दूसरों की रहनुमाई और समाज की भलाई के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।
मौलाना मासूम रज़ा कैफ़ी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इंसान को नेमतों में इसराफ़ और बर्बादी से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि अल्लाह की दी हुई नेमत को गलत और नाजायज़ कामों में खर्च करना शुक्र के बजाय नाशुक्री का कारण बन सकता है। इसलिए हर नेमत को उसके सही और जायज़ स्थान पर इस्तेमाल करना ज़रूरी है।
उन्होंने कहा कि इंसान जितना भी शुक्र अदा करे, अल्लाह की नेमतों का पूरा हक़ अदा नहीं कर सकता। सांस, सेहत, परिवार, रोज़ी, ईमान और हिदायत जैसी नेमतें इतनी अधिक हैं कि इंसान उनका पूरा हिसाब भी नहीं कर सकता। यहां तक कि शुक्र अदा करने की तौफ़ीक़ भी खुद की एक नेमत है। इसलिए मोमिन को हर परिस्थिति में अल्लाह का शुक्र अदा करते रहना चाहिए।
ख़ुत्बे के अंत में मौलाना मासूम रज़ा कैफ़ी ने कहा कि सच्चा बंदा वह है जो नेमत मिलने पर अल्लाह का शुक्र अदा करे, परेशानी में सब्र करे और हर हालत में अल्लाह से अपना रिश्ता मजबूत रखे। उन्होंने कहा कि अगर इंसान अल्लाह की नेमतों को पहचानकर उनका सही इस्तेमाल करे और जरूरतमंदों तक भी उनका हिस्सा पहुंचाए, तो वह अल्लाह के लुत्फ़ और करम का हक़दार बन सकता है।

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