हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , मुफ़स्सिर ए क़ुरआन और मुमताज़ आलिम-ए-दीन आयतुल्लाहिल जवादी आमोली ने अपने एक ख़िताब में इमाम-ए-ग़ाइब के मानने वालों और इमाम-ए-क़ाइम के असली मुंतज़िरीन" के फ़र्क़ को वाज़िह करते हुए बेहद अहम नुक्तात बयान फ़रमाए।
उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि हज़रत इमाम-ए-असर (अ.ज.) का ज़ुहूर और अद्ल-ए-मेंहदवी पर आधारित हुकूमत का क़ियाम सख्त जद्दोजहद और क़ुर्बानियों के बगैर मुमकिन नहीं होगा क्योंकि ताग़ूती ताक़तें और बातिल के इल्मबरदार अद्ल व हक़ के पैग़ाम को आसानी से क़बूल नहीं करेंगे और आप (अ.ज.) के ख़िलाफ़ सफ़ आरा होंगे। लिहाज़ा आप (अ.ज.) का क़ियाम ईसार, जेहाद और क़ुर्बानी के साथ शुरू होगा।
आयतुल्लाह जवादी आमोली के बयान के मुताबिक़, दौर-ए-ग़ैबत में वही अफ़राद असली मुंतज़िर कहलाने के मुस्तहिक़ हैं जो एक तरफ़ कुरआन करीम की इस आयत के मिस्दाक़ हों,
الَّذینَ یَذکُرونَ اللهَ قِیامًا وقُعودًا وعَلی جُنوبِهِم ویَتَفَکَّرونَ فی خَلقِ السَّماواتِ والاَرض"
(आले-इमरान: 191)
यानी वह हर हाल में ख़ुदा को याद करने वाले फ़िक्र व तदब्बुर करने वाले और दुआ व मुनाजात से अनस रखने वाले हों; और दूसरी तरफ़ हदीस-ए-शरीफ़ "लियुइद्दन्ना अहदुकुम लिखुरूजिल क़ाइमि व लौ सहमन" (यानी तुम में से हर एक को चाहिए कि इमाम क़ाइम (अ.ज.) के खुरूज के लिए तैयारी करे, अगरचे एक तीर ही क्यों न हो) के मुताबिक़ हमेशा जेहाद व नुसरत के लिए आमादा रहने वाले हों।
उन्होंने वाज़िह किया कि वह ज़ाहिद और इबादत गुज़ार अफ़राद जो जेहाद, जद्दोजहद और दिफा-ए-दीन से कोई ताल्लुक़ नहीं रखते, दरहक़ीकत इमाम-ए-ग़ाइब के मुहिब (चाहने वाले) तो हो सकते हैं, मगर इमाम-ए-क़ाइम के मुश्ताक़ नहीं। क्योंकि जब हज़रत क़ाइम-ए-आले मुहम्मद (स.ल.) क़ियाम फ़रमाएँगे, तो यही लोग सबसे पहले उनकी इन्क़िलाबी हिदायात और जद्दोजहदाना सीरत पर एतिराज़ करेंगे।
उनके मुताबिक़ बाज़ अफ़राद को 'ग़ाइब-ए-आले मुहम्मद (स.स.)' पसंद हैं, न कि 'क़ाइम-ए-आले मुहम्मद (स.)'। हालाँकि असली मुंतज़िर वह हैं जो तक़्वा के साथ-साथ इल्मी और अमली मैदान में भी हाज़िर हों, जेहाद व शहादत के लिए आमादा रहें, दीन की सरहदों और कुरआन व इत्रत के हरम के दिफा के लिए तैयार हों, ग़ैर-ख़ुदा से न डरें और हाथ में अस्लहा रखते हुए भी अहले ज़िक्र व मुनाजात हों।
उन्होंने ताकीद की कि जो शख्स अपने इंतिज़ार की सच्चाई को परखना चाहता है, वह यह देखे कि वह इमाम-ए-ग़ाइब का महज़ चाहने वाला है या इमाम-ए-क़ाइम का सच्चा मुश्ताक़; तभी उसे मालूम होगा कि वह असली मुंतज़िर है या महज़ दावेदार।
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