हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, छजुपुरा सादात, बिजनौर। हुज्जतुल इस्लाम सय्यद महदी अब्बास जैदी ने जुमे के ख़ुतबे में शहादत की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस्लामी शिक्षाओं में शहीद का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। कुरआन मजीद में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो लोग अल्लाह की राह में मारे गए हैं, उन्हें मृत न समझो, बल्कि वे अपने पालनहार के पास जीवित हैं और उन्हें रोज़ी दी जाती है।
उन्होंने कहा कि शहादत को केवल किसी व्यक्ति के जीवन के अंत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह एक विचार, उद्देश्य और मिशन की शुरुआत भी होती है। शहीद अपने बलिदान के माध्यम से समाज में एक ऐसी वैचारिक विरासत छोड़ जाता है, जो उसके दुनिया से चले जाने के बाद भी लोगों के दिलों और दिमाग में जीवित रहती है।
सय्यद मेहदी अब्बास जैदी ने कहा कि शहीद का खून कभी व्यर्थ नहीं जाता। उसका बलिदान समाज में जागरूकता पैदा करने, सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने और नई पीढ़ी की वैचारिकतरबीयत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शहीद का बलिदान आने वाली पीढ़ियों को संघर्ष, उद्देश्य, त्याग और मानवता के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
इमाम जुमा ने कहा कि इतिहास इस बात का गवाह है कि महान उद्देश्यों के लिए दिए गए बलिदान समाजों की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब कोई व्यक्ति अपने विश्वास, सिद्धांत और उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित करता है, तो उसका बलिदान केवल उसके परिवार या उसके समय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है।
हुज्जतुल इस्लाम सय्यद महदी अब्बास जैदी ने कहा कि इंसान की वास्तविक मृत्यु केवल उसके शरीर के समाप्त होने से नहीं होती। वास्तविक मृत्यु उस समय होती है, जब उसके विचार, उद्देश्य और सिद्धांत भी समाप्त हो जाएं। यदि किसी व्यक्ति के विचार समाज के दिलों और दिमाग में जगह बना लें और एक मिशन का रूप ले लें, तो वह व्यक्ति दुनिया से चले जाने के बाद भी अपने विचारों के माध्यम से जीवित रहता है।
उन्होंने कहा कि किसी महान उद्देश्य के लिए संघर्ष करने वाले व्यक्ति की पहचान केवल उसके जीवनकाल तक सीमित नहीं होती। उसके विचार, शिक्षाएं और आदर्श उसके बाद भी लोगों का मार्गदर्शन करते रहते हैं। यही कारण है कि शहीदों की याद केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाती है।
मौलाना महदी अब्बास ज़ैदी ने कहा कि नई पीढ़ी को शहीदों के जीवन, उनके संघर्ष और उनके उद्देश्यों से परिचित कराना आवश्यक है, ताकि युवा केवल शहादत के भावनात्मक पहलू को ही न समझें, बल्कि उन मूल्यों और सिद्धांतों को भी समझें जिनके लिए शहीदों ने बलिदान दिया।
छजुपुरा के इमाम जुमा ने शहीद सय्यद हसन नसरुल्लाह का उल्लेख करते हुए कहा कि वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार और एक विचारधारा के प्रतीक थे। उनके विचार और उद्देश्य एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचकर समाज और विशेष रूप से युवाओं को प्रभावित करते हैं।
मौलाना महदी अब्बास ने कहा कि किसी व्यक्ति की प्रभावशीलता केवल उसके जीवनकाल में उसके कार्यों से निर्धारित नहीं होती, बल्कि यह भी देखा जाता है कि उसके जाने के बाद उसके विचार समाज में किस प्रकार जीवित रहते हैं। यदि उसके विचार लोगों को जागरूक करते हैं, उन्हें किसी उद्देश्य के लिए प्रेरित करते हैं और उनके भीतर जिम्मेदारी का भाव पैदा करते हैं, तो उसका मिशन उसके बाद भी जारी रहता है।

उन्होंने कहा कि शहीद सय्यद हसन नसरुल्लाह की स्मृति और उनके विचार आज भी उनके समर्थकों और उन्हें मानने वाले लोगों के बीच चर्चा का विषय हैं। उनके जीवन और संघर्ष को उनके अनुयायी एक वैचारिक विरासत के रूप में देखते हैं, जो नई पीढ़ी तक पहुंच रही है।
जुमे के ख़ुतबे में खतीब ए जुमा ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह शहीदों के बलिदान को केवल नारों और स्मरण तक सीमित न रखे, बल्कि उनके जीवन से ईमानदारी, दृढ़ता, त्याग, जिम्मेदारी और मानवता जैसे मूल्यों को सीखे।
हुज्जतुल इस्लाम मौलाना महदी अब्बास ज़ैदी ने कहा कि समाज की तरक्की केवल भौतिक विकास से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए मजबूत विचार, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी की भी आवश्यकता है। यदि युवा अपने उद्देश्य को पहचानें और समाज की भलाई के लिए अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल करें, तो वे समाज के भविष्य को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
उन्होने कहा कि शहीद का बलिदान समाज के लिए एक संदेश होता है। यह संदेश लोगों को अपने कर्तव्यों को समझने, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने, मानव गरिमा की रक्षा करने और समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए प्रयास करने की प्रेरणा देता है।
मौलाना ने अंत में कहा कि शहीद दुनिया से विदा हो जाता है, लेकिन उसके विचार, उद्देश्य और आदर्श समाज में जीवित रह सकते हैं। इसलिए शहीदों की वास्तविक याद यही है कि उनके बताए मूल्यों को समझा जाए और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए। जिस विचार को लोग अपने जीवन का उद्देश्य बना लेते हैं, वह विचार समय बीतने के साथ समाप्त नहीं होता, बल्कि नई पीढ़ियों के माध्यम से आगे बढ़ता रहता है।
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