हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मौलाना सय्यद मैहदी अब्बास जैदी ने कहा कि जनाबे जैनब सलामुल्लाह अलैहा ने अपने खुतबे के जरिए जुल्म और ज्यादती के खिलाफ हक की ऐसी आवाज बुलंद की, जिसने जालिमों के प्रोपेगेंडे को बेनकाब कर दिया। उन्होंने अपने किरदार, सब्र, बसीरत और इस्तेकामत से साबित किया कि कैद और मुश्किलों के जरिए हक की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।
उन्होंने जनाबे जैनब के खुतबे के एक अहम जुमले का हवाला देते हुए कहा, “क्या तुम रोते हो? हां, खुदा की कसम! खूब रोओ और कम हंसो, क्योंकि तुम अपने दामन पर ऐसी रुसवाई और बदनामी का दाग लगा चुके हो, जिसे कभी धो नहीं सकते।”
छजुपुरा के इमाम जुमा ने कहा कि जनाबे जैनब ने अपने खुतबे के जरिए लोगों को उनके किरदार और आमाल की हकीकत का एहसास कराया। आपने जुल्म की असलियत को इस अंदाज में उजागर किया कि लोग शर्मिंदगी और नदामत के आंसू बहाने पर मजबूर हो गए। आपका किरदार आज भी हक पसंद लोगों के लिए मिसाल है।
मौलाना ने कहा कि जनाबे जैनब के अंदर यह हौसला, जज्बा और इस्तेकामत सब्र, ईमान, यकीन और अपने मकसद से अटूट वाबस्तगी की वजह से थी। आपने मुसीबतें और कैद की सख्तियां बर्दाश्त कीं, लेकिन हक बयान करने से पीछे नहीं हटीं। अपने किरदार की अजमत और मकसद की हकानियत पर कोई समझौता नहीं किया।
इमाम जुमा सय्यद अब्बास महदी ज़ैदी ने कहा कि समाज में अक्सर सब्र को कमजोरी समझ लिया जाता है, जबकि सब्र कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत, हिम्मत और इस्तेकामत का नाम है। कमजोरी इंसान को हक से दूर करती है, जबकि सब्र उसे अपने मकसद पर कायम रहने का हौसला देता है। जनाबे जैनब ने अपने किरदार से साबित किया कि मोमिन की असल ताकत उसके जाहिरी हालात में नहीं, बल्कि उसके ईमान, यकीन और पाकीजा मकसद में होती है।
उन्होंने कहा कि आज सीरत-ए-जैनबी को केवल महिलाओं तक सीमित कर दिया गया है, जबकि जनाबे जैनब की सीरत समाज के हर वर्ग, खासकर युवाओं के लिए भी जरूरी है। आज के नौजवानों को फिक्र-ए-जैनब, बसीरत-ए-जैनब और किरदार-ए-जैनबी को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाने की जरूरत है।
मौलाना सय्यद महदी अब्बास जैदी ने कहा कि जनाबे जैनब ने दुश्मन के प्रोपेगेंडे को समझकर उसकी हकीकत उजागर की। आज के युवाओं को भी दुश्मन के प्रोपेगेंडे का शिकार होने से बचना चाहिए और हालात का जायजा बसीरत के साथ लेना चाहिए। सब्र के नाम पर बुजदिली का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, क्योंकि सब्र इंसान को बहादुर बनाता है, बुजदिल नहीं। जहां मौका मिले, हकीकत सामने लानी चाहिए और जुल्म व नाइंसाफी को बेनकाब करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हक के रास्ते में कैद, सख्तियां और मुश्किलें आ सकती हैं, लेकिन इन हालात से घबराकर अपने मकसद से पीछे नहीं हटना चाहिए। इंसान को जाहिरी मुश्किलों से प्रभावित होकर घर बैठने के बजाय इस्तेकामत के साथ अपने मौकिफ पर डटे रहना चाहिए।
छजुपुरा के इमाम जुमा ने कहा कि मौजूदा दौर में खासकर युवाओं को जनाबे जैनब की सीरत से सब्र, बसीरत, हौसले और हकगोई का सबक लेना चाहिए तथा हर हाल में हक और सच्चाई का साथ देते हुए अपने मकसद पर कायम रहना चाहिए।
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