हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,मशहूर धर्मगुरु, प्रचारक और शिक्षक मौलाना सैयद नासिर अब्बास जैदी का 14 अक्टूबर 2026 को निधन हो गया। उन्होंने धर्म के प्रचार-प्रसार, मजलिसों, धार्मिक शिक्षा और जनसेवा के क्षेत्र में बहुमूल्य सेवाएं अंजाम दीं। मदरसा बैतुल इल्म के माध्यम से नई पीढ़ी की धार्मिक शिक्षा और तरबीयत में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मौलाना सैयद नासिर अब्बास जै़दी के निधन की खबर सुनकर दिल को गहरा दुख पहुंचा। उनकी शैक्षिक, धार्मिक, प्रचारात्मक और कल्याणकारी सेवाओं को हमेशा याद रखा जाएगा। मरहूम एक धार्मिक, विद्वतापूर्ण और प्रचारक परिवार के प्रतिष्ठित सदस्य थे।
मौलाना सैयद नासिर अब्बास का जन्म जिला अमरोहा के फंदेड़ी सादात नामक गांव में हुआ था। उनके पिता मौलाना सैयद मुख्तार हुसैन भारतीय उपमहाद्वीप के प्रसिद्ध प्रचारकों और शिक्षकों में से थे। उन्होंने भारत के विभिन्न शहरों में इस्लाम की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार और धार्मिक शिक्षा के क्षेत्र में सेवाएं अंजाम दीं।
मौलाना नासिर अब्बास ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने पैतृक गांव में प्राप्त की। वहां उन्होंने विशेष रूप से अपने दादा कारी मेंहदी हसन से कुरआन और धार्मिक विषयों की बुनियादी शिक्षा हासिल की। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उनके पिता उन्हें मदरसा मंसबिया, मेरठ ले गए, जो शैक्षिक दृष्टि से एक प्रतिष्ठित संस्थान माना जाता है।
मदरसा ए मंसबिया में उन्होंने मौलाना इबरार हुसैन, मौलाना सैयद रेहान, मौलाना शबीह मोहम्मद, मौलाना रिफअत हुसैन और मौलाना अफज़ाल हुसैन जैसे प्रतिष्ठित विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा के दौरान उन्होंने मौलवी, मुंशी, आलिम, कामिल, अदीब, अदीब माहिर और अदीब कामिल सहित कई शैक्षिक प्रमाणपत्र हासिल किए।
15 वर्ष की उम्र से तब्लीग की शुरुआत:
शिक्षा पूरी करने के बाद मौलाना नासिर अब्बास ने धर्म के प्रचार-प्रसार का कार्य शुरू किया। उन्होंने मात्र 15 वर्ष की उम्र में मजलिसों और धार्मिक भाषणों का सिलसिला शुरू कर दिया था। इसके बाद उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचारात्मक यात्राएं कीं और लोगों तक धार्मिक शिक्षाओं को पहुंचाया।
उनकी प्रमुख प्रचारात्मक सेवाओं के स्थानों में गुजरात के जिला भावनगर का तरापच शामिल है, जहां उन्होंने 10 वर्षों तक मुहर्रम और सफर के महीनों में मजलिसें पढ़ीं। इसी तरह कच्छ के जिला भुज के नागलपुर में नौ वर्षों तक मुहर्रम के पहले दस दिनों में खिताब किए।
इसके अतिरिक्त उन्होंने मुंद्रा, मामंडी, मुंबई के मदरसा कादिर, संभलीड़ा, कोवाल, चांदपुर, हरि नूरपुर, मेमन सादात, औरंगाबाद, सांखनी, एटा, शेरकोट, रसूलपुर, बेड़ा सादात और बदनपुर सहित कई स्थानों पर धार्मिक सेवाएं अंजाम दीं।
पुरानी दिल्ली की मस्जिद ए शियान-ए-अली, सुईवालान में भी वे इमामत और धर्म के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारियां निभाते रहे।
मदरसा बैतुल इल्म के माध्यम से शिक्षा की सेवा:
धार्मिक प्रचार के दौरान प्राप्त अनुभवों और अवलोकनों ने मौलाना नासिर अब्बास ज़ैदी को अपने पैतृक क्षेत्र में धार्मिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया। इसी उद्देश्य से उन्होंने मदरसा बैतुल इल्म की स्थापना की। इस संस्थान में उन्होंने शिक्षण कार्य किया और शिक्षा एवं प्रशिक्षण के माध्यम से नई पीढ़ी को धार्मिक ज्ञान से परिचित कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनके प्रशिक्षण और मार्गदर्शन से कई प्रतिष्ठित विद्वान तैयार हुए। इनमें मौलाना अजहर साखनवी, मौलाना इरफान साखनवी, मौलाना मोहम्मद हसनैन (उनके पुत्र), मौलाना जाकिर हुसैन मेमनवी, मौलाना जुल्फिकार संभली और स्वयं लेख लिखने वाले व्यक्ति भी शामिल हैं।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की पहल
मौलाना नासिर अब्बास जैदी ने अपने जीवन के अंतिम चरण में महिलाओं के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित किया। इसका उद्देश्य महिलाओं को सिलाई और कढ़ाई का हुनर सिखाकर आत्मनिर्भर बनने में सहायता करना था। यह पहल उनके सामाजिक सरोकारों और जनकल्याण की भावना को दर्शाती है।
अल्लाह ने उन्हें तीन बेटियों और तीन बेटों से नवाजा था। उनके बेटों में मौलाना सैयद मोहम्मद हसनैन, जो ईरान के पवित्र शहर क़ुम में रहते हैं, मौलाना अली ज़मान और अली हसनैन शामिल हैं।
इस दु:खद अवसर पर हम मरहूम के समस्त परिवारजनों, संबंधियों, शिष्यों और श्रद्धालुओं के प्रति हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं। विशेष रूप से मौलाना सैयद मोहम्मद हसनैन और मौलाना सैयद अली ज़मान की सेवा में ताज़ियत और तसलीयत पेश करते हैं।
बारगाह-ए-इलाही में दुआ है कि परवरदिगार-ए-आलम मरहूम को अपनी व्यापक रहमत के साये में स्थान प्रदान करे, उनकी मगफिरत फरमाए, उनकी धार्मिक और प्रचारात्मक सेवाओं को शर्फ-ए-कबूलियत अता करे तथा उनके दर्जे बुलंद फरमाए। अल्लाह ताला परिवार वालों को सब्र आता करें।

आमीन, या रब्बुल आलमीन।
मौलाना सैयद रज़ी हैदर फंदीड़वी, दिल्ली
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