हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , उत्तर प्रदेश/जौनपुर भादी शाहगंज में 11 सितंबर 2026 को ख़ुत्बा-ए-जुमआ के दौरान हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद मासूम रज़ा कैफ़ी ने सूरह अल-अहज़ाब की आयत 21 का हवाला देते हुए कहा कि रसूल ए अकरम (स.ल.) की सीरत केवल बयान करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में लागू करना ज़रूरी है।
उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में मजलिसें और तबलीगी कार्यक्रम आयोजित होते हैं, लेकिन वास्तविक सफलता तभी है जब इन शिक्षाओं का हमारे चरित्र और व्यवहार पर प्रभाव दिखाई दे।
मौलाना ने कहा कि रसूले अकरम (स.ल.) ऐसे समाज में आए जहां दुनिया और भौतिक लाभ को ही जीवन का उद्देश्य समझा जाता था। आपने इंसान को दुनिया-परस्ती से निकालकर तौहीद, ख़ुदापरस्ती और आख़िरत की तैयारी की ओर बुलाया।
हज़रत अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) के फ़रमान की रोशनी में उन्होंने कहा कि इंसान को यह देखना चाहिए कि वह दुनिया की चाहत में जीवन गुज़ार रहा है या आख़िरत की कामयाबी को अपना लक्ष्य बना रहा है।
उन्होंने कहा कि क़ुरआन मजीद में आख़िरत का बार-बार ज़िक्र इंसान को यह याद दिलाने के लिए किया गया है कि दुनिया स्थायी ठिकाना नहीं, बल्कि गुज़रने की जगह है। जब इंसान के अंदर आख़िरत का यक़ीन मज़बूत होता है, तो उसके फैसलों, व्यवहार और चरित्र में भी सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगता है। इसलिए धार्मिक शिक्षाओं का उद्देश्य केवल जानकारी हासिल करना नहीं, बल्कि इंसान के जीवन और आचरण को बेहतर बनाना है।
मौलाना सय्यद मासूम रज़ा कैफ़ी ने कहा कि रसूले अकरम (स.ल.) ने केवल अक़ीदों और इबादतों की शिक्षा नहीं दी, बल्कि समाज में मौजूद अच्छी आदतों को भी सही दिशा प्रदान की। उन्होंने मेहमाननवाज़ी को इस्लामी समाज की महत्वपूर्ण विशेषता बताते हुए कहा कि मेहमान केवल हमारे घर में आने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, बरकत और रहमत का माध्यम भी बन सकता है।
मौलाना सय्यद मासूम रज़ा कैफ़ी ने मेहमाननवाज़ी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अंबिया-ए-इलाही की सीरत से पता चलता है कि इंसान के साथ अच्छा व्यवहार और मेहमाननवाज़ी हिदायत का माध्यम भी बन सकती है। उन्होंने उस घटना की ओर इशारा किया जिसमें एक ग़ैर-मोमिन व्यक्ति के संबंध में हज़रत इब्राहीम (अ.स.) को अल्लाह तआला की ओर से तंबीह हुई। इस घटना से यह संदेश मिलता है कि अल्लाह की रहमत और रिज़्क़ व्यापक है और इंसान को दूसरों के साथ रहम, प्रेम और सम्मान का व्यवहार करना चाहिए।
अंत में उन्होंने कहा कि अगर हम अपने समाज में प्रेम, भाईचारा और दीन की शिक्षाओं को मज़बूत करना चाहते हैं, तो हमें आख़िरत पर अपने विश्वास को मजबूत करने के साथ-साथ रसूले अकरम (स.ल.) की सीरत को अपने परिवार, घर और सामाजिक जीवन में लागू करना होगा। उन्होंने ज़ोर दिया कि सीरत-ए-रसूल (स.ल.) की वास्तविक पैरवी यही है कि उनकी शिक्षाएं हमारे व्यवहार, चरित्र और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखाई दें।
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