मंगलवार 6 जनवरी 2026 - 12:12
दीन की तब्लीग़ और मआरिफ़-ए-दीन की तौज़ीह व तबईन, क़याम-ए-इमाम हुसैन (अ) मक़ासिद की तकमील हैं

हौज़ा / हौज़ा ए इल्मिया की सुप्रीम काउंसिल के सरबराह आयतुल्लाह शब ज़िन्दा दार ने कहा है कि तब्लीग़ और दीनी मआरिफ़ की वज़ाहत, क़ियाम-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बुनियादी मक़ासिद की तकमील का ज़रिया हैं, और मुख़्तलिफ़ मुनासबतों पर मुबल्लिग़ीन का तब्लीग़ी सफ़र क़ुरआन के फ़रमान के ऐन मुताबिक़ है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाह शब ज़िन्दा दार ने एक इंटरव्यू में वाक़ेआ-ए-आशूरा के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर रौशनी डालते हुए कहा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके जानिसार असहाब की तहरीक किसी एक ज़माने या किसी ख़ास साल तक महदूद नहीं है, बल्कि यह इंसानियत की रहनुमाई के लिए तारीख़ में जारी एक आलमी तहरीक है।

उन्होंने कहा कि इस अज़ीम तहरीक के अहदाफ़ हर दौर में मुबल्लिग़ीन के मोहताज हैं, क्योंकि यही अफ़राद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के क़ियाम के मक़ासिद को आगे बढ़ाते और उन्हें मुकम्मल करते हैं। अगर हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा और इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने पैग़ाम-रसानी के ज़रिये इस तहरीक को ज़िंदा न रखा होता, तो कर्बला का वाक़ेआ वक़्त के साथ माद पड़ जाता।

उन्होंने वाज़ेह किया कि अज़ादारी, मजालिस, जुलूस, सीना-ज़नी और दीगर रसूमात-ए-अज़ा दरअसल उसी रास्ते का तसल्सुल हैं, जिसके लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जान की क़ुर्बानी दी।

अरबईन के हवाले से गुफ़्तगू करते हुए उन्होंने कहा कि अरबईन का अज़ीम पैदल मार्च मौजूदा दौर में इस तहरीक का नुमायाँ मज़हर है, और जैसे-जैसे इसमें मुख़्तलिफ़ क़ौमों की शिरकत बढ़ती जाती है, इसकी मुशाबहत हज से ज़्यादा वाज़ेह होती जाती है, जहाँ इबादत के साथ-साथ उम्मत को एक-दूसरे से जोड़ने का पहलू भी नुमायाँ है।

उन्होंने ज़ियारत-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर इस्लामी तालीमात में दी गई ख़ुसूसी तवज्जो का ज़िक्र करते हुए कहा कि यह सब इस अज़ीम वाक़ेआ और उसके बुलंद मक़ासिद को ज़िंदा रखने के लिए है।

आयतुल्लाह शब ज़िन्दा दार के मुताबिक़, अज़ादारी का एक पहलू फ़र्द की इस्लाह है, जिससे दिल पाक होता है और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम से मुहब्बत मज़बूत होती है, जबकि दूसरा पहलू समाजी और तहज़ीबी है, जो मुआशरे को बेदार और मुत्तहिद रखता है।

आख़िर में उन्होंने कहा कि दीनी मदरसों की असल ज़िम्मेदारी तब्लीग़ है, और क़ुरआन की आयत «फ़लौला नफ़र…» की रोशनी में दीन की मआरिफ़त हासिल करना उसी मक़सद की तम्हीद है। उन्होंने ज़ोर दिया कि मुहर्रम और सफ़र आज भी इस्लाम की ज़िंदगी के सुतून हैं, और उन्हें ज़िंदा रखना एक अज़ीम दीनी फ़रीज़ा है।

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