सोमवार 5 जनवरी 2026 - 12:01
कुरआन की निग़ाह में पाकीज़ा शएरी ह़क़ का समर्थन और समाज के शिक्षण का प्रभावी साधन है। हुज्जतुल इस्लाम नज़री मुनफरिद

हौज़ा / हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नज़री मुनफरिद ने कहा है कि पवित्र कुरआन कविता और शायरी के मूल से कोई विरोध नहीं रखता, बल्कि उस शायरी की प्रशंसा करता है जो ईमान, सत्य-निष्ठा और समाज के नैतिक व बौद्धिक शिक्षण का कारण बने।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नज़री मुनफरिद ने ईरान के शहर सारी में हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए सूरा-ए-शुआरा की अंतिम आयतों की ओर इशारा किया और कहा कि सतही तौर पर इन आयतों में शेर और शायरों की निंदा दिखाई देती है,

लेकिन शान-ए-नुज़ूल और आयत-ए-इस्तिस्ना  "إِلَّا الَّذِینَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ"
पर ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि कुरआन ने ईमान, हिकमत और सत्य पर आधारित पवित्र शायरी को नकारा नहीं है।

उन्होंने आगे कहा कि सदर-ए-इस्लाम में, बल्कि दौर-ए-जाहिलियत (अज्ञानता के काल) में भी हज़रत अबू तालिब अलैहिस्सलाम और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम जैसे महान शायरों का अस्तित्व मिलता है, जिनके अशआर तौहीद के उच्च विषयों और रिसालत (पैग़म्बरी) के बचाव से भरे हुए हैं। इसी तरह, पैग़म्बर-ए-अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम, हस्सान बिन साबित जैसे शायर का हौसला अफ़ज़ाई किया करते थे ताकि वे अपने अशआर के ज़रिए इस्लाम के बचाव में भूमिका निभाएं।

हौज़ा-ए-इल्मिया के उस्ताद ने ऐतिहासिक घटनाओं में शायरी के गहरे प्रभाव का ज़िक्र करते हुए कहा कि कभी एक शेर या एक मिसरा ऐसा प्रभाव रखता है जो इतिहास के प्रवाह को बदल देता है; जैसा कि जंग-ए-जमल में एक शेर ने आम लोगों को सक्रिय कर दिया, या फ़रज़दक के वे अशआर जिन्होंने इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम की मदह में अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम की वास्तविक पहचान को स्पष्ट कर दिया।

उन्होंने कुमैत असदी, सैय्यद हमीरी और दअबल ख़ज़ाई जैसे शायरों का हवाला देते हुए कहा कि इन बुज़ुर्गों ने अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम के मआरिफ़ से फ़ैज़ हासिल करके ऐसे अशआर की रचना की जिन्हें आइम्मा-ए-मासूमीन अलैहिमुस्सलाम ने सराहा और कुछ मौक़ों पर उन पर रोए भी।

यह बात इस बात की दलील है कि शेर तब निंदनीय होता है जब वह गुमराही के लिए इस्तेमाल हो, लेकिन जो शायरी हक़ (सत्य), हिकमत और ख़ालिस मआरिफ़ वाली हो, वह न सिर्फ़ निंदनीय नहीं बल्कि इबादत के दर्जे में और समाज के शिक्षण का एक शक्तिशाली साधन है।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नज़री मुनफरिद ने कहा कि इस चर्चा का निष्कर्ष यह है कि शेर और शायरी अपने आप में निंदनीय नहीं है; मूल मापदंड उसका रुख़ और उसकी सामग्री है। वह शायर जो अपनी योग्यताओं को इलाही मआरिफ़ के प्रसार, अख़लाक़ (नैतिकता) के प्रचार और हक़ (सत्य) के बचाव के लिए लगाए, वह कुरआन द्वारा बताए गए अपवाद के सही उदाहरण हैं और उनका काम प्रशंसनीय है।

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