हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,दरभंगा/बिहार। दफ़्तर नुमाइंदगी आयतुल्लाहिल उज़मा सीस्तानी द०ज़ि० लखनऊ के ज़ेरे एहतेमाम, उलेमा व मुबल्लिग़ीन बिहार की जानिब से मकतब हुसैनिया चंदन पट्टी में "रविश ए तबलीग़" के उनवान से जलसा मुबल्लिग़ीन ज़ेरे सदारत हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद अशरफ़ अली अल-गरवी नुमाइंदा आयतुल्लाहिल उज़मा सीस्तानी द०ज़ि० मुनअकिद हुआ।
जिस में मौलाना सैयद मुहम्मद ज़कर्रिया, मौलाना शाह यक़ीन हैदर, मौलाना ग़ुफ़रान रज़ा, मौलाना तस्लीम रज़ा, मौलाना सैयद कल्बे हुसैन, मौलाना सैयद इतरत हुसैन नदीम, मौलाना सैयद जावेद अख़्तर, मौलाना सैयद वफ़ा इमाम, मौलाना सैयद जवाद असकरी, मौलाना सैयद मसऊद अब्बास, मौलाना सैयद दिलबर रज़ा, मौलाना सैयद सादिक हुसैन,
मौलाना सैयद मुहम्मद मुस्लिम, मौलाना सैयद शबाब रहबर, मौलाना सैयद नौशाद हुसैन, मौलाना सैयद ज़ीशान अब्बास, मौलाना रहमत अली, मौलाना इब्राहीम, मौलाना सैयद ज़ुहैर अख़्तर जाफ़री, मौलाना ताहिर हुसैन, मौलाना सैयद अली रज़ा अश्तर, मौलाना सैयद नुसरत अली जाफ़री, मौलाना सैयद अहसन नवाब और मोमिनीन ने शिरकत की। जलसे में निज़ामत के फ़राइज़ मौलाना सैयद अली हाशिम आब्दी ने अंजाम दिए।
जलसा अज़ान-ए-मग़रिब से पहले इख़्तिताम पज़ीर हुआ। बाद नमाज़-ए-मग़रिबैन मजलिस-ए-तरहीम बराए ईसाल-ए-सवाब ख़तीबे अब्क़री मौलाना सैयद मुहम्मद मुर्तज़ा जाफ़री ताबा सराह मुनअकिद हुई, जिसे नुमाइंदा ए आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली हुसैनी सीस्तानी मौलाना सैयद अशरफ़ अली अल-गरवी ने ख़िताब फ़रमाया।
मौलाना सैयद अशरफ़ अली अल-गरवी ने सूरह इसरा आयत 78 को सरनामा-ए-कलाम क़रार देते हुए फ़रमाया कि क़ुरआन ने नमाज़ के औक़ात तीन बताए हैं और यही जमअ सलातैन पर क़ुरआनी दलील है। आयत का मज़मून है: “आप ज़वाल-ए-आफ़्ताब से रात की तारीकी तक नमाज़ क़ायम करें और नमाज़-ए-सुब्ह भी, क्योंकि नमाज़-ए-सुब्ह के लिए गवाही का इंतेज़ाम किया गया है।”
मज़ीद वज़ाहत करते हुए उन्होंने इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की हदीस बयान की: "जब सूरज ज़वाल करे तो नमाज़-ए-ज़ुहर व असर का वक़्त आ जाता है और जब सूरज ग़ुरूब हो जाए तो नमाज़-ए-मग़रिब व इशा का वक़्त हो जाता है।"
मौलाना ने सेहाहे सित्ता का हवाला देते हुए बयान किया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने नमाज़-ए-ज़ुहर व असर और इसी तरह मग़रिब व इशा को भी एक साथ अदा फ़रमाया, हालाँकि न दुश्मन का कोई ख़ौफ़ था और न आप सफ़र में थे। इससे वाज़ेह होता है कि जमअ सलातैन न सिर्फ़ शियों में बल्कि अहले सुन्नत के यहाँ भी जायेज़ है।
उन्होंने ताकीद करते हुए फ़रमाया कि हज में तमाम मुसलमान दो नमाज़ें एक साथ पढ़ते हैं। ग़ैर हज में भी जायेज़ है कि इंसान दो नमाज़ें एक साथ पढ़े या फ़ासिला से पढ़े, अलबत्ता अफ़ज़ल यह है कि दो नमाज़ें एक साथ पढ़े।
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