हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, आयतुल्लाह आराफ़ी ने हौज़ा प्रबंधन केंद्र की उपसचिवों की परिषद की बैठक में सभ्यतागत प्रतिरोध और अमेरिका के साथ मुकाबले की संस्कृति को स्पष्ट करने पर जोर देते हुए कहा कि इस बड़े संघर्ष में प्रवेश करना और उसमें बने रहना स्वयं एक बड़ी जीत है, और इसमें रुकने या पीछे हटने की कोई गुंजाइश नहीं है।
हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रमुख ने कहा कि इस सभ्यतागत युद्ध का निकट भविष्य सामान्य शांति या स्थायी युद्धविराम जैसा नहीं दिखता। हम एक ऐसे चरण में पहुँच चुके हैं जहाँ एक तीव्र टकराव मौजूद है, जैसे एक मुक्केबाज़ी हो रही हो। अमेरिका के साथ इस टकराव में पहुँचना एक वास्तविक और निश्चित बात है।
शूरा-ए-निगहबान के सदस्य ने कहा कि इस्लामी क्रांति के प्रारंभ से ही इमाम ख़ुमैनी (र.ह.) के सभी बयान इसी बड़े सभ्यतागत संघर्ष की ओर संकेत करते थे। इस संघर्ष में केवल मौजूद रहना और टिके रहना ही अपने आप में जीत है, और इसे बहुत महत्वपूर्ण समझना चाहिए।
आयतुल्लाह आराफ़ी ने इस जीत के दो पहलू बताए: पहला, इस बड़े संघर्ष और दुनिया की शैतानी शक्ति (अमेरिका) के सामने खड़ा होना ही स्वयं एक बड़ी जीत है। दूसरा, इस संघर्ष में प्रवेश करने के बाद भी हमारे अस्तित्व, पहचान और संस्थागत ढांचे का बने रहना भी एक सफलता है।
उन्होंने कहा कि ये दोनों पहलू किसी भी भौतिक या सैन्य उपलब्धि से अधिक महत्वपूर्ण हैं। और यह प्रक्रिया कठिनाइयों और कष्टों से भरी है और इसके लिए बड़ा जिहाद आवश्यक है। ईरानी जनता और उनके नेतृत्व ने इस स्थिति को स्वीकार किया है।
आयतुल्लाह आराफ़ी ने स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिका के साथ इस सभ्यतागत संघर्ष को रोकने या उससे पीछे हटने की कोई कल्पना स्वीकार्य नहीं है। रास्ता जारी रखना होगा, और बीच में रुकना या लौटना संभव नहीं है।
उन्होंने हौज़ा ए इल्मिया की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि हौज़ा संस्थान और उसके विभिन्न विभागों को दूरदर्शिता, प्रतिरोध, आत्मसम्मान, गरिमा और इस्लाम व क्रांति की प्रतिष्ठा का प्रतीक बनना चाहिए। हमें इस संघर्ष में अग्रणी रहना होगा और समाज में इस स्थिरता और प्रतिरोध की भावना को बनाए रखना होगा।
आयतुल्लाह आराफ़ी ने मुहर्रम और सफ़र के आने वाले महीनो का उल्लेख करते हुए कहा कि इस वर्ष विशेष परिस्थितियाँ हैं और सभी कार्यक्रमों को इन्हीं महीनों के अनुसार व्यवस्थित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि मुहर्रम और सफ़र तथा कर्बला की याद का उपयोग इस संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए सर्वोत्तम रूप में किया जाना चाहिए। इस दौरान जिहादी भावना, आशा और उत्साह को चरम पर पहुँचना चाहिए और युवाओं, समाज और परिवारों को इस मार्ग से जोड़े रखने के लिए उचित योजनाएँ बनाई जानी चाहिए।
मजलिस ए ख़ुबरेगान रहबरी के सदस्य ने कहा कि मैदान में मौजूद रहने और सक्रिय रहने की भावना को निरंतर बनाए रखना आवश्यक है। सभी को इस मार्ग पर दृढ़ता से बने रहना चाहिए और जिहादी तथा प्रचारात्मक भावना को मुहर्रम और सफ़र में अपने चरम पर पहुँचाना चाहिए।
उन्होंने देश भर के हौज़ा हाए इल्मिया और मदरसो को संबोधित करते हुए कहा कि हम और आप सब सत्य और असत्य के महान संघर्ष में खड़े हैं, जो इस्लाम, ईरान, इस्लामी क्रांति, प्रतिरोध धुरी और पूरी उम्मत के भविष्य को निर्धारित करता है। इस स्थिति में किसी भी प्रकार की सुस्ती या लापरवाही स्वीकार्य नहीं है, और इसके लिए हम ईश्वर के समक्ष उत्तरदायी होंगे।
आयतुल्लाह आराफ़ी ने कहा कि मुहर्रम और सफ़र एक अनमोल अवसर हैं, जब हुसैनी आंदोलन के झंडे ऊँचे होते हैं और मस्जिदें, मजलिसें और धार्मिक मंच विद्वानों, शिक्षकों, छात्रों और प्रचारकों की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। इन अवसरों को किसी भी बहाने से खोना नहीं चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि जनता के धार्मिक और क्रांतिकारी जागरण तथा युवाओं की जागरूकता बढ़ाने के लिए हौज़ा को सक्रिय रूप से आगे आना होगा और पूरे देश और विदेश में इस आंदोलन को जारी रखना होगा। विशेष रूप से अर्बईन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रचार अभियान की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
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