हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,मौलाना इमरान अहमद आज़मी ने जुमआ के ख़ुतबे में हसद को इंसान के ईमान, अख़लाक़ और आख़िरत के लिए नुक़सानदेह बताते हुए कहा कि दूसरों को अल्लाह की नेमतों से नवाज़ा देखकर जलने के बजाय हमें अल्लाह की तक़सीम पर राज़ी रहना चाहिए। क़ुरआन मजीद और इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की तालीमात की रोशनी में उन्होंने कहा कि मोमिन दूसरों की तरक़्क़ी से सबक़ हासिल करता है, हसद नहीं करता। लिहाज़ा समाज में मोहब्बत, भाईचारे और इत्तेहाद को मज़बूत करने के लिए दिलों को कीने और हसद से पाक रखना ज़रूरी है।

उन्होंने जुमआ के पहले खुत्बे में कहां, मैं अपने आप को और आप तमाम हज़रात को तक़वा-ए-इलाही, परहेज़गारी और अल्लाह की इताअत की नसीहत करता हूँ। आज के ख़ुतबे का मौज़ू है हसद यानी दूसरों की नेमतों और कामयाबी को देखकर जलना। हसद इंसान के दिल को सियाह कर देता है, उसके सुकून को छीन लेता है और उसे दूसरों की नेमतों से परेशान रखता है। अल्लाह तआला सूरह-ए-निसा की आयत 54 में इरशाद फ़रमाता है:
أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَىٰ مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ
तर्जुमा: “क्या ये लोगों से उस फ़ज़्ल पर हसद करते हैं जो अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से अता किया है?
इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि किसी इंसान को अल्लाह ने इल्म, दौलत, इज़्ज़त, औलाद, कामयाबी या कोई दूसरी नेमत अता की है, तो हमें उससे जलना नहीं चाहिए। बल्कि अल्लाह की तक़सीम पर राज़ी रहना और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करना चाहिए।

हसद और ग़िब्ता में फ़र्क़:
मोमिनीन! इस्लाम हमें दूसरों की तरक़्क़ी देखकर मायूस होना नहीं सिखाता, बल्कि उससे अच्छा सबक़ हासिल करने की तालीम देता है। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से मंसूब रिवायत में बयान हुआ है:
إِنَّ الْمُؤْمِنَ يَغْبِطُ وَلَا يَحْسُدُ
मोमिन रश्क करता है, लेकिन हसद नहीं करता।
यहाँ ग़िब्ता और हसद के फ़र्क़ को समझना ज़रूरी है। ग़िब्ता यह है कि हम किसी को इल्म, इबादत, सदक़ा, ख़िदमत या किसी नेक काम में आगे बढ़ता देखकर यह ख़्वाहिश करें कि अल्लाह हमें भी ऐसी नेमत अता करे, लेकिन उस इंसान की नेमत ख़त्म होने की तमन्ना न करें। इसके बरख़िलाफ़ हसद यह है कि हम चाहें कि दूसरे से उसकी नेमत छिन जाए। लिहाज़ा अगर कोई आलिम दीन की ख़िदमत कर रहा है, कोई ताजिर हलाल कारोबार में तरक़्क़ी कर रहा है या कोई शख़्स ग़रीबों की मदद कर रहा है, तो उससे जलने के बजाय हमें भी नेक कामों में आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।
हस्द का अंजाम, इब्लीस और हाबील-क़ाबील का वाक़िआ;
अज़ीज़ाने-गिरामी! हसद का सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि यह इंसान को तकब्बुर, दुश्मनी और ज़ुल्म की तरफ़ ले जा सकता है। इब्लीस ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के सामने सज्दा करने से इंकार किया और तकब्बुर का रास्ता अपनाया। क़ुरआन मजीद में उसका इंकार बयान हुआ है। इसी तरह हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के दो बेटों का वाक़िआ सूरह-ए-माइदा में बयान किया गया है, जहाँ एक भाई ने दूसरे को क़त्ल कर दिया। इस वाक़िआ से हमें मालूम होता है कि जब इंसान अपने दिल में जलन, दुश्मनी और नफ़्सानी ख़्वाहिशों को जगह देता है, तो वह बहुत बड़े गुनाह तक पहुँच सकता है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
فَطَوَّعَتْ لَهُ نَفْسُهُ قَتْلَ أَخِيهِ فَقَتَلَهُ فَأَصْبَحَ مِنَ الْخَاسِرِينَ
(सूरह-ए-माइदा, आयत 30)
फिर उसके नफ़्स ने उसे अपने भाई के क़त्ल पर आमादा कर दिया, चुनाँचे उसने उसे क़त्ल कर दिया और वह नुक़सान उठाने वालों में हो गया।
यह वाक़िआ हमें आगाह करता है कि हसद और दुश्मनी को अपने दिल में परवान न चढ़ने दें। दूसरे की नेमत छीनने की कोशिश करने वाला आख़िरकार अपने ही दीन, अख़लाक़ और आख़िरत को नुक़सान पहुँचाता है।
हसद से बचने के लिए क्या करें?
अगर हम चाहते हैं कि हमारा समाज मोहब्बत, भाईचारे और इत्तेहाद का गहवारा बने, तो हमें अपने दिलों को हसद से पाक करना होगा। अगर किसी को अल्लाह ने ज़्यादा इल्म दिया है, तो उससे सीखें; किसी को दौलत दी है, तो उसके लिए बरकत की दुआ करें; किसी को इज़्ज़त मिली है, तो उसकी अच्छाइयों को तस्लीम करें। किसी की कामयाबी देखकर उसकी बुराई करना, उसके ख़िलाफ़ झूठ फैलाना या उसे नुक़सान पहुँचाने की कोशिश करना मोमिन के शायान-ए-शान नहीं है। अल्लाह तआला ने हमें यह दुआ सिखाई है:
رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَانِنَا الَّذِينَ سَبَقُونَا بِالْإِيمَانِ وَلَا تَجْعَلْ فِي قُلُوبِنَا غِلًّا لِلَّذِينَ آمَنُوا رَبَّنَا إِنَّكَ رَءُوفٌ رَحِيمٌ
सूरह-ए-हश्र, आयत 10
ऐ हमारे रब! हमें और हमारे उन भाइयों को बख़्श दे जो ईमान में हमसे पहले गुज़र चुके हैं, और हमारे दिलों में ईमान वालों के लिए कोई कीना न रख। ऐ हमारे रब! बेशक तू बहुत शफ़क़त करने वाला, निहायत रहम करने वाला है।

इस आयत को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाइए। अपने बच्चों की तरबियत कीजिए कि वे दूसरों की चीज़ों पर नज़र रखने के बजाय अपनी मेहनत, इल्म और अच्छे अख़लाक़ से आगे बढ़ें। दिल में हसद पैदा हो तो अल्लाह से पनाह माँगें, अपने लिए और दूसरे के लिए ख़ैर की दुआ करें और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करें।
आख़िर में, मैं तमाम मोमिनीन से गुज़ारिश करता हूँ कि हम अपने दिलों का मुहासबा करें। क्या हम दूसरों की कामयाबी पर ख़ुश होते हैं या परेशान? क्या हम दूसरों के लिए वही पसंद करते हैं जो अपने लिए पसंद करते हैं? याद रखिए, दुनिया की दौलत और इज़्ज़त अस्थायी हैं, लेकिन नेक अमल, पाकीज़ा दिल और अच्छे अख़लाक़ आख़िरत की कामयाबी का ज़रिया हैं। हमें हसद के बजाय ग़िब्ता, नफ़रत के बजाय मोहब्बत और दुश्मनी के बजाय भाईचारे को अपनाना चाहिए।
वस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू।
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