गुरुवार 26 फ़रवरी 2026 - 14:24
बच्चों की परवरिश में उस्ताद का किरदार  माता-पिता से भी बढ़कर होता है।आयतुल्लाह हुसैनी बुशहरी

हौज़ा / आयतुल्लाह सैयद हाशिम हुसैनी बुशहरी ने कहा है कि तालिब इल्म की दीनी और अख्लाकी तरबियत में एक मुआल्लिम का किरदार बाज़ औकात वालिदैन से भी ज़्यादा प्रभावी साबित होता है, असातिज़ा नई नस्ल की फिकरी और एतेक़ादी तश्कील में मुख्य स्थान रखते हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , क़ुम अल-मुकद्दसा में जामेया मुदर्रेसीन हौज़ा इल्मिया क़ुम के प्रमुख आयतुल्लाह सैयद हाशिम हुसैनी बुशहरी ने मुदीर मदरसा तरबियत हुसैनी हुज्जतुल इस्लाम सैयद अली रज़ा तराशियान और इस संस्थान के ज़िम्मेदारान व तालिबा इल्म जिम्मेदार अधिकारियों और छात्रों से मुलाकात की इस मौके पर आयतुल्लाह हुसैनी बुशहरी ने तालीमी व तरबियती मैदान शैक्षिक और प्रशिक्षण क्षेत्र में इस इदारे की खिदमात (सेवाओं) को सराहा।

उन्होंने कहा कि महदूद वसाइल के बावजूद किसी तालीमी व तरबियती मरकज शैक्षिक और प्रशिक्षण केंद्र का चौदह बरस तक मुसलसल फ़ाइलियत (लगातार गतिविधि) जारी रखना उसके मुंतज़िमीन (प्रबंधकों) की इस्तिक़ामत (दृढ़ता), दर्दमंदी और बुलंद हौसलेगी का सबूत है। उनका कहना था कि दीनी तरबियत के मैदान में मुस्तकिल मिज़ाजी ही असल कामयाबी की बुनियाद है।

क़ुम के इमाम ए जुमआ ने असातिज़ा के किरदार पर रौशनी डालते हुए कहा कि एक मुआल्लिम तालिब इल्म की फिकरी, अखलाकी और दीनी शख्सियत की तामीर (निर्माण) में जो असर छोड़ता है, वह बाज़ औकात वालिदैन के असर से भी बढ़ जाता है, क्योंकि उस्ताद सीधे फिक्र और शऊर (चेतना) की तश्कील करता है।

उन्होंने इस अम्र (बात) की तरफ भी इशारा किया कि दीगर सूबों (प्रांतों) से ख़ानदानों का अपने बच्चों की दीनी तालीम के लिए क़ुम मुंतकिल होना इस बात की अलामत (निशानी) है कि आज भी बहुत से घरानों के नज़दीक मज़हबी तरबियत बुनियादी तरजीह प्राथमिकता रखती है।

मजलिसे खुबरेगाने रहबरी के सदस्य आयतुल्लाह हुसैनी बुशहरी ने तालिबा इल्म को मुखातिब करते हुए कहा कि वह हमेशा इस एहसास के साथ जिंदगी गुज़ारें कि वह खुदा की बारगाह में हाज़िर (उपस्थित) हैं। उनके क़ौल व फेल में खुदा पर ईमान और उसकी रज़ा (प्रसन्नता) की झलक नुमायाँ (स्पष्ट) होनी चाहिए। उन्होंने तालिबा इल्म को नसीहत की कि वह मुश्किलात के सामने साबित क़दम रहें, खुदा की नेअमतों की क़द्र करें और हालात से मरहूब हो कर मैदान खाली न करें।

उन्होंने मज़ीद ताकीद की कि नौजवान नस्ल को दीनी बसीरत के साथ साथ दुश्मन शिनासी भी हासिल करनी चाहिए, ताकि वह उन अवामिल को पहचान सकें जो उन्हें दीन के रास्ते से दूर कर सकते हैं। उनके मुताबिक दीन की तालीम सिर्फ मालूमात हासिल करने का नाम नहीं बल्कि गहरी क़ल्बी वाबस्तगी और अमली इल्तिज़ाम का तक़ाज़ा करती है।

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