सोमवार 23 फ़रवरी 2026 - 16:45
नहजुल बलाग़ा पर एतराज़ात का जवाब; सैयद रज़ी महान फ़क़ीह और मुफस्सिर थे।रज़ा उस्तादी

हौज़ा / जामेअ-ए-मुदर्रिसीन हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के सदस्य आयतुल्लाह रज़ा उस्तादी ने नहजुल बलाग़ा की एतेबारियत के ख़िलाफ़ उठाए गए शुब्हात को तारीखी शवाहिद की रौशनी में मुस्तरद करते हुए कहा कि इस अज़ीम किताब के मुरत्तिब सैयद रज़ी न सिर्फ़ अदीब और शायर थे, बल्कि एक मुमताज़ फ़क़ीह और अज़ीम मुफस्सिर ए क़ुरआन भी थे।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,जामेअ ए मुदर्रिसीन हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के रुक्न आयतुल्लाह रज़ा उस्तादी ने नहजुल बलाग़ा की सनद और एतेबार के ख़िलाफ़ पेश किए गए शुब्हात को तारीखी दलाइल के साथ रद्द करते हुए तअकीद की कि इस किताब के मुरत्तिब सैयद रज़ी को महज़ अदबी शख़्सियत क़रार देना दुरुस्त नहीं।

नहजुल बलाग़ा के सिलसिले में मुनअक़िद सिलसिला-वार नशिस्तों की इफ़्तिताही तक़रीब में मुहक़्क़िक़ीन और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कलाम से दिलचस्पी रखने वाले अफ़राद की मौजूदगी में आयतुल्लाह रज़ा उस्तादी ने ख़िताब किया। इस नशिस्त का मक़सद नहजुल बलाग़ा पर तहक़ीक़ी मबानी को वाज़ेह करना था।

सैयद रज़ी की इल्मी शख़्सियत;

आयतुल्लाह उस्तादी ने अपनी गुफ़्तगू के पहले हिस्से में सैयद रज़ी की शख़्सियत से मुतअल्लिक़ एक तारीखी ग़लत-फ़हमी की इस्लाह करते हुए कहा कि आम तौर पर उन्हें सिर्फ़ शायर और अदीब समझा जाता है, जबकि हक़ीक़त यह है कि वह अपने ज़माने के जलीलुल-क़द्र फ़क़ीह और मुफस्सिर-ए-क़ुरआन थे।

उन्होंने सैयद रज़ी के फ़िक़ही उस्तादों, उनके फ़तावा और क़ुरआन करीम की दस जिल्दों पर मुश्तमिल तफ़्सीर की तालीफ़ का हवाला देते हुए कहा कि नहजुल बलाग़ा को मुरत्तिब करने में उनकी इल्मी जामेअियत सब पर साबित है।

नहजुल बलाग़ा की सनद और शुब्हात का रद्द
आयतुल्लाह उस्तादी ने इस दावे को भी रद्द किया कि नहजुल बलाग़ा सैयद रज़ी की तरफ़ मंसूब नहीं है। उन्होंने तारीखी शवाहिद पेश करते हुए कहा कि सैयद रज़ी के अपने हाथ से लिखे हुए नुस्ख़े उनकी वफ़ात के कई सदियों बाद तक मौजूद रहे, जिन्हें बुज़ुर्ग उलेमा ने देखा, जिनमें इब्न अबिल-हदीद भी शामिल हैं। यह अम्र खुद इस किताब की सेहत और इंतिसाब की ताईद करता है।

उन्होंने किताब के “मुरसल” होने के शुब्हे के जवाब में वज़ाहत की हैं कि सैयद रज़ी ने अदबी उस्लूब को मलहूज़ रखते हुए असनाद को हज़्फ़ किया, लेकिन बाद के उलेमा ने मुस्तदरकात तहरीर करके इन ख़ुत्बात और मक़तूबात की असनाद को इस्तिख़राज और मुरत्तिब किया है।

मशहूर शरूह पर तनक़ीदी नज़र:

आयतुल्लाह उस्तादी ने अहल-ए-सुन्नत की दो मशहूर शरहों का जायज़ा लेते हुए कहा कि अगरचे मुहम्मद अब्दुह ने नहजुल बलाग़ा को आलम-ए-अरब में मुतआरिफ़ कराने में अहम किरदार अदा किया, लेकिन उनके तरीक़ा-ए-कार पर संजीदा एतराज़ात मौजूद हैं। उनके बक़ौल, जहाँ कहीं अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम का कलाम अहल-ए-सुन्नत अक़ाइद से हम-आहंग न था, वहाँ उन्होंने या तो उसमें तबदीली की या उसे ग़ैर-मुस्तनद क़रार दिया।

इसी तरह इब्ने अबिल हदीद की बीस जिल्दों पर मुश्तमिल शरह को अदबी और तारीखी लिहाज़ से निहायत वक़ीअ क़रार देते हुए कहा कि कलामी और एतिक़ादी पहलू से उसमें तअस्सुबात और इनहिराफ़ात पाए जाते हैं, लिहाज़ा उसका मुतालिआ तनक़ीदी नज़र के साथ होना चाहिए।

कलाम-ए-अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की अज़मत:

आयतुल्लाह उस्तादी ने अकाबिरिन के अक़वाल का हवाला देते हुए कहा कि नहजुल बलाग़ा में हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कलाम फ़साहत व बलाग़त के आला तरीन दर्जे पर फ़ाइज़ है। उन्होंने कहा कि यह कलाम ख़ालिक़ के कलाम से एक दर्जा कम और मख़लूक़ के कलाम से बुलंद-तर है, जो उसकी बे मिसाल अज़मत का वाज़ेह सुबूत है।

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