लेखक: सय्यद अंजुम रज़ा
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | मध्य पूर्व एक बार फिर ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक छोटी-सी चिंगारी पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में धकेल सकती है। यमन में अंसारुल्लाह की बढ़ती ताकत, बाब अल-मंदब का महत्व, होर्मुज़ जलडमरूमध्य की संवेदनशील स्थिति और सऊदी अरब की यमन में फिर से दखलंदाजी ने हमारे सामने एक महत्वपूर्ण सवाल पूरी गंभीरता के साथ खड़ा कर दिया है:
क्या मुस्लिम देश अपना युद्ध खुद लड़ रहे हैं या किसी और के हितों के लिए एक-दूसरे के खिलाफ खड़े किए जा रहे हैं?
यह सवाल केवल यमन का नहीं, केवल ईरान का नहीं और केवल सऊदी अरब का भी नहीं, बल्कि पूरी मुस्लिम उम्मत के भविष्य का सवाल है।
क्या एक और युद्ध सऊदी अरब को यमन के दलदल में ले जाएगा?
सऊदी अरब अतीत में भी यमन में अपनी सैन्य ताकत आजमा चुका है। हवाई ताकत, आधुनिक हथियार, अंतरराष्ट्रीय समर्थन और सहयोगियों की मौजूदगी के बावजूद वह अंसारुल्लाह को समाप्त नहीं कर सका।
क्यों?
क्योंकि युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीता जाता। जब अपेक्षाकृत कमजोर शक्ति गैर-पारंपरिक युद्ध की रणनीति अपनाती है तो वह अपने से बड़े दुश्मन के लिए युद्ध की कीमत इतनी बढ़ा सकती है कि शक्तिशाली पक्ष के लिए युद्ध जारी रखना मुश्किल हो जाए।
यमन में यही हुआ।
अंसारुल्लाह ने किसी बड़ी शक्ति को पारंपरिक युद्ध के मैदान में हराने की कोशिश नहीं की, बल्कि अपनी सुरक्षा और अस्तित्व को अपने युद्ध का केंद्र बनाया। इसका परिणाम यह हुआ कि सऊदी अरब और उसके सहयोगियों के लिए युद्ध लगातार महंगा, जटिल और अनिश्चित होता गया।
अब सवाल यह है कि अगर पिछला अनुभव निर्णायक सफलता नहीं दे सका तो फिर उसी रास्ते पर दोबारा चलने की जरूरत क्यों पड़ी?
मूल खेल यमन नहीं, लाल सागर और बाब अल-मंदब है
यमन की वर्तमान स्थिति को केवल आंतरिक युद्ध समझना एक बड़ी भूल होगी।
बाब अल-मंदब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। एशिया, यूरोप, लाल सागर और स्वेज नहर के बीच व्यापार का एक महत्वपूर्ण रास्ता इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है।
इसलिए जो शक्ति बाब अल-मंदब के निकट मजबूत स्थिति हासिल कर लेती है, उसे केवल यमन में ही नहीं बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण प्रभाव हासिल हो जाता है।
यही कारण है कि यमन का युद्ध अब केवल यमनी पक्षों के बीच का युद्ध नहीं रह गया है। इसके प्रभाव सऊदी अरब, खाड़ी देशों, ईरान, तुर्की, मिस्र और अंततः वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुँच सकते हैं।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य और बाब अल-मंदब: दो रास्ते, एक वैश्विक संकट
एक ओर होर्मुज़ जलडमरूमध्य है और दूसरी ओर बाब अल-मंदब।
ये दोनों मार्ग वैश्विक ऊर्जा और व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि इनमें से किसी एक में लंबे समय तक तनाव बना रहता है तो तेल की आपूर्ति, वैश्विक बाजार, समुद्री व्यापार और विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
यहाँ मूल सवाल यह नहीं है कि किसके पास कितनी मिसाइलें हैं।
मूल सवाल यह है कि क्या दुनिया ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रही है, जहाँ कुछ महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में पैदा होने वाला तनाव पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बना सकता है?
और इससे भी बड़ा सवाल:
अगर यह संकट बढ़ता है तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा?
मुस्लिम दुनिया या वे शक्तियाँ जो हजारों किलोमीटर दूर बैठकर इस संकट का इस्तेमाल अपने हितों के लिए कर रही हैं?
अमेरिका की रणनीति को समझना होगा
क्षेत्र में एक खतरनाक संभावना यह है कि ईरान और इज़राइल के बीच मौजूद तनाव को धीरे-धीरे मुस्लिम देशों के आपसी संघर्ष में बदल दिया जाए।
एक ओर ईरान और दूसरी ओर सऊदी अरब।
फिर ईरान और तुर्की।
फिर ईरान और मिस्र।
फिर खाड़ी के देश।
और अगर यह सिलसिला शुरू हो गया तो क्या बचेगा?
मुस्लिम दुनिया आपस में लड़ेगी और लाभ अमेरिका और इज़राइल को मिलेगा।
यह वह मूल बात है, जिसे मुस्लिम देशों के शासकों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अगर आज किसी मुस्लिम देश को कमजोर करने के लिए दूसरे मुस्लिम देश का इस्तेमाल किया जा सकता है तो कल यही रणनीति किसी दूसरे देश के खिलाफ भी इस्तेमाल की जाएगी।
तुर्की और मिस्र के लिए भी खतरे की घंटी
तुर्की और मिस्र जैसे शक्तिशाली मुस्लिम देशों को यह समझना होगा कि समस्या केवल ईरान की नहीं है।
जिस क्षेत्र में किसी शक्तिशाली देश को लगातार कमजोर किया जाता है, वहाँ पैदा होने वाला शक्ति का खालीपन अंततः दूसरे देशों को भी प्रभावित करता है।
अगर आज इज़राइल की नजर ईरान, सीरिया या लेबनान पर है तो यह सोचना खतरनाक होगा कि बाकी शक्तिशाली मुस्लिम देश हमेशा सुरक्षित रहेंगे।
जिस देश के पास मजबूत सेना, मिसाइल शक्ति, आर्थिक ताकत और क्षेत्र में प्रभावी राजनीतिक भूमिका हो, वह निश्चित रूप से बड़ी शक्तियों की योजनाओं में महत्वपूर्ण कारक बनेगा।
इसलिए तुर्की, मिस्र, सऊदी अरब, ईरान और अन्य मुस्लिम देशों के लिए समय की मांग यह है कि वे एक-दूसरे को दुश्मन समझने के बजाय संभावित साझा खतरों को समझें।
क्या बाहरी शक्तियाँ हमारी सुरक्षा कर सकती हैं?
यह सवाल भी अब खुलकर पूछना होगा।
अगर किसी देश की सुरक्षा के लिए बाहरी सैन्य मौजूदगी जरूरी है तो फिर वह देश अपनी सुरक्षा का पूरी तरह मालिक कहाँ रहा?
मुस्लिम देशों ने कई दशकों तक बाहरी शक्तियों की सुरक्षा की गारंटी पर भरोसा किया। लेकिन अगर इन गारंटियों के बावजूद युद्ध नहीं रुक सके, हमले जारी रहे और क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती गई तो फिर इस नीति की समीक्षा क्यों न की जाए?
क्या हमारी सुरक्षा का फैसला वॉशिंगटन में होगा या रियाद, तेहरान, अंकारा, काहिरा और अन्य मुस्लिम राजधानियों में?
यह फैसला अब करना होगा।
मक्का समझौता काफी नहीं, वास्तविक क्षेत्रीय व्यवस्था चाहिए
अगर मुस्लिम देश अपनी सुरक्षा के लिए आपसी समझौते करते हैं लेकिन क्षेत्र के मूल विवादों को हल नहीं करते तो केवल समझौतों से शांति स्थापित नहीं होगी।
जरूरत ऐसी वास्तविक क्षेत्रीय व्यवस्था की है, जिसमें मुस्लिम देश:
एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामकता न करने पर सहमत हों।
एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करें।
आपसी विवादों को बातचीत के माध्यम से हल करें।
बाहरी सैन्य निर्भरता कम करें।
समुद्री मार्गों की संयुक्त रूप से सुरक्षा करें।
ऊर्जा की आपूर्ति की सुरक्षा के लिए संयुक्त व्यवस्था करें।
और किसी बाहरी शक्ति को मुस्लिम देशों के आपसी मतभेदों से लाभ उठाने का अवसर न दें।
मूल युद्ध किसके खिलाफ है?
आज मुस्लिम दुनिया को भावनाओं से अधिक राजनीतिक दूरदृष्टि की आवश्यकता है।
अगर ईरान और सऊदी अरब एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते हैं तो लाभ किसे होगा?
अगर ईरान और तुर्की आमने-सामने आते हैं तो लाभ किसे होगा?
अगर खाड़ी के देश आपसी विवादों में उलझते हैं तो लाभ किसे होगा?
अगर यमन, सीरिया, लेबनान और अन्य देश लगातार युद्ध का मैदान बने रहते हैं तो लाभ किसे होगा?
इन सवालों का जवाब मुश्किल नहीं है।
जिस क्षेत्र के देश आपस में लड़ते हैं, उस क्षेत्र के संसाधन, बाजार, मार्ग और राजनीतिक फैसले अंततः दूसरों के हितों से प्रभावित होने लगते हैं।
फैसला अब मुस्लिम दुनिया को करना होगा
आज मुस्लिम उम्मत एक ऐतिहासिक दोराहे पर खड़ी है।
एक रास्ता वह है, जिस पर चलते हुए मुस्लिम देश एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल होते रहें, बाहरी शक्तियों से अपनी सुरक्षा की गारंटी मांगते रहें और हर नए युद्ध को अपना राष्ट्रीय युद्ध समझकर एक-दूसरे के मुकाबले में आते रहें।
दूसरा रास्ता यह है कि मुस्लिम देश अपने मतभेदों को स्वीकार करते हुए भी साझा हितों पर एकजुट हों।
मतभेद रहें, लेकिन युद्ध न हो।
मसलक अलग हो, लेकिन दुश्मनी न हो।
राजनीतिक विचार अलग हों, लेकिन एक-दूसरे की तबाही की योजना न बनाई जाए।
बाब अल-मंदब हो या होर्मुज़ जलडमरूमध्य, लाल सागर हो या खाड़ी, इन क्षेत्रों की सुरक्षा का फैसला इन क्षेत्रों की जनता और संबंधित देशों को स्वयं करना चाहिए।
क्योंकि अगर मुस्लिम दुनिया ने अपनी सुरक्षा का फैसला खुद करना नहीं सीखा तो फिर दूसरों के बनाए हुए नक्शे पर चलने के अलावा उसके पास कोई रास्ता नहीं बचेगा।
आज मूल सवाल यह नहीं है कि ईरान जीतेगा या सऊदी अरब।
मूल सवाल यह है कि मुस्लिम दुनिया कब समझेगी कि इस आपसी युद्ध में जीत किसी मुसलमान की नहीं होगी?
और शायद समय की सबसे बड़ी मांग यही है कि मुस्लिम देश एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा बनाने के बजाय अपने साझा भविष्य की सुरक्षा के लिए एक मेज पर बैठें।
वरना इतिहास का फैसला बहुत कठोर होगा:
युद्धों की योजना दूसरों ने बनाई,
मुसलमान आपस में लड़े,
और लाभ हमेशा दूसरों ने उठाया।
आपकी टिप्पणी