हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, जौनपुर के जामिआ इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) सदर इमामबाड़ा में अशरा-ए-मजालिस की पहली मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना सय्यद सफ़दर हुसैन ज़ैदी ने कहा कि कर्बला का वाक़या केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि सत्य, हक़परस्ती और ज़ुल्म के खिलाफ संघर्ष का एक सार्वभौमिक संदेश है, जिसने हर दौर में बातिल शक्तियों को हिला कर रख दिया है।

उन्होंने कहा कि कर्बला ने साबित कर दिया कि हक़ और सच्चाई की ताक़त कभी पराजित नहीं होती। यज़ीद का नाम इतिहास के काले पन्नों में खो चुका है, जबकि हज़रत इमाम हुसैन (अ) का नाम आज भी हक़, न्याय और इंसानियत की पहचान बनकर जीवित है। उन्होंने आगे कहा कि कर्बला की जंग में यही सत्य की ताक़त थी, जिसने हज़रत सलमान फ़ारसी के देश फ़ारस सहित पूरी दुनिया के आज़ादी पसंद लोगों को ज़ुल्म के खिलाफ डटने का साहस दिया।
मौलाना ज़ैदी ने अज़ादारी की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जहाँ अज़ादारी के अनेक धार्मिक, नैतिक और आध्यात्मिक लाभ हैं, वहीं यह सामाजिक सद्भाव, आपसी रिश्तों और एकता का भी प्रभावी साधन है। जब लोग सत्य के संदेश के इर्द-गिर्द एकत्र होते हैं तो उनमें भाईचारे, त्याग और मजलूम की सहायता की भावना विकसित होती है।

उन्होंने कहा कि बिना किसी भेदभाव के आयोजित होने वाली मजलिसें, जुलूस, अलम, ताबूत, नौहा, मातम, सलाम और मर्सिया हमें यह शिक्षा देते हैं कि सबसे अच्छा समाज वही है जहाँ अमीर और गरीब सब मिलकर मजलूम का साथ दें और ज़ालिम के सामने एक मज़बूत दीवार बन जाएँ।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब झूठे प्रचार के माध्यम से सच्चाई को छिपाने की कोशिश की जाती है, तब अज़ादारी के केंद्र एक प्रभावी वैकल्पिक मीडिया की भूमिका निभाते हैं। ये पवित्र सभाएँ सच्चाइयों को जनता तक पहुँचाने और सत्य को फैलाने का बेहतरीन माध्यम हैं।

उन्होंने कहा कि मुहर्रम हमें यह सिखाता है कि सत्य पर डटे रहना ही वास्तविक सफलता है। जब कोई समाज सच्चाई को अपनी पहचान बना लेता है तो दुनिया की कोई ताक़त उसे प्रभावित नहीं कर सकती। अज़ादारी वास्तव में इसी भावना को हर वर्ष ताज़ा करने का नाम है ताकि मानवता हमेशा ज़ुल्म के खिलाफ जागरूक बनी रहे।
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