हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के मरकज़ी इमामबाड़ा छोटी कर्बला में मोहर्रमुल हराम के पहले अशरे की मजलिस को ख़िताब करते हुए हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद अब्बास बाक़री ने "इमामत : इलाही जीवन-व्यवस्था" विषय पर खिताब किया। उन्होंने कहा कि आज दुनिया शिया विचारधारा द्वारा प्रस्तुत इमामत व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने लगी है, क्योंकि नुबूव्वत के ख़त्म होने के बाद इस्लाम की रक्षा और सही मार्गदर्शन का एकमात्र प्रभावी तंत्र इमामत ही है।
मौलाना बाक़री ने कहा कि इमामत का सिस्टम मनुष्य को कमाल, सआदत, वास्तविक कल्याण तक पहुँचाने की संपूर्ण गारंटी प्रदान करती है। इस मार्ग पर चलने वाली कौमें कभी भी असत्य और अत्याचारी शक्तियों के सामने सिर नहीं झुकातीं।
उन्होंने कर्बला की घटना को इमामत और विलायत की निरंतरता से जोड़ते हुए कहा कि हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने यज़ीद की बैअत से इंकार करके क़यामत तक के लिए इमामत और विलायत की व्यवस्था की रक्षा की। इमाम आली मक़ाम (अ) का यह ऐतिहासिक रुख़ हक़ और बातिल के बीच हमेशा के लिए एक स्पष्ट मानदंड बन गया।
मौलाना सय्यद अब्बास बाक़री ने हाल के दिनों में ईरान, अमेरिका और इस्राइल के बीच चल रहे तनाव और संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि साम्राज्यवादी शक्तियों ने राह-ए-हुसैनी पर चलने वाली मुस्लिम उम्मत के शहीद नेता हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनेई (र) से बिना किसी शर्त के आत्मसमर्पण करने की मांग की, लेकिन उन्हें वही उत्तर मिला जो चौदह सौ वर्ष पहले इमाम हुसैन (अ) ने यज़ीद को दिया था कि "मुझ जैसा व्यक्ति यज़ीद जैसे व्यक्ति की बैअत नहीं कर सकता।"
मजलिस में बड़ी संख्या में मोमेनीन और अज़ादारों ने भाग लिया तथा मौलाना के पूरे संबोधन को पूरे ध्यान और एकाग्रता के साथ सुना।
इसी दौरान मौलाना सय्यद अब्बास बाक़री ने रात नौ बजे जनपद मुज़फ्फरनगर की प्रसिद्ध मोमिन बस्ती ककरौली में भी मजलिस खिताब की। जनपद मुज़फ्फरनगर मोमिनों और सय्यद परिवारों की प्राचीन तथा घनी आबादी के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है। मोहर्रम और सफ़र के महीनों के दौरान यहाँ की बस्तियों में सय्यद उश शोहदा हज़रत इमाम हुसैन (अ) की अज़ादारी का बड़े पैमाने पर आयोजन किया जाता है।
इस क्षेत्र में दरगाह-ए-आलिया बघरा, जोगीपुरा तथा अन्य ऐतिहासिक इमामबाड़े स्थित हैं, जहाँ देश के विभिन्न भागों से ज़ायरीन और अज़ादार हाज़िरी देने के लिए आते हैं। मोहर्रमुल हराम के दिनों में ये क्षेत्र कर्बला के शहीदो की याद, मजालिसो और धार्मिक आयोजनों का प्रमुख केंद्र बन जाते हैं।
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