गुरुवार 15 अक्टूबर 2026 - 14:43
सुन्नी और शिया मुसलमानों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, संवाद के माध्यम से मतभेदों का समाधान और सांप्रदायिक कट्टरता का मुकाबला करना आवश्यक। डॉ. अब्दुल गनी शम्सुद्दीन

हौज़ा / अंतरराष्ट्रीय सेवा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, एशिया के उलेमा परिषद के अध्यक्ष डॉ. अब्दुल गनी शम्सुद्दीन ने इस्लामी उम्मत की एकता पर ज़ोर देते हुए सुन्नी और शिया मुसलमानों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को मजबूत बनाने, धार्मिक मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने और सांप्रदायिक कट्टरता का मुकाबला करने की आवश्यकता पर बल दिया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , अंतरराष्ट्रीय सेवा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, एशिया के उलमा परिषद के अध्यक्ष डॉ. अब्दुल गनी शम्सुद्दीन ने इस्लामी उम्मत की एकता पर जोर देते हुए सुन्नी और शिया मुसलमानों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को मजबूत बनाने, धार्मिक मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने और सांप्रदायिक कट्टरता का मुकाबला करने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. अब्दुल गनी शम्सुद्दीन ने बुधवार, को वैश्विक संगठन क़ादिमून के तत्वावधान में आयोजित पैगंबर मोहम्मद (स.स.व.) की उम्मत के पुनर्जागरण के पांचवें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि इस्लामी उम्मत की एकता समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है और मुसलमानों के बीच आपसी सहयोग तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

उन्होंने पवित्र कुरआन की शिक्षाओं और इस्लामी शरीयत के उच्च उद्देश्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म, जीवन, मानव गरिमा और सामाजिक स्थिरता की रक्षा के लिए मुसलमानों की एकता आवश्यक है। उन्होंने कुरआन की इस आयत का हवाला दिया,और तुम सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मजबूती से थाम लो और आपस में बँटो मत।(सूरह आले इमरान, 3:103)

उन्होंने नुकसान पहुँचाने वाले मतभेदों से बचने और मुसलमानों के बीच एकजुटता बनाए रखने पर जोर दिया।

डॉ. शम्सुद्दीन ने कहा कि धार्मिक मतभेदों को आपसी संघर्ष, किसी समुदाय के बहिष्कार या मुसलमानों को काफिर घोषित करने का आधार नहीं बनना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न धार्मिक मतों से संबंध रखने के बावजूद मुसलमान अल्लाह पर ईमान, पैगंबर-ए-अकरम हजरत मोहम्मद (स.ल.) और पवित्र कुरआन पर विश्वास जैसे बुनियादी सिद्धांतों में एकमत हैं। इन साझा मान्यताओं को आपसी बातचीत और सहयोग का आधार बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने इस्लामी मतों के अनुयायियों के बीच परस्पर सम्मान की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पैगंबर-ए-अकरम (स.ल.) के अहले-बैत और उनके सहाबा का सम्मान करना तथा मुसलमानों के लिए आदरणीय धार्मिक हस्तियों के प्रति अपमानजनक भाषा, गाली-गलौज और बेअदबी से बचना एकता और भाईचारे को बनाए रखने के लिए ज़रूरी है।

उन्होंने आगे कहा कि मुसलमानों के जीवन, संपत्ति और सम्मान की रक्षा इस्लामी शरीयत के बुनियादी सिद्धांतों में शामिल है। सांप्रदायिक हिंसा का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक मतभेदों को हिंसा को उचित ठहराने, फसाद फैलाने या सशस्त्र संघर्ष भड़काने का बहाना नहीं बनाया जाना चाहिए। इस्लामी समाजों की स्थिरता के लिए सामाजिक शांति को मजबूत करना और धार्मिक तनाव बढ़ाने वाले हस्तक्षेपों को रोकना आवश्यक है।

धार्मिक मतभेदों से निपटने के सही तरीकों का उल्लेख करते हुए डॉ. शम्सुद्दीन ने जिम्मेदार संवाद, वैज्ञानिक एवं अकादमिक शोध और मतभेदों के दौरान शिष्टाचार बनाए रखने को महत्वपूर्ण उपाय बताया। उन्होंने धार्मिक मंचों, मीडिया और राजनीतिक मंचों का इस्तेमाल नफरत फैलाने, धार्मिक भावनाओं को भड़काने तथा दूसरे मुसलमानों की मान्यताओं को ठेस पहुँचाने के लिए करने से बचने की अपील की।

एशिया के उलमा परिषद के अध्यक्ष ने विभिन्न इस्लामी मतों के विद्वानों और विचारकों के बीच सहयोग की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि मतभेद वाले विषयों पर विचार-विमर्श करने और सांप्रदायिक तनाव को रोकने के लिए साझा शैक्षणिक एवं परामर्श तंत्र स्थापित करना उपयोगी होगा। इससे मतभेदों को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने और इस्लामी समाजों के व्यापक हितों की रक्षा करने में मदद मिलेगी।

उन्होने अंत में, डॉ. अब्दुल गनी शम्सुद्दीन ने कहा कि सुन्नी और शिया मुसलमानों के बीच एकता को मजबूत करना इस्लामी समाजों को फसाद और सांप्रदायिक मतभेदों से सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने इस्लामी उम्मत की क्षमताओं को न्याय, निर्माण, मानव गरिमा की रक्षा और मुसलमानों के बीच आपसी एकजुटता मज़बूत करने की दिशा में इस्तेमाल करने की आवश्यकता पर बल दिया।

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