लेखक: सय्यद अंजुम रज़ा
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | ईरानी राष्ट्रपति मसूद पिज़िशकियान का संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिया गया संबोधन महज एक पारंपरिक कूटनीतिक भाषण नहीं था, बल्कि पिछले कुछ महीनों के दौरान ईरान पर हुए युद्ध और हमलों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण वैश्विक कूटनीतिक संदेश था। दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि ईरानी राष्ट्रपति इस बड़े वैश्विक मंच पर ईरान का पक्ष किस तरह पेश करते हैं।
ईरान ने संयुक्त राष्ट्र के इस वैश्विक मंच का प्रभावी ढंग से उपयोग करते हुए दुनिया के सामने अपना पक्ष रखने की कोशिश की। संबोधन का एक प्रमुख पहलू यह था कि ईरान ने खुद को हमलावर के बजाय आक्रमण का शिकार हुए देश के रूप में पेश किया। ईरानी राष्ट्रपति ने मीनाब के एक स्कूल में हुई घटना का उल्लेख करते हुए मासूम बच्चियों की मौत और उनके स्कूल बैग दिखाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि ईरान खुद आतंकवाद का शिकार है, जबकि उस पर आतंकवाद के आरोप लगाए जाते हैं।
मिसाइलों के बजाय बातचीत का रास्ता, लेकिन आत्मसमर्पण नहीं
राष्ट्रपति पेज़ेशकियान के संबोधन का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश यह था कि ईरान कूटनीति और बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन आत्मसमर्पण के लिए तैयार नहीं है। यानी ईरान बातचीत को युद्ध समाप्त करने का संभावित रास्ता मानता है, लेकिन वह यह स्वीकार नहीं करेगा कि दबाव, धमकी या शक्ति के बल पर उसे अपनी मूल नीतियों से पीछे हटने के लिए मजबूर किया जाए।
यह वास्तव में ईरान की उस रणनीति को दर्शाता है, जिसमें एक ओर बातचीत का रास्ता खुला रखा गया है, जबकि दूसरी ओर प्रतिरोध भी जारी है। ईरान के दृष्टिकोण से दोनों रास्ते एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
युद्ध के मैदान में हासिल स्थिति को बातचीत की मेज पर कूटनीतिक लाभ में बदलना इस रणनीति का एक प्रमुख उद्देश्य है। इसी कारण ईरान प्रतिरोध के माध्यम से अपनी स्थिति बनाए रखते हुए कूटनीति के जरिए उसे व्यापक राजनीतिक और कूटनीतिक उपलब्धि में बदलने की कोशिश कर रहा है।
कथा की लड़ाई: ईरान ने वैश्विक धारणा को चुनौती दी
राष्ट्रपति पेज़ेशकियान के भाषण का एक प्रमुख पहलू अपने पक्ष की धारणा को मजबूत करना भी था। युद्ध केवल युद्ध के मैदान में नहीं लड़ा जाता, बल्कि इसके साथ मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और नैरेटिव की लड़ाई भी जारी रहती है।
ईरानी राष्ट्रपति ने वैश्विक स्तर पर ईरान को एक खतरे के रूप में पेश किए जाने वाली धारणा को चुनौती देने की कोशिश की। उनका मुख्य संदेश यह था कि समस्या ईरान नहीं, बल्कि अमेरिका और इजरायल की आक्रामक नीतियां हैं। इसी संदर्भ में ईरान ने आत्मरक्षा के अपने अधिकार पर जोर दिया और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 का हवाला देते हुए यह पक्ष रखा कि किसी देश पर आक्रमण होने की स्थिति में उसे अपनी रक्षा का अधिकार प्राप्त है।
इस तरह ईरान ने वैश्विक जनमत के सामने अपने युद्ध को रक्षा बनाम आक्रमण के रूप में पेश करने की कोशिश की। कूटनीतिक स्तर पर यह एक महत्वपूर्ण वैचारिक संघर्ष है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय विवादों में केवल सैन्य शक्ति ही निर्णायक नहीं होती, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होता है कि दुनिया उस विवाद को किस दृष्टिकोण से देखती है।
संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता पर सवाल
राष्ट्रपति पेज़ेशकियान के संबोधन में एक व्यापक वैश्विक मुद्दे की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया: क्या संयुक्त राष्ट्र मौजूदा वैश्विक विवादों के समाधान में प्रभावी भूमिका निभा पा रहा है?
दुनिया के कई देश, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ, लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा संरचना और उसकी निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल उठाते रहे हैं। वीटो का अधिकार भी इस बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि पांच स्थायी सदस्यों में से किसी एक का वीटो कभी-कभी व्यापक वैश्विक समर्थन के बावजूद किसी प्रस्ताव को रोक सकता है।
गाजा, यूक्रेन और ईरान से जुड़े विवादों ने भी इस सवाल को और प्रमुख बनाया है कि क्या मौजूदा वैश्विक व्यवस्था युद्धों और विवादों के प्रभावी समाधान के लिए पर्याप्त है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का मूल उद्देश्य ही यह था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया युद्ध के बजाय अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीति और वैश्विक संस्थाओं के माध्यम से विवादों के समाधान की दिशा में आगे बढ़े।
इसीलिए ईरान का संदेश केवल अपनी रक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी बनाने, अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन को सुनिश्चित करने और वैश्विक शांति में उसकी भूमिका को मजबूत करने की आवश्यकता भी शामिल थी।
खाड़ी के लिए ईरान की अवधारणा: साझा सुरक्षा और गैर-आक्रमण
राष्ट्रपति पेज़ेशकियान के संबोधन का एक महत्वपूर्ण पहलू पड़ोसी और खाड़ी देशों के साथ संबंधों तथा क्षेत्रीय सुरक्षा की अवधारणा थी।
ईरान कई वर्षों से HOPE (Hormuz Peace Endeavor) जैसी अवधारणाएं पेश करता रहा है। इसके तहत खाड़ी देशों को यह प्रस्ताव दिया गया है कि वे अपनी सुरक्षा के लिए बाहरी शक्तियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय क्षेत्रीय देशों के बीच साझा सुरक्षा की व्यवस्था स्थापित करें।
इस अवधारणा में गैर-आक्रमण समझौता, आपसी सम्मान, साझा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं। ईरान की इच्छा है कि खाड़ी देश आपस में बैठकर अपने क्षेत्रीय विवादों का समाधान करें और बाहरी सैन्य निर्भरता को कम करें।
ईरान के इस रुख का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि खाड़ी देशों को ईरान से उत्पन्न खतरे की धारणा पर पुनर्विचार करना चाहिए। ईरानी पक्ष के अनुसार, ईरान के प्रति भय पैदा करने के लिए ईरान-विरोधी धारणा को बढ़ावा दिया गया, जबकि ईरान खुद को क्षेत्रीय सहयोग और आपसी बातचीत के माध्यम से समस्याओं के समाधान के लिए तैयार बताता है।
हालांकि, इस अवधारणा के व्यावहारिक रूप से सफल होने के रास्ते में बड़ी बाधा खाड़ी देशों के अमेरिका के साथ गहरे आर्थिक, रक्षा और सुरक्षा संबंध हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के अमेरिका के साथ व्यापक समझौते और रक्षा संबंध इस बात को कठिन बनाते हैं कि वे निकट भविष्य में पूरी तरह अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था से अलग होकर किसी वैकल्पिक क्षेत्रीय व्यवस्था की ओर बढ़ें।
ईरान की भविष्य की विदेश नीति: युद्धविराम से स्थायी शांति तक
ईरान की भविष्य की रणनीति केवल एक मोर्चे तक सीमित दिखाई नहीं देती। ईरान फिलिस्तीन, गाजा, लेबनान और यमन समेत विभिन्न मोर्चों पर युद्धविराम और राजनीतिक समाधान के प्रयास को महत्वपूर्ण मानता है।
ईरान की प्राथमिकताओं में सभी मोर्चों पर युद्धविराम, अमेरिका के साथ किसी संभावित शांतिपूर्ण समझौते की तलाश, अपने परमाणु कार्यक्रम से संबंधित अधिकारों की रक्षा, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों पर अपनी स्थिति बनाए रखना तथा खाड़ी देशों के साथ विश्वास बहाली शामिल हो सकती है।
इसके साथ ही ईरान के लिए आर्थिक प्रतिबंधों का अंत भी एक प्रमुख प्राथमिकता है। लगातार तनाव और प्रतिबंधों ने ईरानी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है। इसलिए ईरान ऐसा दीर्घकालिक और टिकाऊ समाधान चाहता है, जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक प्रतिबंधों में कमी या उनका अंत हो और ईरान वैश्विक बाजार में तेल सहित अपने आर्थिक संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सके।
हुर्मुज़ जलडमरूमध्य: बातचीत की मेज पर ईरान की महत्वपूर्ण रणनीतिक ताकत
ईरान की रणनीति में हुर्मुज़ स्ट्रेट को भी विशेष महत्व प्राप्त है। ईरान के लिए हुर्मुज़ स्ट्रेट केवल एक भौगोलिक मार्ग नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रभाव का साधन भी है। ईरान के दृष्टिकोण से बातचीत की मेज पर उसकी ताकत का एक हिस्सा इसी प्रभाव से जुड़ा है। यदि ईरान के पास क्षेत्रीय और भौगोलिक स्तर पर प्रभावी सौदेबाजी की स्थिति न हो, तो बातचीत में उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है।
निष्कर्ष: प्रतिरोध और कूटनीति एक ही रणनीति के दो पहलू
मसूद पिज़िशकियान का संयुक्त राष्ट्र में संबोधन कुल मिलाकर ईरान की ऐसी कूटनीतिक रणनीति को दर्शाता है, जिसमें प्रतिरोध, कूटनीति, नैरेटिव निर्माण और क्षेत्रीय कूटनीति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
ईरान एक ओर यह संदेश देता है कि वह युद्ध नहीं चाहता और बातचीत के लिए तैयार है, वहीं दूसरी ओर यह स्पष्ट करता है कि दबाव में आत्मसमर्पण नहीं करेगा। युद्ध के मैदान में प्रतिरोध को वह बातचीत की मेज पर अपनी सौदेबाजी की स्थिति मजबूत करने का माध्यम मानता है, जबकि कूटनीति को युद्ध के मैदान में हासिल स्थिति को राजनीतिक और कूटनीतिक उपलब्धि में बदलने का रास्ता समझता है।
इस संबोधन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि ईरान ने वैश्विक स्तर पर अपने खिलाफ बनाए गए नैरेटिव को चुनौती देते हुए खुद को आक्रमण का शिकार और अपने कदमों को रक्षा के संदर्भ में पेश करने की कोशिश की। साथ ही संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा वैश्विक व्यवस्था, वीटो के अधिकार, अंतरराष्ट्रीय कानून और विवादों के समाधान की क्षमता पर भी सवाल उठाए गए।
क्षेत्रीय स्तर पर ईरान ने साझा सुरक्षा, आपसी सम्मान, गैर-आक्रमण और खाड़ी देशों के साथ सीधे सहयोग की अवधारणा पेश की। हालांकि, मौजूदा अमेरिकी प्रभाव तथा खाड़ी देशों के साथ गहरे रक्षा और आर्थिक संबंध इस अवधारणा के तत्काल व्यावहारिक रूप से लागू होने में बड़ी बाधा हैं।
इसलिए ईरान की आगामी रणनीति का केंद्रीय प्रश्न यही होगा कि वह प्रतिरोध को कूटनीतिक प्रभाव में, कूटनीति को स्थायी राजनीतिक समाधान में और क्षेत्रीय शक्ति को एक नई सुरक्षा व्यवस्था में किस हद तक बदल सकता है।
अंततः ईरान के लिए वांछित सफलता केवल युद्ध के मैदान में बढ़त हासिल करना नहीं, बल्कि ऐसी रणनीति को सफल बनाना है, जिसमें युद्धविराम, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक प्रतिबंधों का अंत, क्षेत्रीय संबंधों की बहाली और बातचीत की मेज पर अपने हितों की रक्षा को एक टिकाऊ समझौते का रूप दिया जा सके।
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