हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) के उर्दू विभाग द्वारा प्रेमचंद सेमिनार हॉल में “कर्बला की साहित्यिक और समकालीन प्रासंगिकता” विषय पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कर्बला की घटना के ऐतिहासिक, साहित्यिक और सामाजिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

कार्यक्रम की अध्यक्षता दारुल उलूम जामा मस्जिद, मेरठ के शेखुल हदीस मौलाना खुर्शीद ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि हज़रत इमाम हुसैन से मोहब्बत किसी एक फिरके या संप्रदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी उम्मत की साझा धरोहर है। उन्होंने कहा कि पैगंबर-ए-इस्लाम ने अपने अहलेबैत से प्रेम करने की शिक्षा दी है और कर्बला का संदेश केवल याद रखने के लिए नहीं, बल्कि अपने जीवन में अपनाने के लिए है।
कार्यक्रम की शुरुआत बी.ए. ऑनर्स के छात्र मोहम्मद नदीम ने की, जबकि साजिद रब्बानी ने नात पेश की। मुख्य वक्ताओं में मौलाना सैयद अब्बास बाक़री, मुफ्ती मोहम्मद रिज़वान, मौलाना सैयद अम्मार हैदर और मौलाना मोहम्मद जिब्रील शामिल रहे। स्वागत भाषण डॉ. इरशाद सियानवी ने दिया, जबकि संचालन डॉ. इफ्फत ज़किया ने किया और धन्यवाद ज्ञापन आफ़ाक अहमद ख़ान ने प्रस्तुत किया।

विषय का परिचय देते हुए डॉ. इफ्फत ज़किया ने कहा कि कर्बला की घटना सत्य और असत्य के बीच संघर्ष का प्रतीक है। इसने यह साबित किया कि झूठ और अन्याय चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दें, वे सत्य को पराजित नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि सदियों बाद भी कर्बला के नायकों को सम्मान के साथ याद किया जाता है और साहित्य में भी इस घटना का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि कर्बला ने उर्दू साहित्य को गहराई से प्रभावित किया है। विशेष रूप से मर्सिया साहित्य में इसका व्यापक वर्णन मिलता है। उन्होंने बताया कि कर्बला का इतिहास केवल कविता तक सीमित नहीं है, बल्कि दास्तानों, कहानियों, उपन्यासों और गद्य साहित्य में भी प्रमुखता से दर्ज है। उनके अनुसार, जब भी दुनिया में कहीं अन्याय होता है, कर्बला की याद लोगों को संघर्ष और साहस की प्रेरणा देती है।

मौलाना मोहम्मद जिब्रील ने कहा कि इमाम हुसैन का बलिदान अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का सबसे बड़ा उदाहरण है। यदि वे कर्बला में खड़े न हुए होते, तो अन्याय के खिलाफ लड़ने वालों को इतनी बड़ी प्रेरणा नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि आज यज़ीद का नाम इतिहास में अप्रासंगिक हो चुका है, जबकि इमाम हुसैन का नाम सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है।
मौलाना सैयद अम्मार हैदर ने कहा कि कर्बला की एक घटना ने सदियों तक मानव समाज को प्रभावित किया है। इमाम हुसैन का बलिदान केवल मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए था। इसलिए विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग भी उनका सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा कि कर्बला हमें पीड़ित और जरूरतमंद लोगों की सहायता करने की सीख देती है।
मुफ्ती मोहम्मद रिज़वान ने अपने विचार रखते हुए कहा कि जब भी अन्याय और अत्याचार बढ़ेगा, कर्बला की घटना लोगों के सामने उदाहरण बनकर आएगी। उन्होंने कहा कि यह घटना हमें सिखाती है कि किसी भी सत्ता के सामने अन्यायपूर्ण तरीके से झुकना उचित नहीं है। साथ ही, उन्होंने हज़रत ज़ैनब की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने भी अन्याय के विरुद्ध साहसपूर्वक आवाज़ उठाई। उन्होंने मीर अनीस और मिर्ज़ा दबीर के मर्सियों का भी उल्लेख किया, जिनमें कर्बला का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है।

मौलाना सैयद अब्बास बाक़री ने कहा कि कर्बला का इतिहास जितना पढ़ा जाए, उसकी महानता उतनी ही अधिक स्पष्ट होती जाती है। उन्होंने कहा कि कर्बला का प्रभाव केवल उर्दू साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि अरबी, फ़ारसी और अन्य भाषाओं में भी व्यापक रूप से दिखाई देता है। उनके अनुसार, इमाम हुसैन केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि सत्य, साहस और आदर्श चरित्र का प्रतीक हैं। कर्बला का संदेश समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होता जाएगा।
इस अवसर पर डॉ. आसिफ अली, डॉ. ताबिश फ़रीद, तंज़ीर रज़ा अंसारी, अरीबा सरफ़राज़, ताहिरा परवीन, शहनाज़ परवीन, मोहम्मद ईसा राना, मोहम्मद ज़ुबैर, मोहम्मद हैदर, मोहम्मद आबिद अली, मोहम्मद आबिद हैदर, मोहम्मद शमशाद, सईद अहमद सहारनपुरी सहित अनेक गणमान्य नागरिकों और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने कार्यक्रम में भाग लिया।
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