शुक्रवार 2 अक्टूबर 2026 - 06:33
अल्लाह इमाम ज़माना (अ) के दुश्मनों को मोज्ज़े से नष्ट क्यों नहीं कर देता?

कभी यह सवाल उठता है कि अल्लाह तआला इमाम-ए-अस्र हज़रत इमाम महदी (अज.) के दुश्मनों को किसी मोज्ज़े के ज़रिए नष्ट क्यों नहीं कर देता, ताकि उनके ज़ुहूर का मार्ग जल्दी प्रशस्त हो सके? इस सवाल का जवाब उलेमा-ए-कलाम ने ‘तकलीफ़ और इख़्तियार’ के सिद्धांत के आधार पर दिया है। उनका कहना है कि अल्लाह की ओर से ऐसा जबरन हस्तक्षेप, जिसमें इंसान के विकल्प और उसके स्वतंत्र निर्णय की गुंजाइश समाप्त हो जाए, इंसान की परीक्षा और उसके कर्मों के आधार पर मिलने वाले सवाब की हिकमत को समाप्त कर देगा। इसलिए ज़ुहूर की भूमिका लोगों के अपने चुनाव, जागरूकता और सचेत सहयोग से तैयार होनी चाहिए।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे दौर में जब ज़ुल्म और अन्याय पूरी दुनिया में फैला हुआ है और इंतज़ार करने वालों की ज़बान पर ‘ऐन मुज़िल्लुल औलिया’ की पुकार जारी है, इंसाफ़ की स्थापना के लिए अल्लाह के वादे के पूरा होने की इच्छा पहले से कहीं अधिक लोगों के दिलों में ज़िंदा है। इसी बेचैनी और इंतज़ार के बीच एक बुनियादी सवाल हमेशा सामने आता है कि अगर अल्लाह तआला हर चीज़ पर क़ादिर है, तो वह इमाम ज़माना (अज.) के दुश्मनों को किसी चमत्कार के ज़रिए नष्ट क्यों नहीं कर देता, ताकि ज़ुहूर जल्द से जल्द हो सके? इस सवाल का कलामी जवाब निम्नलिखित है।

सवाल:

अल्लाह तआला इमाम ज़माना (अज.) के दुश्मनों को किसी मोज्ज़े के ज़रिए नष्ट क्यों नहीं कर देता, ताकि ज़ुहूर जल्दी हो जाए?

जवाब:

‘अल-ग़ैबा’ में ज़ुरारा से रिवायत है कि उन्होंने इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.) को फ़रमाते हुए सुना:

“क़ाइम (अ.) के क़याम से पहले उनके लिए ग़ैबत होगी। वह ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी विरासत का दावा किया जा रहा है।”

मैंने पूछा: “ऐसा क्यों होगा?”

इमाम (अ.) ने फ़रमाया: “वह डरते हैं।” और अपने हाथ से अपने पेट की ओर इशारा किया, यानी हत्या के भय से।

अल्लामा मजलिसी कहते हैं:

शैख़ तूस़ी ने कहा

कि इमाम (अ.) के ज़ुहूर में कोई चीज़ बाधक नहीं है, सिवाय इसके कि उन्हें अपनी जान के लिए हत्या का भय है। अगर इसके अलावा कोई और कारण होता, तो उनके लिए पर्दे ए ग़ैबत में रहना उचित नहीं होता और उन्हें कठिनाइयों और तकलीफ़ों को सहन करना पड़ता। क्योंकि इमामों और पैग़म्बरों (अ.) का ऊंचा स्थान अल्लाह तआला की राह में बड़ी-बड़ी कठिनाइयों को सहन करने के कारण ही है।

अगर यह सवाल किया जाए कि अल्लाह तआला उन्हें मारे जाने से क्यों नहीं बचाता और उनके तथा उन्हें क़त्ल करने वालों के बीच कोई रुकावट क्यों नहीं पैदा कर देता?

इसके जवाब में कहा जाएगा कि वह रोक, जो बंदों की तकलीफ़ और परीक्षा के अनुकूल है, यह है कि अल्लाह तआला लोगों को उनकी मुख़ालफ़त से रोके, उनकी पैरवी और मदद को वाजिब ठहराए और उन्हें उनकी आज्ञा का पालन करने का पाबंद करे। अल्लाह तआला ने ये सभी आदेश दिए हैं।

लेकिन उनके और दुश्मनों के बीच जबरन कोई रुकावट पैदा करना तकलीफ़ और इंसानी इख़्तियार के उद्देश्य के विरुद्ध है। क्योंकि तकलीफ़ का उद्देश्य यह है कि इंसान अपने कर्मों के आधार पर सवाब का हक़दार बने और यह तभी संभव है जब उसे चुनाव और आज़माइश का अवसर मिले। जबरन रुकावट पैदा करना इस उद्देश्य के विपरीत होगा।

इसके अलावा, संभव है कि इमाम (अ.) की हत्या को जबरन रोकने से लोगों के लिए कुछ ऐसी ख़राबियां और मफ़ासिद पैदा हों, जिनके कारण हिकमत-ए-इलाही के अनुसार ऐसा करना उचित न हो।

स्रोत: बिहार उल अनवार, भाग 52

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