शुक्रवार 2 अक्टूबर 2026 - 19:03
बच्चों की परवरिश माता-पिता की शरई जिम्मेदारी, तवक्कुल और इस्तिक़ामत से मिलती है ईश्वरीय मदद: सय्यद अरशद हुसैन मूसवी

सूफ़ीपुरा, पहलगाम में नमाज़-ए-जुमा के ख़ुत्बे को संबोधित करते हुए हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आगा सैयद अरशद हुसैन मूसा्वी ने बच्चों की परवरिश, माता-पिता की शरई जिम्मेदारियों, इलाही सुन्नत, तवक्कुल और इस्तिक़ामत सहित विभिन्न विषयों पर प्रकाश डाला। उन्होंने मोमिनों को धार्मिक एवं नैतिक प्रशिक्षण देने तथा अल्लाह पर भरोसा रखने की ताकीद की।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, सूफ़ीपोरा, पहलगाम में नमाज़-ए-जुमा की इमामत हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आगा सैयद अरशद हुसैन मूसा्वी ने की। उन्होंने हम्द व सना-ए-इलाही और हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम तथा आले-मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम पर दुरूद व सलाम के बाद नमाज़ियों को तक़वा और परहेज़गारी अपनाने की नसीहत की।

बच्चों की परवरिश माता-पिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी

आगा सैयद अरशद हुसैन मूसा्वी ने रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की हदीस को अपने ख़ुत्बे का विषय बनाते हुए कहा कि बच्चों के संबंध में पिता की तीन बुनियादी जिम्मेदारियां हैं—बच्चे का अच्छा नाम रखना, उसकी शिक्षा व परवरिश का उचित प्रबंध करना और उसके बालिग़ होने पर उसके निकाह की व्यवस्था करना।

उन्होंने हदीस-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ‘कुल्लुकुम राअिन व कुल्लुकुम मसऊलुन अन रइय्यतिहि’ का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस तरह शासक अपनी प्रजा के बारे में जवाबदेह होता है, उसी तरह माता-पिता और घर के जिम्मेदार लोग भी अपनी संतान की परवरिश के संबंध में क़यामत के दिन जवाबदेह होंगे।

उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों की परवरिश केवल नसीहत और उपदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि माता-पिता का आचरण, बातचीत, व्यवहार और व्यावहारिक जीवन भी बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई पिता अपने बच्चे को सच बोलने की नसीहत करे, लेकिन स्वयं उसके सामने झूठ बोले, तो उसकी नसीहत का अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसलिए माता-पिता को अपने व्यवहार के माध्यम से बच्चों के लिए आदर्श बनना चाहिए।

उन्होंने नेक औलाद को माता-पिता के लिए बाक़ियात-ए-सालेहात बताते हुए कहा कि नेक संतान के अच्छे कार्यों का सवाब माता-पिता को उनके निधन के बाद भी मिलता रह सकता है।

बच्चों के शरई अधिकारों की जानकारी जरूरी

ख़तीब-ए-जुमा ने विलायत के मसले की व्याख्या करते हुए कहा कि बच्चे की शरई विलायत पिता और दादा के पास होती है, जबकि मां, चाचा और मामा जैसे अन्य रिश्तेदार अपने आप बच्चे के शरई वली नहीं होते।

उन्होंने मोमिनों से अपने शरई मसाइल और अधिकारों की जानकारी हासिल करने पर जोर देते हुए कहा कि शरई मसलों से अनभिज्ञता के कारण इंसान कभी-कभी अनावश्यक परेशानियों और गलत फैसलों में फंस जाता है। उन्होंने कहा कि परिवार के प्रत्येक सदस्य के शरई अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए, ताकि परिवार धार्मिक और आध्यात्मिक आधारों पर मजबूत हो।

इलाही सुन्नत और इलाही रहनुमाओं की हिफाज़त

दूसरे ख़ुत्बे में हम्द व सना-ए-इलाही के बाद आगा सैयद अरशद हुसैन मूसा्वी ने मजलिस-ए-ख़बरगान के एक आलिम से मनसूब बयान का हवाला देते हुए आयतुल्लाह सैयद मुजतबा ख़ामेनेई से संबंधित 28 फरवरी 2026 को हुए हमले और उसके बाद अस्पताल में उन पर हुए दूसरे हमले का उल्लेख किया। उन्होंने उनके सुरक्षित रहने की घटना को इलाही सुन्नत के संदर्भ में बयान करते हुए कहा कि अल्लाह तआला अपने विशेष बंदों और अपनी हुज्जतों की विभिन्न तरीकों से हिफाज़त करता है।

उन्होंने वाक़ेआ-ए-कर्बला का उदाहरण देते हुए कहा कि दुश्मन खानदान-ए-रसूल का नामो-निशान मिटाना चाहता था, लेकिन अल्लाह तआला ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के माध्यम से सिलसिला-ए-इमामत और खानदान-ए-रसूल की हिफाज़त की। इसी तरह उन्होंने इमाम-ए-ज़माना अज्जलल्लाहु तआला फरजहुश्शरीफ़ की ग़ैबत को भी इलाही सुन्नत के तहत हिफाज़त की एक मिसाल बताया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि इमाम-ए-ज़माना अलैहिस्सलाम की ग़ैबत का अर्थ यह नहीं है कि वे किसी एक स्थान पर अलग-थलग और छिपकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं, बल्कि वे अल्लाह के आदेश से लोगों के बीच मौजूद हो सकते हैं, हालांकि लोग उन्हें पहचान नहीं पाते।

उन्होंने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के वाक़िए को उदाहरण के रूप में पेश करते हुए कहा कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाई उन्हें देखते और उनके साथ रहते थे, लेकिन उन्हें पहचान नहीं पाते थे। इसी तरह उन्होंने कहा कि अल्लाह तआला ने रहबर-ए-इंक़िलाब को अमेरिकी और इज़राइली हमलों से सुरक्षित रखा।

तवक्कुल और इस्तिक़ामत इलाही मदद का माध्यम

ख़तीब-ए-जुमा ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि अल्लाह तआला अपने बंदों की विभिन्न रूपों में मदद और नुसरत करता है, बशर्ते बंदा अपने परवरदिगार पर तवक्कुल करे और उसकी राह में इस्तिक़ामत अपनाए।

उन्होंने मोमिनों को तवक्कुल, सब्र और इस्तिक़ामत के साथ दीन-ए-ख़ुदा पर क़ायम रहने की नसीहत करते हुए कहा कि कठिनाइयों और आज़माइशों के बावजूद अल्लाह पर भरोसा और दृढ़ता मोमिन की ताक़त है।

अंत में आगा सैयद अरशद हुसैन मूसा्वी ने आलम-ए-इस्लाम की सफलता, सरबुलंदी और उरूज के लिए दुआ की।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha