गुरुवार 26 फ़रवरी 2026 - 11:52
नए शादीशुदा जोड़ों के लिए अयतुल्लाह मज़ाहेरी की अहम नसीहत

हौज़ा / अयतुल्लाह मज़ाहेरी ने कहां,एक इज्तिमाई शादी की तक़रीब के मौक़े पर नए शादीशुदा जोड़ों को अहम और फ़िक्रअंगेज़ नसीहत करते हुए कहा कि निकाह क़ुरआन करीम की नज़र में चार बुनियादी और अहम अबआद (पहलुओं) का हामिल है। अगर इन उसूलों को ज़िंदगी का लायह-ए-अमल बना लिया जाए तो इज़दिवाजी ज़िंदगी पायेदार, बा-मक़सद और बा-बरकत बन सकती है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,अयतुल्लाह मज़ाहेरी ने कहां,एक इज्तिमाई शादी की तक़रीब के मौक़े पर नए शादीशुदा जोड़ों को अहम और फ़िक्रअंगेज़ नसीहत करते हुए कहा कि निकाह क़ुरआन करीम की नज़र में चार बुनियादी और अहम अबआद (पहलुओं) का हामिल है। अगर इन उसूलों को ज़िंदगी का लायह-ए-अमल बना लिया जाए तो इज़दिवाजी ज़िंदगी पायेदार, बा-मक़सद और बा-बरकत बन सकती है।

उन्होंने कहा कि शादी इंसान की ज़िंदगी का एक फ़ैसलाकुन मोड़ है, जिसकी अहमियत इतनी ज़्यादा है कि क़ुरआन करीम ने उसे अपनी निशानियों में शुमार किया है। इरशाद-ए-बारी तआला है:
«وَ مِنْ آیَاتِهِ أَنْ خَلَقَ لَکُمْ مِنْ أَنْفُسِکُمْ أَزْوَاجًا لِتَسْکُنُوا إِلَیْهَا»
यानी अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए तुम ही में से जोड़े बनाए ताकि तुम उनसे सुकून हासिल करो। इस तरह शादी को सुकून व इत्मीनान का ज़रिया क़रार दिया गया है।

आगे उन्होंने वाज़ेह किया कि क़ुरआन ने मियां-बीवी के रिश्ते को मोहब्बत और रहमत का मरकज़ भी बताया है:
«وَ جَعَلَ بَیْنَکُمْ مَوَدَّةً»
यानी अल्लाह ने तुम्हारे दरमियान मोहब्बत पैदा की। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि इज़दिवाजी ज़िंदगी सिर्फ़ एक समाजी मुआहिदा नहीं, बल्कि बाहमी मोहब्बत और रहमत का मज़हर है।

उन्होंने कहा कि तीसरा अहम पहलू नस्ल ए इंसानी की हिफ़ाज़त और बक़ा है। क़ुरआन फ़रमाता है:
«وَ اللّٰهُ جَعَلَ لَکُمْ مِنْ أَنْفُسِکُمْ أَزْوَاجًا وَ جَعَلَ لَکُمْ مِنْ أَزْوَاجِکُمْ بَنِینَ وَ حَفَدَةً»
यानी अल्लाह ने तुम्हारे लिए जोड़े बनाए और तुम्हें औलाद अता की। इस तरह निकाह को नस्ल की बक़ा और फ़ितरी ख़्वाहिश की तकमील का वाहिद मशरू रास्ता क़रार दिया गया है।
चौथा पहलू इफ़्फ़त व पाकदामनी की हिफ़ाज़त है। क़ुरआन करीम में इरशाद है:
«هُنَّ لِبَاسٌ لَکُمْ وَ أَنْتُمْ لِبَاسٌ لَهُنَّ»
यानी तुम एक-दूसरे के लिए लिबास हो। इस ताबीर से मालूम होता है कि मियां-बीवी एक-दूसरे के लिए तहफ़्फ़ुज़, पर्दा और सहारा हैं और एक-दूसरे को गुनाहों और अख़लाक़ी इनहिराफ़ से बचाने का ज़रिया बनते हैं।

आयतुल्लाह मज़ाहेरी ने ताकीद की कि इन्हीं क़ुरआनी उसूलों की बुनियाद पर ख़ानदान का मुक़द्दस इदारा वजूद में आता है, जो मर्द व औरत की फ़ितरी, रूहानी, नफ़्सियाती और जिस्मानी ज़रूरतों का ख़याल रखता है और पूरे मुआशरे की बुनियाद बनता है। अगर ख़ानदान मज़बूत हो तो मुआशरा भी मुस्तहकम और बा-वक़ार होता है।

उन्होंने नए शादीशुदा जोड़ों को नसीहत की कि वह इज़दिवाजी ज़िंदगी के आग़ाज़ से ही इन क़ुरआनी उसूलों को अपना रहनुमा बनाएं, उन्हें हमेशा पेशे-नज़र रखें और क़ुरआन करीम व अहले-बैत अलेहिमुस्सलाम की तालीमात की रौशनी में अपनी ज़िंदगी को तरतीब दें, ताकि उनकी ज़िंदगी अख़लाक़, मआनवियत, पाकीज़ा जज़्बात और बा-मक़सद अहदाफ़ से सरशार हो और दुनिया व आख़िरत की सआदत का ज़रिया बन सके।

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