हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, सिस्तान और बलूचिस्तान से मजलिस-ए-ख़ुबरेगान-ए-रहबरी के प्रतिनिधि अब्दुर्रहमान आरिफी ने मुसलमानों के बीच एकता को समय की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया है। उनके अनुसार, आज मुस्लिम समाज पहले की तुलना में अधिक जागरूक हो चुका है और छोटी-छोटी बातों के आधार पर पैदा किए जाने वाले मतभेदों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि शिक्षा और जागरूकता के बढ़ने के कारण युवा अब उन साजिशों को समझने लगे हैं, जिनके माध्यम से लोगों के बीच धार्मिक और सामाजिक विभाजन पैदा करने की कोशिश की जाती रही है।
आरिफी के अनुसार, ईरानी जनता ने पिछले कई दशकों के दौरान एकता और एकजुटता के महत्व को व्यवहार में महसूस किया है। उनका कहना है कि इस्लामी क्रांति के बाद ईरान ने अनेक चुनौतियों, युद्धों और दबावों का सामना किया, लेकिन जनता की एकता के कारण देश की व्यवस्था कायम रही। उन्होंने आठ वर्ष के युद्ध के साथ-साथ हाल के 12 दिवसीय युद्ध और रमज़ान के युद्ध का उल्लेख करते हुए कहा कि इन परिस्थितियों के बावजूद ईरानी जनता एकजुट रही और उसके बीच आपसी भाईचारा मजबूत हुआ।
उन्होंने शिया और सुन्नी के बीच एकता पर जोर देते हुए कहा कि सभी मुसलमान आपस में भाई हैं। धर्म के आधार पर एक-दूसरे को अलग करने के बजाय मुसलमानों को अपने साझा विश्वासों और मूल सिद्धांतों को महत्व देना चाहिए। इस्लाम प्रत्येक इंसान के जीवन, संपत्ति, सम्मान और परिवार की सुरक्षा पर जोर देता है। इसलिए मुसलमानों के लिए एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा होना इस्लाम की मूल शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है।
आरिफी ने कहा कि शिया और अहले सुन्नत के बीच अनेक समानताएं हैं और इस्लामी दुनिया के बड़े विद्वान लंबे समय से आपसी एकता और भाईचारे का संदेश देते रहे हैं। उन्होंने पाकिस्तान, मिस्र और अन्य देशों के विद्वानों द्वारा ईरानी जनता के समर्थन का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, कई मुस्लिम विद्वान ईरान की एकता को दूसरे मुस्लिम देशों के लिए उदाहरण मानते हैं।
उन्होंने कहा कि ईरान में विभिन्न जातियों और भाषाओं के लोग एक साथ रहते हैं। फारसी, बलूच, कुर्द, तुर्क, लूर और अन्य समुदायों के लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं। सिस्तान और बलूचिस्तान में शिया और सुन्नी विद्वानों के बीच पुराने समय से चले आ रहे आपसी संबंधों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि मौलाना अब्दुल अज़ीज़ और आयतुल्लाह कफ़अमी एक-दूसरे के धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होते थे। उनके निधन पर शिया और सुन्नी दोनों समुदायों ने समान रूप से दुख व्यक्त किया। इससे पता चलता है कि एकता केवल भाषणों का विषय नहीं, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई दे सकती है।
आरिफी ने विद्वानों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि आम लोग धार्मिक विद्वानों के व्यवहार से प्रभावित होते हैं। जब आलिम और धार्मिक नेता अपने आचरण से एकता और भाईचारे का उदाहरण पेश करते हैं तो जनता भी उसका अनुसरण करती है। इसलिए धार्मिक नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे मतभेदों को बढ़ाने के बजाय आपसी सम्मान और सहयोग को बढ़ावा दें।
उन्होंने उपनिवेशवादी शक्तियों द्वारा मुस्लिम समाज में मतभेद पैदा करने के प्रयासों पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि मुसलमानों को यह समझना चाहिए कि किन ताकतों को उनके बीच विभाजन से लाभ होता है। उन्होंने पुराने और छोटे धार्मिक मतभेदों को आज के दौर में मुसलमानों के बीच संघर्ष का आधार न बनाने की अपील की।
आरिफी ने आर्थिक और सामाजिक विकास को भी एकता से जोड़ते हुए कहा कि अगर मुस्लिम समाज में लगातार विवाद, संघर्ष और युद्ध होते रहें तो अर्थव्यवस्था कमजोर हो जाएगी और विकास रुक जाएगा। विश्वविद्यालय, धार्मिक शिक्षण केंद्र और अन्य संस्थाएं भी सामान्य रूप से काम नहीं कर पाएंगी।
अंत में उन्होंने एकता की तुलना बहार से करते हुए कहा कि जिस तरह बहार हरियाली और ताजगी लेकर आती है, उसी तरह एकता समाज में प्रेम, भाईचारा, शांति और विकास का वातावरण पैदा करती है। इसलिए मुस्लिम समाज की मजबूती, आर्थिक प्रगति और शांतिपूर्ण भविष्य के लिए एकता को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
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