हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली, जामा मस्जिद कश्मीरी गेट मे 2 अक्टूबर 2026 को नमाज़ ए जुमा अदी की गई, जिसकी इमामत हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना नेअमत अली साहब क़िबला ने करते हुए कहा कि दुनिया की ज़िंदगी बहुत मुख़्तसर और आख़िरत की ज़िंदगी हमेशा रहने वाली है, इसलिए अक़्लमंद इंसान को थोड़े समय की दुनियावी ज़िंदगी के बदले अपनी अबदी आख़िरत को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए।
मौलाना नेअमत अली ने कहा कि इंसान की मौजूदा ज़िंदगी को अगर ग़ौर से देखा जाए तो इसका बड़ा हिस्सा बे-शऊरी, पढ़ाई, रोज़गार, नींद और दूसरी ज़रूरतों में गुज़र जाता है। इंसान के पास हक़ीक़त में बहुत कम समय बचता है, लेकिन इसी थोड़े से समय के बदले अल्लाह तआला ने अबदी जन्नत का वादा किया है।
उन्होंने कहा कि कोई अक़्लमंद व्यक्ति थोड़े से फ़ायदे के लिए बड़ा नुकसान स्वीकार नहीं करता। इसी तरह मोमिन दुनिया की थोड़ी और अस्थायी लज़्ज़त के लिए अपनी आख़िरत को खराब नहीं करता।
ख़तीब ए जुमा ने कहा कि दुनिया की ज़िंदगी परेशानियों से भरी हुई है। सर्दी में इंसान सर्दी से परेशान होता है, गर्मी में गर्मी से, बारिश अधिक हो तो बारिश से परेशानी होती है और रात में मच्छर तथा दिन में शोर और ट्रैफ़िक इंसान को परेशान करते हैं। इसके बावजूद इंसान इसी दुनिया को हासिल करने के लिए अपनी आख़िरत को दांव पर लगा देता है।
उन्होंने कहा कि दुनिया में अगर कोई सबसे खूबसूरत और सुकून देने वाला क्षण है तो वह वह समय है जब इंसान अल्लाह की बारगाह में खड़ा होता है और विशेष रूप से सज्दे की हालत में होता है।
मौलाना नेअमत ने जन्नत की नेमतों का ज़िक्र करते हुए कहा कि वहां बुढ़ापा, बीमारी, कमज़ोरी और इंसानी परेशानियों का कोई तसव्वुर नहीं होगा। इंसान हमेशा जवानी और खूबसूरती की हालत में रहेगा।
उन्होंने कहा कि जन्नत ऐसी जगह है जहां इंसान की इच्छाएं पूरी होंगी और उसे अपनी ज़रूरत की चीज़ों के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। दुनिया की कुछ वर्षों की ज़िंदगी के बदले अबदी जन्नत मिलना ऐसा सौदा है जिसे मोमिन को हर हाल में सुरक्षित रखना चाहिए।
ख़तीब ए जुमा ने कहा कि जन्नत की तमाम नेमतों में सबसे बड़ा इनाम अल्लाह की रज़ामंदी और उसकी ओर से सलाम है। जब जन्नती यह आवाज़ सुनेगा कि उसके रब ने उससे रज़ामंदी का इज़हार किया है तो उसकी खुशी और प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं होगी।
उन्होंने कहा कि जन्नत की इन नेमतों को हासिल करने के लिए इंसान को मुत्तक़ी बनना होगा और अपने आमाल को शरीयत के मुताबिक़ ढालना होगा।
मौलाना ने तक़वा और ज़ोह्द के बीच अंतर बताते हुए कहा कि ज़ाहिद होना बहुत ऊंचा मक़ाम है, जबकि मुत्तक़ी होना हर मोमिन के लिए मुमकिन है। मुत्तक़ी वह है जो वाजिबात को अदा करे, हराम कामों से बचे और अपने दामन को गुनाहों से बचाने की कोशिश करे।
उन्होंने कहा कि अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली (अ) ज़ोह्द और तक़वा के सबसे ऊंचे मक़ाम पर थे। हमें उनकी पैरवी करते हुए कम से कम इतना ज़रूर करना चाहिए कि वाजिबात को न छोड़ें और हराम कामों से बचें।
ख़ुत्बे के दौरान मौलाना नेअमत अली ने ग़ीबत को समाज में फैलने वाला एक गंभीर गुनाह बताया और मोमेनीन को इससे बचने की नसीहत की। उन्होंने कहा कि कई बार इंसान अनजाने में किसी तीसरे व्यक्ति की ऐसी बात कर देता है जो ग़ीबत के दायरे में आ जाती है।
उन्होंने सूरह हुजुरात की आयतों का हवाला देते हुए कहा कि क़ुरआन ने ग़ीबत की सख़्त मज़म्मत की है और इसे अपने मुर्दा भाई का गोश्त खाने से तश्बीह दी है।
मौलाना ने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की रिवायत का हवाला देते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति में वास्तव में कोई ऐब मौजूद हो और उसकी अनुपस्थिति में उसी ऐब को बयान किया जाए तो यह ग़ीबत है। लेकिन अगर वह ऐब उसमें मौजूद ही न हो और उसके बारे में ऐसी बात कही जाए तो यह तोहमत है, जो और भी गंभीर गुनाह है।
उन्होंने कहा कि कुछ विशेष परिस्थितियों में किसी व्यक्ति की बुराई बयान करने की शरीयत ने अनुमति दी है, जैसे किसी के धार्मिक कर्तव्यों में गंभीर लापरवाही के बारे में उचित व्यक्ति को जानकारी देना, विवाह के मामले में आवश्यक जानकारी देना या किसी व्यक्ति द्वारा किए गए ज़ुल्म की शिकायत करना। हालांकि इन मामलों में भी हद से आगे बढ़ने और अतिरिक्त बातें जोड़ने से बचना चाहिए।
मौलाना ने कहा कि इंसान को ऐसी महफ़िलों से बचना चाहिए जहां दूसरों की बुराई और ग़ीबत शुरू हो जाए। उन्होंने मोमेनीन को नसीहत की कि अगर किसी महफ़िल में ग़ीबत का माहौल बन रहा हो तो बातचीत का रुख़ बदल देना चाहिए और ऐसी बात करनी चाहिए जिससे ग़ीबत का सिलसिला रुक जाए।
उन्होंने हदीस का हवाला देते हुए कहा कि अपनी महफ़िलों को ज़िक्र-ए-अली इब्ने अबी तालिब (अ) से सजाया जाए। इस तरह इंसान अपनी बातचीत को नेक और उपयोगी विषयों की ओर ले जा सकता है और ग़ीबत जैसी बुराई से बच सकता है।
ख़ुत्बे के अंत में मौलाना ने मोमेनीन और दुनिया के तमाम मज़लूमों के लिए दुआ की तथा अल्लाह तआला से सभी को तक़वा, नेक अमल, गुनाहों से बचने और आख़िरत की कामयाबी हासिल करने की तौफ़ीक़ मांगी।
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