शनिवार 7 मार्च 2026 - 23:00
शहादत ने सच कह दिया 

अली (अ.) के शेरों की तारीख़ हमेशा से यही रही है कि वे पनाह नहीं ढूँढते, बल्कि तूफ़ानों का रूख़ करते हैं। वे ख़तरे की आहट सुनकर पीछे नहीं हटते, बल्कि अपने क़दम और मज़बूत कर लेते हैं। दृढ़ता उनका स्वभाव होती है और साहस उनकी पहचान। मेरे रहबर की पूरी ज़िंदगी इसी परंपरा की जीवित व्याख्या थी, और उनकी शहादत ने इस सच्चाई पर हमेशा के लिए मुहर लगा दी।

लेखकःसैयद साजिद हुसैन रिज़वी मोहम्मद

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! कभी-कभी इतिहास के पन्नों पर ऐसे क्षण दर्ज हो जाते हैं जो केवल एक घटना नहीं रहते, बल्कि सच और झूठ के बीच एक स्पष्ट रेखा खींच देते हैं। शब्द, अफ़वाहें और आरोप कुछ समय के लिए माहौल को धुंधला ज़रूर कर देते हैं, मगर चरित्र की रोशनी अंततः उस धुंध को चीरकर सच्चाई को उजागर कर देती है। मेरे रहबर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

लंबे समय तक यह कहा जाता रहा कि वह बंकर में हैं, कहीं छिप गए हैं, दृश्य से ग़ायब हैं। दुश्मन के प्रचार ने तरह-तरह की कहानियाँ गढ़ीं, और कुछ कमज़ोर दिल लोगों ने भी इन बातों को दोहराकर यह धारणा मज़बूत करने की कोशिश की कि शायद वह मैदान से हट गए हैं। मानो यह विश्वास दिलाया जा रहा था कि वह ख़तरों से बचने के लिए परदे के पीछे चले गए हैं।

लेकिन सच को ज़्यादा देर तक छिपाकर नहीं रखा जा सकता। जब समय गवाही देता है तो हर आरोप अपने आप मिट जाता है। मेरे रहबर की ज़िंदगी ख़ुद मैदान की गवाही थी, और उनकी शहादत ने उस गवाही पर मुहर लगा दी।

जब उनकी शहादत की ख़बर आई, तो वास्तव में केवल एक जान की क़ुर्बानी पेश नहीं हुई, बल्कि झूठ के सारे बयान एक ही पल में ढह गए। दुनिया ने देख लिया कि अली (अ.) का शेर बंकर में छिपने वालों में से नहीं था। वह तो हमेशा मैदान में खड़े रहने वालों में से था, वहीं जहाँ ख़तरा होता है, वहीं जहाँ परीक्षा होती है, वहीं जहाँ रहबर अपनी क़ौम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होता है।

अली (अ.) के शेरों की तारीख़ हमेशा से यही रही है कि वे पनाह नहीं ढूँढते, बल्कि तूफ़ानों का रूख़ करते हैं। वे ख़तरे की आहट सुनकर पीछे नहीं हटते, बल्कि अपने क़दम और मज़बूत कर लेते हैं। दृढ़ता उनका स्वभाव होती है और साहस उनकी पहचान। मेरे रहबर की पूरी ज़िंदगी इसी परंपरा की जीवित व्याख्या थी, और उनकी शहादत ने इस सच्चाई पर हमेशा के लिए मुहर लगा दी।

आज उनकी शहादत को केवल एक हादसा कह देना इस घटना की व्यापकता को कम कर देना होगा। दरअसल यह एक स्पष्ट घोषणा है, ऐसी घोषणा जिसने दुश्मन के सारे प्रचार को खामोश कर दिया। वे आवाज़ें जो कल तक कह रही थीं कि रहबर ग़ायब हैं, आज ख़ुद इतिहास के शोर में गुम हो चुकी हैं। क्योंकि चरित्र की सच्चाई हमेशा आरोपों की धूल से ऊपर रहती है, और जो रहबर हक़ की राह में खड़े होते हैं, वे अपनी क़ुर्बानी से ज़माने को सच का आईना दिखा जाते हैं।

आज जब हम इस पूरे परिदृश्य को देखते हैं तो अफ़वाहों की वह सारी धुंध अपने आप छँटती हुई महसूस होती है। सच्चाई पूरी चमक के साथ सामने खड़ी है। दुनिया ने अपनी आँखों से देख लिया कि अली (अ.) का शेर बंकर में छिपने वालों में से नहीं था; वह तो हमेशा मैदान में डटे रहने वालों में से था, और आख़िरकार उसी मैदान में हक़ की गवाही देते हुए अपनी जान न्योछावर कर गया।

ऐ मेरे पालनहार! इस शहादत को केवल एक घटना बनकर न रहने दे, बल्कि इसे बेदारी और जागृति की आवाज़ बना दे। हमारे रहबर के पाक ख़ून को उम्मत की आँखें खोलने का ज़रिया बना दे। दिलों में चेतना  (शऊर) और साहस का ऐसा चिराग़ जला दे कि क़ौम ग़फ़लत की नींद से जाग उठे और हक़ की राह में दृढ़ होकर खड़ी हो जाए।  

परवरदिगार! इस क़ुर्बानी को उम्मत की बेदारी का आग़ाज़ और इमाम-ए-ज़माना (अ.) के ज़ुहूर की प्रस्तावना (मुक़द्दमा) बना दे। हमें उनके सच्चे मददगारों में शामिल फ़रमा और बातिल व ज़ुल्म के सभी महलों को नेस्त-ओ-नाबूद कर दे।  
आमीन।

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