हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , रफ़संजान स्थित मदरसा ए इल्मिया तख़स्सुसी हज़रत ज़ैनब कुबरा (स.ल.) में नए शैक्षणिक वर्ष की पहली नैतिक एवं अख़लाक़ी बैठक आयोजित की गई। इसका शीर्षक “बंदगी का मीठा स्वाद; शुक्र और आभार के दृष्टिकोण से था। कार्यक्रम को मदरसा शिक्षिका सकीना आफ़रंद ने संबोधित किया।
इस्लाम में शुक्रगुज़ारी के स्थान को बयान करते हुए उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) की एक हदीस का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि जब किसी व्यक्ति को किसी दूसरे की ओर से कोई नेमत या एहसान मिले, तो उसे अपनी क्षमता के अनुसार उसका बदला चुकाना चाहिए। अगर वह ऐसा न कर सके तो कम से कम ज़ुबान से उसका शुक्रिया अदा करे। ऐसा भी न करने पर यह नेमत की नाशुक्री मानी जाएगी।
उन्होंने शुक्र के तीन दर्जों दिल से शुक्र, ज़ुबान से शुक्र और अमल के जरिए शुक्र की व्याख्या करते हुए कहा कि इस्लाम हक़ पहचानने और एहसान मानने पर आधारित है। अगर किसी व्यक्ति ने हमारे लिए कोई सेवा की है तो उसे भुलाना नहीं चाहिए और क्षमता होने पर उसका बदला चुकाना चाहिए। अगर सेवा इतनी बड़ी हो या हमारी क्षमता इतनी सीमित हो कि हम उसका बदला न चुका सकें, तो कम से कम ज़ुबान से उसका आभार व्यक्त करना चाहिए।
धार्मिक विशेषज्ञ ने कहा कि हमारे आराम और ज्ञान प्राप्त करने में माता-पिता, शिक्षकों, पड़ोसियों, उलमा और शहीदों सहित बहुत से लोगों की सेवाओं का योगदान है। हम अनेक लोगों के एहसानमंद हैं और भले ही उनके सभी एहसानों का बदला न चुका सकें, लेकिन हमें उनकी सेवाओं की कद्र और शुक्रगुज़ारी जरूर करनी चाहिए।
सकीना आफ़रंद ने सूरह इब्राहीम की आयत 7 का हवाला देते हुए कहा,अगर तुम शुक्र करोगे तो मैं तुम्हें और अधिक दूँगा और अगर नाशुक्री करोगे तो निश्चय ही मेरा अज़ाब बहुत सख्त है।
उन्होंने कहा कि यह नियम उन नेमतों पर भी लागू होता है जो हमें दूसरे इंसानों के माध्यम से प्राप्त होती हैं। जब अल्लाह की नेमतें हमारे पूरे अस्तित्व को घेरे हुए हैं, तो हमारा अल्लाह का शुक्र अदा करना भी स्वयं एक नेमत है, जिसके लिए शुक्र की जरूरत है। इसलिए केवल अल्लाह का शुक्र करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन लोगों का भी आभार व्यक्त करना चाहिए जो इन नेमतों के माध्यम बने हैं और उनके अधिकारों को अदा करके उन्हें आगे भी अच्छे कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
उन्होंने जोर देकर कहा कि शुक्रगुज़ारी का न्यूनतम स्तर मुहब्बत, आत्मीयता और अच्छे व्यवहार के साथ पेश आना तथा दूसरों को तकलीफ और परेशानी से बचाना है। जबकि इसका उच्चतम स्तर यह है कि इंसान दूसरों की अच्छाइयों का कई गुना बेहतर तरीके से, दिल और ज़ुबान तथा व्यवहार और अमल के जरिए बदला चुकाए।
उन्होंने कहा कि शुक्रगुज़ारी ज़िंदगी के हर काम में शामिल होनी चाहिए। इंसान कभी भी शुक्र का पूरा हक़ अदा नहीं कर सकता, लेकिन यह कमी उसे शुक्रगुज़ारी से रोकने का कारण नहीं बननी चाहिए।

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