हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाह अराकी ने कहा कि ईरानी होना केवल एक भौगोलिक पहचान नहीं है, बल्कि यह पहचान अमीरुल मोमिनीन अली (अ.स.), इमाम हुसैन (अ.स. और अहले-बैत (अ.स.) की संस्कृति से जुड़ाव के कारण अस्तित्व में आई है। इसी जुड़ाव ने इस पहचान का मूल आधार तय किया है।
इस कार्यक्रम में क़ुम मुक़द्दसा की इमाम हसन अस्करी (अ) मस्जिद में मौजूद एतिकाफ़ में बैठे श्रद्धालु शामिल हुए। आयतुल्लाह अराकी ने स्पष्ट किया कि इस पहचान का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ प्रतिरोध है। धार्मिक शिक्षाओं में प्रतिरोध का अर्थ है सत्य की स्थापना, असत्य का विरोध, ईश्वर के धर्म की रक्षा और मानव जीवन पर असत्य के प्रभुत्व को रोकना। क़ुरआन कहता है कि आस्था का मोर्चा घावों और नुक़सान से कमज़ोर नहीं होता, बल्कि और अधिक मजबूत हो जाता है।
उन्होंने कहा कि दुश्मनों ने हमेशा दबाव, धमकियों और साज़िशों के माध्यम से प्रतिरोध के मोर्चे को कमजोर करने की कोशिश की है, लेकिन इतिहास ने साबित किया है कि हर दबाव के साथ यह मोर्चा पहले से अधिक शक्तिशाली बनकर उभरा है। यही वह पहचान है जो सरदार सुलेमानी जैसे योद्धाओं को जन्म देती है और राष्ट्र को सत्ता और स्वतंत्रता के मार्ग पर अडिग रखती है।
आयतुल्लाह अराकी ने अमीरुल मोमिनीन अली (अ) के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि अंतिम सांस और अंतिम व्यक्ति तक डटे रहना अलवी पहचान की प्रमुख विशेषता है। इसकी उज्ज्वल मिसाल हज़रत अबुल फ़ज़्ल अल-अब्बास (अ.स.) हैं। यह मार्ग आज भी जारी है और शहादत के बावजूद प्रतिरोध का रास्ता रुकता नहीं है।
उन्होंने कहा कि यदि इस राष्ट्र से अलवी पहचान छीन ली जाए, तो दुश्मन के सामने कोई शक्ति शेष नहीं रहती। अंत में उन्होंने ईरानी राष्ट्र के लिए विलायत के मार्ग पर दृढ़ रहने की दुआ की। कार्यक्रम के अंत में हरम की रक्षा करने वाले शहीदों के माता-पिता को सम्मानित किया गया।
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