लेखक: हुज्जतुल इस्लाम ग़ुलाम हुसैन मासूमी
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! अहले बैत (अ) के मत में बुनियादी आस्था यह है कि अल्लाह तआला ने इंसानों के मार्गदर्शन के लिए अपनी हुज्जत निर्धारित की है। हुज्जते ख़ुदा का अस्तित्व इंसानों के लिए ईश्वरीय मार्गदर्शन की व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। मासूम इमाम (अ) की ग़ैबत का अर्थ यह नहीं है कि उनका अस्तित्व समाप्त हो गया है।
ज़मीन कभी हुज्जते ख़ुदा से ख़ाली नहीं रहती! हम इमामे ज़माना (अ) के ज़ुहूर के इंतज़ार में हैं, लेकिन हमारा इंतज़ार निष्क्रियता का नाम नहीं है। यह आत्मसुधार, सत्य का समर्थन, मज़लूमों की सेवा और न्याय की स्थापना के लिए संघर्ष का नाम है।
दुनिया के मौजूदा हालात, ईरान की स्थिति और शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई (र) की शहादत के बाद पैदा हुई असाधारण परिस्थितियों ने अहले बैत (अ) से प्रेम करने वाले अनेक लोगों के दिलों को ग़म, बेचैनी और इंतज़ार की स्थिति में डाल दिया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 6 अक्टूबर 2026 को ईरान के नेतृत्व के बारे में बयान दिया कि किसी को नहीं मालूम कि ईरान को कौन चला रहा है। दूसरी ओर, सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई की लंबे समय से स्वतंत्र और विश्वसनीय रूप से सत्यापित सार्वजनिक उपस्थिति न होने के कारण उनकी भूमिका और परिस्थितियों के बारे में सवाल उठ रहे हैं। उनकी स्थिति और सरकारी फ़ैसलों में उनकी व्यावहारिक भूमिका को लेकर विभिन्न दावे सामने आए हैं, लेकिन सभी विवरणों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
यह स्थिति हमारे सामने एक बुनियादी धार्मिक सवाल भी रखती है: क्या ईमान वालों की उम्मीद केवल बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर है, या उनकी आस्था की नींव इससे कहीं अधिक गहरी है?
अहले बैत (अ) के मत में इस सवाल का जवाब अक़ीदा-ए-इमामत, हुज्जते ख़ुदा और इंतज़ार-ए-फ़रज में मिलता है।
1. ज़मीन कभी हुज्जते ख़ुदा से ख़ाली नहीं रहती
अहले बैत (अ) के मत की बुनियादी आस्था है कि अल्लाह तआला ने इंसानों के मार्गदर्शन के लिए अपनी हुज्जत निर्धारित की है। हुज्जते ख़ुदा का अस्तित्व इंसानों के लिए ईश्वरीय मार्गदर्शन की व्यवस्था से जुड़ा हुआ है और इमामे मासूम (अ) की ग़ैबत उनके अस्तित्व के समाप्त होने का प्रमाण नहीं है।
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से रिवायत है:
إِنَّ الْأَرْضَ لَا تَخْلُو إِلَّا وَفِيهَا إِمَامٌ ज़मीन कभी इमाम से ख़ाली नहीं रहती।
संदर्भ: अल-काफ़ी, शेख़ कुलैनी, किताबुल हुज्जा, हुज्जत और इमामत से संबंधित अध्याय। विभिन्न रिवायतों के शब्द और सनद अलग-अलग हैं, इसलिए शोध के दौरान संबंधित रिवायत के पूरे पाठ और सनद का अध्ययन करना चाहिए।
यह आस्था हमें बताती है कि परिस्थितियां कितनी भी जटिल क्यों न हों, मोमिन का संबंध अल्लाह तआला, उसकी हुज्जत और उसके मार्गदर्शन से नहीं टूटता।
क़ुरआन मजीद में इरशाद होता है:
إِنَّمَا أَنْتَ مُنْذِرٌ وَلِكُلِّ قَوْمٍ هَادٍ आप तो केवल सावधान करने वाले हैं और हर क़ौम के लिए एक मार्गदर्शक है। (सूर ए रअद, आयत 7)
इस आयत की व्याख्या में इमामी रिवायतों के अंतर्गत मार्गदर्शक के अर्थ को अहले बैत (अ) के इमामों से भी जोड़ा गया है। हालांकि, आयत के मूल शब्दों और उनकी तफ़सीरी व्याख्या के बीच अंतर को ध्यान में रखना चाहिए।
2. इमामे ज़माना (अ) की ग़ैबत महरूमी नहीं, बल्कि एक इम्तिहान भी है
हमारे बारहवें इमाम, हज़रत हुज्जत बिन हसन अल-अस्करी, इमाम महदी (अ), अल्लाह तआला के आदेश से ग़ैबत में हैं। इमामिया अक़ीदे के अनुसार, ग़ैबत का अर्थ यह नहीं है कि इमाम (अ) का अस्तित्व समाप्त हो गया है या इंसानियत अल्लाह की हुज्जत से महरूम हो गई है।
शेख़ सदूक़ ने अपनी पुस्तक कमालुद्दीन व तमामुन नेमत में इमाम महदी (अ) की ग़ैबत और उससे संबंधित रिवायतों को संकलित किया है। शेख़ तूसी ने भी अपनी पुस्तक किताबुल ग़ैबत में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है।
इन पुस्तकों से ग़ैबत की आस्था, उसकी हिकमतों और इस दौर में ईमान वालों की ज़िम्मेदारियों को समझने में मदद मिलती है।
इमाम (अ) की ग़ैबत के दौर में हमारी ज़िम्मेदारी केवल इंतज़ार करना नहीं, बल्कि अपने अक़ीदे की रक्षा, धार्मिक जागरूकता, नैतिक सुधार, मज़लूमों की मदद और सत्य एवं न्याय की स्थापना के लिए प्रयास करना भी है।
3. क्या ईरान के मौजूदा हालात इमामे ज़माना (अ) की विशेष सहायता का प्रमाण हैं?
यहां एक महत्वपूर्ण इल्मी और अक़ीदती बिंदु को समझना आवश्यक है। हम अल्लाह तआला की मदद की उम्मीद रखते हैं। हम इमामे ज़माना (अ) के ज़ुहूर के मुंतज़िर हैं। हम दुआ करते हैं कि अल्लाह तआला अपने दीन, अपने बंदों और मज़लूमों की रक्षा फ़रमाए। लेकिन किसी विशेष राजनीतिक घटना, सरकारी फ़ैसले या युद्ध की स्थिति को निश्चित रूप से इमामे ज़माना (अ) की विशेष हस्तक्षेप का प्रमाण बताने के लिए विश्वसनीय धार्मिक दलील आवश्यक है।
इसलिए अधिक उचित बात यह है कि हम कहें: हम ईरान और सभी मज़लूमों के लिए अल्लाह तआला की मदद, इमामे ज़माना (अ) की दुआओं और ज़ुहूर-ए-फ़रज की उम्मीद रखते हैं। हमारी आस्था बाहरी परिस्थितियों से ऊपर एक ईश्वरीय वादे और अल्लाह के न्याय की उम्मीद से जुड़ी है। यह उम्मीद केवल राजनीतिक विश्लेषण नहीं, बल्कि हमारे धार्मिक विश्वास और आध्यात्मिक संबंध का हिस्सा है।
4. इमामे ज़माना (अ) की पहचान और इंतज़ार
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से रिवायत है:
مَنْ مَاتَ وَلَيْسَ لَهُ إِمَامٌ مَاتَ مِيتَةً جَاهِلِيَّةً जो व्यक्ति इस हालत में मर जाए कि उसे अपने इमाम की पहचान और उनसे जुड़ाव हासिल न हो, उसकी मौत जाहिलियत की मौत है।
संदर्भ: अल-काफ़ी, शेख़ कुलैनी, किताबुल हुज्जा, इमाम की पहचान और उनकी ओर रुजू करने से संबंधित अध्याय।
इस रिवायत से इमाम की पहचान की अहमियत स्पष्ट होती है। इमाम की मारिफ़त केवल उनका नाम जान लेने का नाम नहीं है। इसमें इमाम (अ) के धार्मिक मार्गदर्शन को पहचानना, सत्य का अनुसरण करना और अपने जीवन को ईश्वरीय मार्गदर्शन के अनुसार ढालने का प्रयास करना भी शामिल है।
हमें स्वयं से सवाल करना चाहिए: क्या हमारा इंतज़ार हमें सच बोलने वाला बनाता है? क्या हम अपने समाज में न्याय, अमानतदारी और इंसानों की सेवा को बढ़ावा देते हैं? क्या हम मज़लूम महिलाओं, यतीमों, ग़रीबों और वंचित लोगों के अधिकारों के लिए खड़े होते हैं?
यदि हम इमामे ज़माना (अ) के ज़ुहूर के मुंतज़िर हैं, तो हमें अपने जीवन में न्याय, तक़वा, दया और इंसानियत की सेवा के लिए जगह बनानी चाहिए।
5. इंतज़ार-ए-फ़रज उम्मीद और ज़िम्मेदारी का नाम है
इमामिया रिवायती साहित्य में इंतज़ार-ए-फ़रज की फ़ज़ीलत के बारे में अनेक रिवायतें मिलती हैं। शेख़ सदूक़ की कमालुद्दीन व तमामुन नेमत और शेख़ नोमानी की किताबुल ग़ैबत इस विषय के महत्वपूर्ण स्रोतों में शामिल हैं।
इंतज़ार का वास्तविक अर्थ यह नहीं है कि इंसान परिस्थितियों के बदलने की प्रतीक्षा करते हुए अपनी ज़िम्मेदारियां छोड़ दे। सच्चा इंतज़ार इंसान को सक्रिय, नैतिक और सत्य के लिए दृढ़ बनाता है।
हमारी दुआएं होनी चाहिए:
ऐ अल्लाह! हमारे दिलों को सत्य पर स्थिर रख।
ऐ अल्लाह! इमामे ज़माना (अल्लाह उनके ज़ुहूर में जल्दी फ़रमाए) के ज़ुहूर में जल्द से जल्द फ़रमाइश कर।
ऐ अल्लाह! दुनिया के मज़लूमों की मदद फ़रमा, इंसानियत को युद्धों और फ़ितनों से सुरक्षित रख और हमें न्याय की स्थापना करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।
ऐ अल्लाह! हमें उन लोगों में शामिल कर, जो इमाम (अ) के इंतज़ार को अपने आत्मसुधार, इबादत और इंसानियत की सेवा का ज़रिया बनाते हैं।
6. फ़रज़ंदे ज़हरा (अ.ज.) से जुड़ाव और हमारी उम्मीद
अहले बैत (अ) से प्रेम करने वालों के लिए हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) के फ़रज़ंद, इमामे ज़माना (अ), उम्मीद और आस्था का केंद्र हैं।
हम इस उम्मीद के साथ जीवन बिताते हैं कि अल्लाह तआला का दीन बुलंद हो, मज़लूमों को न्याय मिले, अत्याचार और फ़साद का अंत हो तथा ज़मीन न्याय और इंसाफ़ से भर जाए।
इमाम महदी (अ) के बारे में प्रसिद्ध नबवी रिवायत में आया है कि वह ज़मीन को न्याय और इंसाफ़ से भर देंगे, जिस तरह वह अत्याचार और अन्याय से भर चुकी होगी। इस मज़मून की रिवायतें अहले सुन्नत और शिया, दोनों के स्रोतों में मिलती हैं। प्रत्येक रिवायत की सनद और शब्दों का अलग-अलग इल्मी अध्ययन किया जा सकता है।
यही वह उम्मीद है जो मोमिन को निराशा से बचाती है। यह उम्मीद हमें याद दिलाती है कि कठिन परिस्थितियां हमारी नैतिक ज़िम्मेदारियों को समाप्त नहीं करतीं और न ही किसी राजनीतिक परिवर्तन से अक़ीदा-ए-इमामत की बुनियाद कमज़ोर होती है।
हम ईरान, वहां की जनता, सभी मज़लूमों और पूरी इंसानियत के लिए शांति, सुरक्षा, न्याय और अल्लाह की रहमत के तलबगार हैं।
हमारी दुआ है कि अल्लाह तआला ईमान वालों की बेचैनी को सुकून में बदल दे, शहीदों के दर्जे बुलंद फ़रमाए, घायलों को शिफ़ा अता करे और सभी इंसानों को युद्ध एवं रक्तपात से सुरक्षित रखे।
समापन संदेश
ज़मीन कभी हुज्जते ख़ुदा से ख़ाली नहीं रहती। ग़ैबत के दौर में भी उम्मीद का चिराग़ रौशन रहता है।
हम इमामे ज़माना (अ) के ज़ुहूर के मुंतज़िर हैं, लेकिन हमारा इंतज़ार निष्क्रियता नहीं है। यह आत्मसुधार, सत्य का समर्थन, मज़लूमों की सेवा और न्याय की स्थापना के लिए संघर्ष है।
हमारी आंखें ज़ुहूर की उम्मीद में नम हैं, हमारे दिल अहले बैत (अ) की मोहब्बत से जुड़े हैं और हमारी ज़बानें दुआ में व्यस्त हैं।
ऐ अल्लाह! मुहम्मद और आले मुहम्मद (अ) के सदक़े में इमामे ज़माना (अ) के ज़ुहूर में जल्दी फ़रमा, हमें उनके सच्चे मुंतज़िरों और निष्ठावान मददगारों में शामिल कर और दुनिया को न्याय, शांति और रहमत से भर दे।
اَللّٰهُمَّ عَجِّلْ لِوَلِيِّكَ الْفَرَجَ ऐ अल्लाह! अपने वली के ज़ुहूर में जल्दी फ़रमा।
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