हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , बुशहर के इमाम ए जुमआ हुज्जतुल इस्लाम महमूद कारगर ने आज दोपहर के लोगों को संबोधित करते हुए रसूल-ए-अकरम स.ल.व. की एक हदीस हज़रत अबूज़र ग़िफ़ारी (सल.) के हवाले से बयान की। उन्होंने कहा कि अल्लाह की हिफ़ाज़त और मदद पाने के लिए ज़रूरी है कि इंसान अपनी निजी और सामाजिक ज़िंदगी में अल्लाह के हुक्मों पर अमल करे।
इमाम जुमआ ने कहा कि एक मोमिन इंसान को हर समय खुद को अल्लाह की हाज़िरी में महसूस करना चाहिए। जब इंसान यह समझ लेता है कि अल्लाह हर समय उसे देख रहा है, तो उसके काम और फैसले इलाही रंग में ढल जाते हैं और उसकी ज़िंदगी ईमान और तक़वा के रास्ते पर चलने लगती है।
उन्होंने हदीस के इस हिस्से को समझाते हुए कहा आसानी के समय अल्लाह को पहचानो, तो मुश्किल के समय अल्लाह तुम्हें पहचान लेगा।और बताया कि बहुत से लोग सिर्फ़ परेशानी के वक्त अल्लाह को याद करते हैं, जबकि पैग़म्बर-ए-इस्लाम स.ल.व. की तालीम यह है कि सुकून और खुशहाली के दिनों में भी अल्लाह को मस्जिद और इबादत से रिश्ता मज़बूत रखा जाए ताकि कठिन समय में अल्लाह की मदद मिले।
हुज्जतुल इस्लाम कारगर ने तवक्कुल और दुआ की अहमियत पर ज़ोर देते हुए कहा कि अपनी ज़रूरत सबसे पहले अल्लाह से मांगनी चाहिए।
अगर किसी इंसान या साधन से मदद ली जाए, तो भी दिल का भरोसा अल्लाह पर होना चाहिए, क्योंकि दुनिया के सारे काम अल्लाह की मर्ज़ी और तक़दीर से होते हैं।
उन्होने दुश्मनों की मानसिक धमकियों और कठिन हालात का दोबारा ज़िक्र करते हुए कहा कि सब्र और डटे रहना ही कामयाबी की कुंजी है। दुश्मनों का डर फैलाना और बाहरी दबाव लोगों के ईमान को डगमगाने न पाए, क्योंकि अल्लाह का वादा है कि सब्र के साथ मदद होती है, और हर मुश्किल के बाद आसानी ज़रूर आती है।
उन्होंने कहा कि असली बे-नियाज़ी अल्लाह की दी हुई रोज़ी पर क़नाअत में है। जो इंसान अल्लाह की रोज़ी पर राज़ी रहता है, वही सबसे ज़्यादा बे-नियाज़ होता है। चाहे उसके पास ज़ाहिरी साधन कम हों, उसके दिल में सुकून और अंदरूनी अमीरी होती है।
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