रविवार 15 फ़रवरी 2026 - 15:53
हौज़ा ए इल्मिया दीन और मआरिफ़ ए इलाही की इल्मी पैदावार का मरकज़ है

हौज़ा / ईरान के हौज़ा ए इल्मिया के प्रमुख आयातुल्लाह अली रज़ा अराफी ने इस्लामी उलूम के दायरे में वैज्ञानिक/शैक्षिक मूल्यांकन के निज़ाम की तश्कील और हौज़ा की महवरियत में “किताब-ए-साल-ए-दीन” को जारी करने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि ये दोनों मंसूबे हौज़ा के अहम और देर से चल रहे प्रोजेक्ट्स हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , ईरान के हौज़ा ए इल्मिया के प्रमुख आयातुल्लाह अली रज़ा अराफी ने क़ुम के मदरसा इमाम मूसा काज़िम (अ) में आयोजित सत्ताईसवें “हौज़ा की किताब-ए-साल” के इंतिख़ाब-शुदा अफ़राद से एक नशिस्त में कुछ अहम प्रोग्रामों और प्रोजेक्ट्स की तरफ इशारा करते हुए कहा कि जब से उन्होंने हौज़ा की जिम्मेदारी संभाली है, उस वक्त से साथियों की कोशिशों से दर्जनों नए प्रोग्राम और इल्मी मंसूबे पेश किए गए, लेकिन उनमें से कुछ अभी तक अमली मरहले तक नहीं पहुंच सके या अधूरे रह गए हैं।

उन्होंने कहा कि इन अहम प्रोग्रामों में से एक इस्लामी उलूम में इल्म-संजी का निज़ाम” कायम करना है। आज मुल्क में दीनी किताबों की जांच और दर्जाबंदी के कुछ तरीके मौजूद हैं, लेकिन इस्लामी उलूम के मैदान में इल्मी पैदावार की सही जांच और दर्जाबंदी का मुकम्मल निज़ाम मौजूद नहीं है। यह काम खुद हौज़ा ए इल्मिया की क़ियादत में होना चाहिए।

हौज़ा ए इल्मिया दीन और मआरिफ़ ए इलाही की इल्मी पैदावार का मरकज़ है

आयतुल्लाह आराफी ने कहा कि हौज़ा ए.इल्मिया दीन और मआरिफ़-ए-इलाही की इल्मी पैदावार का असली मरकज़ है। इसलिए ज़रूरी है कि हौज़ा इस्लामी उलूम के लिए अपने ख़ास मयार और दर्जाबंदी का निज़ाम खुद तैयार करे और उसे लागू करे।

जिस तरह दुनिया के अलग-अलग मैदानों में इल्मी दर्जाबंदी के निज़ाम मौजूद हैं, उसी तरह इस्लामी उलूम में भी यह काम हौज़ा की इब्तिकार और मुदीरियत से होना चाहिए।

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