लेखक: मौलाना सैयद करामत हुसैन शऊर जाफ़री
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को समझने के लिए केवल वर्तमान परिस्थितियों पर नजर डालना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अतीत की उन घटनाओं को भी याद करना जरूरी है, जिनसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति की कई कड़वी सच्चाइयां सामने आती हैं। आज कुछ लोग ईरान को बार-बार शांति, धैर्य और समझदारी से काम लेने की सलाह दे रहे हैं। निस्संदेह युद्ध किसी समस्या का अच्छा समाधान नहीं है और बातचीत के जरिए मतभेदों को दूर करना हमेशा बेहतर रास्ता होता है, लेकिन सवाल यह है कि शांति की शर्तें क्या हैं?
क्या अमेरिका वास्तव में ईरान के साथ शांतिपूर्ण संबंध चाहता है, या वह ईरान की रक्षा क्षमता को सीमित करके उसे अपनी इच्छा के अनुसार चलने पर मजबूर करना चाहता है?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें इराक और लीबिया के इतिहास से सबक लेना होगा।
इराक की घटना आज भी याद आती है। सद्दाम हुसैन की सरकार को संयुक्त राष्ट्र की ओर से हथियारों के निरीक्षण और निरस्त्रीकरण की मांगों का सामना करना पड़ा। जब यह स्पष्ट हो गया कि इराक के पास कोई ऐसे हथियार नहीं मिले हैं, जिनका दावा किया जा रहा था, तो वर्ष 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला कर दिया। इस युद्ध का एक प्रमुख औचित्य यह बताया गया था कि इराक के पास व्यापक विनाश के हथियार हैं, लेकिन बाद में इन दावों की पुष्टि नहीं हो सकी।
इराक तबाह हो गया, उसकी राजनीतिक व्यवस्था बदल गई और युद्ध तथा उसके बाद पैदा हुए हालात से लाखों लोग प्रभावित हुए, लेकिन वे हथियार नहीं मिले, जिनके नाम पर युद्ध को उचित ठहराया गया था।
यहां सवाल उठता है कि यदि कोई देश अपने रक्षा कार्यक्रमों के संबंध में लगातार रियायतें देता रहे, निरीक्षण स्वीकार करे और अपनी स्थिति कमजोर करता जाए, लेकिन इसके बावजूद उसकी सुरक्षा की गारंटी न हो, तो वह आखिर किस आधार पर निश्चिंत रह सकता है?
इराक का इतिहास कम से कम यह सबक जरूर देता है कि अमेरिका के वादों पर आंख मूंदकर भरोसा करना जोखिम से खाली नहीं है।
लीबिया का उदाहरण भी हमारे सामने है। मुअम्मर गद्दाफी ने वर्ष 2003 में अपने परमाणु और कुछ अन्य संवेदनशील हथियार कार्यक्रमों को समाप्त करने की घोषणा की तथा पश्चिमी देशों के साथ संबंध सुधारने का प्रयास किया। इसके बाद पश्चिमी देशों के साथ उसके संबंधों में सुधार भी हुआ, लेकिन वर्ष 2011 में लीबिया में आंतरिक विद्रोह और गृहयुद्ध के दौरान नाटो ने सैन्य हस्तक्षेप किया। इसके परिणामस्वरूप गद्दाफी की सरकार समाप्त हो गई और देश लंबे समय तक अस्थिरता का शिकार बना रहा।
इस घटना ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया कि हथियारों के कार्यक्रम समाप्त करने और पश्चिमी देशों के साथ संबंध सुधारने के बावजूद किसी देश की सुरक्षा सुनिश्चित क्यों नहीं हो सकी?
लीबिया के अनुभव से यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या निरस्त्रीकरण और पश्चिमी देशों के साथ बेहतर संबंध स्थापित करना किसी देश को बाहरी सैन्य हस्तक्षेप से सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं?
अब इसी पृष्ठभूमि में ईरान के मामले को देखिए। अमेरिका लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध और कड़ी निगरानी चाहता है। इसके साथ ही वह ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को भी सीमित करना चाहता है। यानी मुद्दा केवल यह नहीं है कि ईरान परमाणु हथियार बनाएगा या नहीं, बल्कि यह भी है कि उसकी अपनी रक्षा के लिए कितनी क्षमता शेष रहेगी और वह क्षेत्र में किस सीमा तक स्वतंत्र भूमिका निभा सकेगा।
ईरान के लिए मिसाइल और ड्रोन केवल युद्ध के हथियार नहीं, बल्कि उसकी रक्षा रणनीति के महत्वपूर्ण अंग हैं। ईरान जानता है कि उसके मुकाबले में अमेरिका एक बड़ी सैन्य शक्ति है और इजरायल के पास भी आधुनिक हथियार तथा परमाणु हथियार हैं। ऐसी परिस्थितियों में ईरान अपनी रक्षा क्षमता को अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक मानता है। दूसरी ओर, अमेरिका और इजरायल इन क्षमताओं को अपने लिए खतरा बताते हैं और उन्हें सीमित करना चाहते हैं।
यहीं से मूल सवाल पैदा होता है कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंध स्वीकार कर ले, अपने मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम को सीमित कर दे तथा क्षेत्र में अपना प्रभाव भी कम कर ले, तो क्या अमेरिका उसे भविष्य में किसी हमले से सुरक्षित रहने की गारंटी देगा?
यदि ऐसी गारंटी दी जाती है, तो उसकी विश्वसनीयता क्या होगी?
और यदि भविष्य में अमेरिकी सरकार बदल जाए या वाशिंगटन अपनी नीति में बदलाव कर ले, तो ईरान की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?
ये सवाल केवल ईरान के समर्थकों के लिए ही नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भावनाओं के बजाय विवेक और अनुभव के आधार पर समझना चाहते हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि ईरान को हर कीमत पर अमेरिका के साथ शांति समझौता कर लेना चाहिए। उनसे कहना है कि शांति समझौता निश्चित रूप से होना चाहिए, लेकिन ऐसा समझौता जिसमें दोनों पक्षों के अधिकारों और हितों का सम्मान हो। यदि एक पक्ष से लगातार मांगें की जाएं, उसकी रक्षा क्षमता सीमित कर दी जाए और बदले में उसे कोई विश्वसनीय गारंटी न मिले, तो इसे स्थायी शांति कैसे कहा जा सकता है?
शांति का अर्थ यह नहीं है कि एक देश सभी शर्तें मान ले और दूसरा अपनी इच्छा के अनुसार जब चाहे समझौते की भावना बदल दे।
इस बहस का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू ईरान के परमाणु निरीक्षणों से जुड़ा है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षण परमाणु अप्रसार व्यवस्था का हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य यह जांचना है कि परमाणु सामग्री और प्रतिष्ठानों का इस्तेमाल किस प्रकार किया जा रहा है। इसलिए केवल निरीक्षण की मांग से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अमेरिका किसी नए हमले की तैयारी कर रहा है।
लेकिन जब ये मांगें कड़े प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के माहौल में सामने आती हैं, तो ईरान के लिए यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि निरीक्षण स्वीकार करने के बाद उसे क्या हासिल होगा?
क्या इसके बदले प्रतिबंध हटाए जाएंगे?
क्या उसकी संप्रभुता का सम्मान किया जाएगा?
और क्या भविष्य में उस पर सैन्य हमला न करने की कोई विश्वसनीय गारंटी दी जाएगी?
यही वह बिंदु है, जहां ईरान को बहुत सोच-समझकर फैसला करना होगा। उसे न तो हर निरीक्षण को शत्रुता के रूप में देखना चाहिए और न ही अपनी सुरक्षा से जुड़े आशंकाओं को नजरअंदाज करना चाहिए। वास्तविक आवश्यकता ऐसे समझौते की है, जिसमें निगरानी और पारदर्शिता के साथ ईरान के वैध अधिकारों तथा उसकी सुरक्षा का भी संरक्षण हो।
अब एक और चिंताजनक सवाल सामने आता है: क्या अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ सामरिक परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं?
इस विषय पर सावधानी से बात करना जरूरी है। फिलहाल उपलब्ध विश्वसनीय सार्वजनिक साक्ष्यों के आधार पर यह दावा साबित नहीं होता कि अमेरिका या इजरायल ने ईरान के खिलाफ ऐसे हथियारों के इस्तेमाल का फैसला कर लिया है। भूमिगत प्रतिष्ठानों को नष्ट करने के लिए परमाणु हथियारों का इस्तेमाल अनिवार्य नहीं है, क्योंकि अमेरिका के पास मजबूत और भूमिगत लक्ष्यों को निशाना बनाने वाले पारंपरिक हथियार भी मौजूद हैं।
हालांकि, यह सवाल महत्वपूर्ण है कि यदि किसी युद्ध में पारंपरिक हथियार अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं कर पाते, तो क्या तनाव और अधिक खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है?
इस संभावना पर विचार किया जा सकता है, लेकिन किसी प्रमाणित साक्ष्य के बिना इसे अमेरिका या इजरायल की निश्चित योजना बताना उचित नहीं होगा। ईरान के परमाणु कार्यक्रम की मौजूदा स्थिति के बारे में भी पूर्ण और स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध न होने के कारण कई सवाल अभी अनुत्तरित हैं।
वास्तविकता यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच विवाद केवल एक मुद्दे तक सीमित नहीं है। परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल और ड्रोन, क्षेत्रीय प्रभाव, इजरायल की सुरक्षा तथा मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन, ये सभी इस विवाद के महत्वपूर्ण पहलू हैं। इसलिए यह मानना कि केवल परमाणु निरीक्षण स्वीकार कर लेने से ईरान और अमेरिका के सभी मतभेद समाप्त हो जाएंगे, वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं है।
इराक और लीबिया की घटनाओं से सबसे महत्वपूर्ण सबक यही मिलता है कि किसी देश को अपनी सुरक्षा के मामले में केवल दूसरों के वादों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उसे शांति के लिए बातचीत भी करनी चाहिए, लेकिन साथ ही अपनी रक्षा क्षमता, संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी चाहिए।
जो लोग ईरान को शांति और समझदारी से काम लेने की सलाह देते हैं, उनकी बात से असहमति नहीं है। लेकिन उनसे इतना जरूर कहना है कि शांति की सलाह देते समय इराक और लीबिया के इतिहास को भी याद रखें। यह भी देखें कि शक्तिशाली देश अपने हितों के अनुसार किस तरह अपनी नीतियां बदलते हैं और कमजोर देशों को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
अंत में सवाल फिर वही है: अमेरिका ईरान से आखिर क्या चाहता है?
यदि उसका उद्देश्य वास्तव में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना और क्षेत्र में शांति स्थापित करना है, तो उसे ऐसे समझौते का समर्थन करना चाहिए, जिसमें ईरान के वैध अधिकारों, प्रतिबंधों को हटाने और भविष्य में सैन्य हमले से सुरक्षा के सवालों का भी समाधान हो।
लेकिन यदि मांगों का दायरा लगातार बढ़ता जाए और ईरान से उसकी रक्षा क्षमता सीमित करने के साथ-साथ क्षेत्रीय भूमिका समाप्त करने की भी अपेक्षा की जाए, तो यह केवल परमाणु विवाद नहीं रहेगा, बल्कि ईरान की समग्र शक्ति और संप्रभुता का मामला बन जाएगा।
शांति की इच्छा कमजोरी नहीं है, लेकिन शांति के नाम पर अपनी सुरक्षा दूसरों की इच्छा के हवाले कर देना भी समझदारी नहीं है। वास्तविक शांति वही है, जिसमें युद्ध का खतरा कम हो, सभी पक्षों के अधिकार सुरक्षित रहें और किसी देश को यह आशंका न रहे कि आज दी गई रियायत का इस्तेमाल कल उसके ही खिलाफ किया जाएगा।
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