शुक्रवार 9 अक्टूबर 2026 - 18:02
रसूले अकरम (स.अ.) की सीरत इस्लामी सभ्यता के निर्माण के लिए बेहतरीन आदर्श है: आयतुल्लाह हुसैनी बूशहरी

क़ुम मुक़द्दसा के इमामे जुमा आयतुल्लाह सैयद हाशिम हुसैनी बूशहरी ने कहा कि इस्लामी समाज के निर्माण, न्याय की स्थापना, शिक्षा एवं प्रशिक्षण और उम्मते मुस्लिम के सम्मान व गौरव की रक्षा के लिए रसूले अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) की सीरत पर अमल करना ज़रूरी है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाह सैयद हाशिम हुसैनी बूशहरी ने 9 अक्टूबर 2026 को क़ुम के मुसल्ला-ए-क़ुद्स में नमाज़े जुमा के ख़ुत्बों के दौरान विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक मुद्दों पर विचार व्यक्त किए।

उन्होंने जनता के निरंतर समर्थन की सराहना करते हुए कहा कि शहीद रहबर की शहादत और नए रहबर के चयन के बीच के समय में जनता ने मजलिस-ए-ख़ुबरेगान-ए-रहबरी और अन्य ज़िम्मेदार अधिकारियों के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि इस्लामी क्रांति के रहबर के संदेश मार्गदर्शन का अहम स्रोत हैं और उन पर अमल करना सफलता की गारंटी है।

आयतुल्लाह हुसैनी बूशहरी ने कहा कि दुश्मन ने युद्ध, आतंकवाद तथा आर्थिक, समुद्री और हवाई प्रतिबंधों के ज़रिए ईरानी क़ौम की सहनशक्ति को आज़माने की कोशिश की, लेकिन जनता ने साबित कर दिया कि वह कठिन परिस्थितियों का मुक़ाबला कर सकती है। अब दुश्मन सांस्कृतिक हमले के माध्यम से समाज के मूल्यों को कमज़ोर करने और नैतिक पतन को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने माता-पिता, शिक्षकों और संबंधित अधिकारियों को नई पीढ़ी की वैचारिक एवं नैतिक सुरक्षा की ज़िम्मेदारी याद दिलाई।

क़ुम की धार्मिक पहचान पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि क़ुम अहले बैत (अ.स.) का हरम है। इसलिए यहां नैतिक पतन और ग़लत प्रवृत्तियों को सामान्य बनने से रोकना आवश्यक है। सरकार, संबंधित मंत्रियों, न्यायपालिका और सभी ज़िम्मेदार संस्थाओं को इस संबंध में अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए।

इराक़ की संप्रभुता के बारे में उन्होंने कहा कि प्रतिरोधी मोर्चे ने अमेरिकी सैनिकों को इराक़ छोड़ने के लिए मजबूर किया। उन्होंने इराक़ी अधिकारियों से मज़बूत रुख़ अपनाने और अमेरिकी सैनिकों की दोबारा वापसी का रास्ता रोकने की अपील की। उन्होंने कहा कि इराक़ की संप्रभुता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी ईरान की।

ईरानी खिलाड़ियों की सफलताओं पर उन्हें बधाई देते हुए आयतुल्लाह हुसैनी बूशहरी ने कहा कि ईरानी युवा युद्ध जैसी कठिन परिस्थितियों में भी खेल, विज्ञान और कूटनीति के क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रदर्शन कर रहे हैं।

उन्होंने अधिकारियों से जनता की आर्थिक परेशानियों को दूर करने के लिए प्रभावी योजनाएं बनाने, विशेषज्ञों से परामर्श लेने और देश के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ आम लोगों तक पहुंचाने की मांग की। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाज़ारों में वस्तुओं का उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता की क्रयशक्ति भी उतनी ही ज़रूरी है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि लोग अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के लिए आवश्यक वस्तुएं खरीदने से भी वंचित हो जाएं।

पहले ख़ुत्बे में आयतुल्लाह हुसैनी बूशहरी ने इमाम रज़ा (अ.स.) की एक हदीस का हवाला देते हुए कहा कि वास्तविक सम्मान तक़वे में है। सच्ची परहेज़गारी यह है कि इंसान अकेले में भी अल्लाह तआला की अवज्ञा से बचे।

रसूले अकरम (स.अ.) की सीरत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम ने कड़े विरोध के बावजूद इस्लाम के संदेश को अरब प्रायद्वीप से बाहर तक पहुंचाया। आज इस्लामी क्रांति को भी ऐसे दुश्मनों का सामना है, जो समाज के मूल्यों को प्रभावित करने और इस्लामी मोर्चे में निराशा पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने शहीद रहबर द्वारा बताए गए इस्लामी क्रांति के पांच चरणों का उल्लेख किया: इस्लामी क्रांति, इस्लामी व्यवस्था, इस्लामी सरकार, इस्लामी समाज और इस्लामी सभ्यता। उन्होंने कहा कि इन अंतिम लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए रसूले अकरम (स.अ.) की सीरत से मार्गदर्शन प्राप्त करना आवश्यक है।

आयतुल्लाह हुसैनी बूशहरी ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) के मिशन के छह बुनियादी सिद्धांत भी बयान किए। इनमें शिर्क का उन्मूलन, शिक्षा एवं प्रशिक्षण, न्याय की स्थापना, शुभ समाचार और आशा का संदेश देना, दुश्मन की सत्ता को कमज़ोर करना तथा उम्मते मुस्लिम को सम्मान प्रदान करना और अल्लाह की हाकिमियत स्थापित करना शामिल हैं।

उन्होंने आगे कहा कि उचित ढंग से संदेश पहुंचाना, व्यावहारिक चरित्र प्रस्तुत करना, दुश्मन की साज़िशों का मुक़ाबला करना, सूचना संबंधी रणनीति अपनाना, समझौतों का पालन करना, समय और परिस्थितियों की सही पहचान करना तथा प्रभावी नारों का चयन करना भी इस्लामी लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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