बुधवार 30 सितंबर 2026 - 08:32
इस्लामी मज़ाहिब के बीच एकता केवल रणनीतिक गठबंधन से कहीं अधिक गहरी है

हौज़ा / हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन इब्राहीमीफ़र ने कहा कि इस्लामी मज़ाहिब के बीच एकता केवल रणनीतिक और अस्थायी गठबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि कई बुनियादी सिद्धांतों और मान्यताओं में यह एकता उससे कहीं अधिक गहरी है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,जामेअतुल मुस्तफ़ा अल-आलमिया के प्रतिनिधि कार्यालय के नए शैक्षणिक वर्ष के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन इब्राहीमीफ़र, जो ईरान की विशेषज्ञों की सभा (मजलिस-ए-ख़ुबरेगान) में तेहरान के प्रतिनिधि हैं, ने अधिकारियों, शिक्षकों और छात्र-छात्राओं का आभार व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि जामेअतुल मुस्तफ़ा, इस्लाम और क़ुरआन की शिक्षाओं से जुड़े विद्वानों का एक प्रतिष्ठित संस्थान और इस्लाम व क़ुरआन का एक सांस्कृतिक केंद्र है, जो दुनिया में इस्लामी शिक्षा और प्रचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

उन्होंने अपने भाषण का विषय “तौहीद और इज्तेहाद के बीच संबंध” बताते हुए कहा कि यह विषय इज्तेहाद की गतिशीलता और स्थायित्व को समझने से संबंधित है। हमारे दृष्टिकोण में इज्तेहाद ऐसा गतिशील और परिस्थितियों के अनुरूप ढलने वाला तरीका है, जो साथ ही अपने मूल सिद्धांतों में स्थायी भी है।

उन्होंने कहा कि इंसान को जीवन की विभिन्न परिस्थितियों और समस्याओं में अपने व्यवहार को निर्धारित करने के लिए धार्मिक आदेशों की आवश्यकता होती है। साथ ही उसके लिए तौहीद में अपने विश्वास को मजबूत करना भी आवश्यक है। पहली नज़र में ऐसा लग सकता है कि गतिशील इज्तेहाद और तौहीद में विश्वास के बीच विरोधाभास है, लेकिन वास्तव में इन दोनों के बीच सामंजस्य को समझाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि विभिन्न इस्लामी मज़ाहिब के बीच तौहीद में विश्वास को लेकर कोई मूलभूत संदेह नहीं है। इज्तेहाद के संदर्भ में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इज्तेहाद और अल्लाह की तशरीई रबूबियत यानी कानून और धार्मिक आदेश देने के अधिकार के बीच किस प्रकार सामंजस्य स्थापित किया जाए।

उन्होंने कहा कि हम अल्लाह को केवल सृष्टिकर्ता और एकमात्र ईश्वर ही नहीं मानते, बल्कि उसे “रब्बुल-आलमीन” भी मानते हैं। उसकी रबूबियत सृष्टि और धार्मिक कानून, दोनों क्षेत्रों में जारी है।

ताक़वीनी रबूबियत के क्षेत्र में अल्लाह के आदेश का उल्लंघन संभव नहीं है और वह जो चाहता है, वह अस्तित्व में आता है। जबकि तशरीई क्षेत्र में हमारा विश्वास है कि आदेश देने और कानून बनाने का अधिकार केवल अल्लाह तआला को है। यदि यह अधिकार पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) या अन्य ईश्वरीय प्रतिनिधियों को दिया गया है, तो वह भी अल्लाह की अनुमति से दिया गया है।

उन्होंने कहा कि अल्लाह की तशरीई व्यवस्था और उसकी ताक़वीनी व्यवस्था के बीच भी सामंजस्य है। इसका अर्थ यह है कि अल्लाह के धार्मिक आदेश निरर्थक नहीं हैं, बल्कि उसके आदेश और निषेध वास्तविक हितों और नुक़सान की बुनियाद पर आधारित हैं।

इज्तेहाद में अक़्ल की भूमिका:

हुज्जतुल इस्लाम इब्राहीमीफ़र ने इज्तेहाद की प्रक्रिया में अक़्ल की भूमिका पर कहा कि यदि अक़्ल को धार्मिक आदेशों के निष्कर्ष तक पहुँचने के स्रोतों में से एक माना जाता है, तो यह समझना आवश्यक है कि अक़्ल अल्लाह से स्वतंत्र होकर कोई नया धार्मिक कानून नहीं बनाती, बल्कि वह धार्मिक आदेश की खोज और उसे समझने का साधन है।

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि गतिशील इज्तेहाद का अर्थ नया धार्मिक कानून बनाना नहीं है, बल्कि उस वास्तविक धार्मिक आदेश को तर्क और अध्ययन के माध्यम से समझने की कोशिश करना है जो वास्तव में मौजूद है। स्वतंत्र रूप से वांछित चीज़ केवल अल्लाह का आदेश है।

उन्होंने कहा कि क़ुरआन और सुन्नत भी हमारे लिए इसी कारण प्रमाण हैं कि वे अल्लाह के आदेश को स्पष्ट करते हैं। क़ुरआन फिक़्ह का स्रोत इसलिए है क्योंकि वह अल्लाह के आदेशों को बयान करता है, जबकि पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) की सुन्नत इसलिए प्रमाणित है क्योंकि वह वह़ी और ईश्वरीय आदेशों को स्पष्ट करती है।

उन्होंने कहा कि क़ुरआन के प्रमाण होने के लिए उसके हर प्रकार के परिवर्तन और विकृति से सुरक्षित होने को स्वीकार करना आवश्यक है। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) की सुन्नत के मामले में उनकी मासूमियत का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि यदि उनके कथन में गलती की संभावना हो तो उनकी सुन्नत को अल्लाह के आदेश का विश्वसनीय माध्यम नहीं माना जा सकता।

उन्होंने कहा कि उसूल के इल्म में अक़्ल भी तभी प्रमाण है जब वह अल्लाह के आदेश के मुकाबले में खड़ी न हो, बल्कि ईश्वरीय आदेश को समझने और खोजने के साधन के रूप में कार्य करे।

उन्होंने “अक़्ल पर बेलगाम भरोसे” के प्रति चेतावनी देते हुए कहा कि यदि अक़्ल को बिना किसी सीमा के अल्लाह के आदेश के सामने स्वतंत्र मान लिया जाए, तो इसका परिणाम अल्लाह की तशरीई रबूबियत से दूरी की शक्ल में सामने आ सकता है।

शैतान के इनकार से मिलने वाला सबक;

हुज्जतुल इस्लाम इब्राहीमीफ़र ने हज़रत आदम (अ.) के सामने शैतान के सजदा न करने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि शैतान ने अल्लाह के आदेश का पालन करने के बजाय अपने निजी निष्कर्ष को आधार बनाया। उसने कहा कि मैं आग से पैदा हुआ हूं और आदम मिट्टी से, इसलिए मुझे सजदा नहीं करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि शैतान की समस्या केवल नैतिक और अहंकार से जुड़ी हुई नहीं थी, बल्कि उसने अल्लाह के आदेश के सामने अपने निजी निष्कर्ष को मापदंड बनाया और अल्लाह की तशरीई रबूबियत को स्वीकार नहीं किया।

मज़ाहिब के बीच वैज्ञानिक संवाद की आवश्यकता:

उन्होंने कहा कि “मक़ासिद-ए-शरीअत” जैसे कुछ विषयों में भी इस्लामी मज़ाहिब के बीच महत्वपूर्ण समानताएं और साझा बिंदु पाए जा सकते हैं। कुछ शिया विद्वानों ने इज्तेहाद को मासूम के दृष्टिकोण और उद्देश्य को समझने के अर्थ में भी बयान किया है, जिसकी विषयवस्तु की तुलना अहले-सुन्नत के बीच मौजूद मक़ासिद-ए-शरीअत की चर्चा से की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि इस प्रकार के विषय इस्लामी मज़ाहिब के विद्वानों के बीच रचनात्मक संवाद, वैज्ञानिक सहयोग और एकता का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। इसलिए तक़रीब और एक-दूसरे की बेहतर समझ के उद्देश्य से निष्पक्ष एवं संयुक्त वैज्ञानिक बैठकों का आयोजन किया जाना चाहिए।

इस्लामी एकता रणनीतिक गठबंधन से अधिक गहरी है:

इस्लामी एकता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कभी-कभी कहा जाता है कि मुसलमानों के बीच एकता केवल रणनीतिक और सामरिक एकता है, लेकिन गहराई से विचार करने पर पता चलता है कि इस्लामी मज़ाहिब के बीच एकता कई मूलभूत सिद्धांतों और मान्यताओं में केवल रणनीतिक गठबंधन से कहीं अधिक गहरी है।

उन्होंने कहा,हमारा ईश्वर एक है, पैग़म्बर एक हैं, किताब एक है और क़िबला एक है। इसके अलावा नैतिक और आस्थागत अनेक मूल सिद्धांतों में भी मुसलमानों के बीच बहुत अधिक समानताएं मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि इस्लामी मज़ाहिब के बीच मौजूद फिक़्ही और उसूली मतभेदों को वैज्ञानिक मतभेदों के दायरे में समझा जाना चाहिए। जिस तरह एक ही मज़हब के भीतर भी फ़ुक़हा और विद्वानों के बीच वैज्ञानिक और फिक़्ही मतभेद पाए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि विचारों का आपसी आदान-प्रदान वैज्ञानिक विकास का कारण बन सकता है। यदि इन मतभेदों को वैज्ञानिक संवाद और तक़रीब की भावना के साथ आगे बढ़ाया जाए तो इससे विभिन्न विचारों को बेहतर ढंग से समझने और इस्लामी उम्मत की एकता को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

अंत में उन्होंने नए शैक्षणिक वर्ष के अवसर पर सभी छात्रों और शिक्षकों को बधाई दी और उनके ज्ञान एवं आध्यात्मिक विकास के मार्ग में सफलता की दुआ की। उन्होंने उम्मीद जताई कि नए शैक्षणिक वर्ष में सभी छात्र-छात्राएं वैज्ञानिक और आध्यात्मिक उन्नति की मंज़िलें सफलतापूर्वक तय करेंगे और जामेअतुल मुस्तफ़ा दुनिया-ए-इस्लाम के लिए इसी तरह भलाई और बरकत का स्रोत बनी रहेगी।

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