हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , उन्होंने हरम-ए-मुतह्हर हज़रत मासूमा स.अ. में आयोजित मजलिस-ए-अज़ा को संबोधित करते हुए शहीद रहबर (र.ह.) के उस कथन का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि "कर्बला अक़्लानियत, हमासा और आतिफ़त का संगम है।
उन्होंने कहा कि यही तीनों तत्व कर्बला के पैग़ाम को हमेशा ज़िंदा रखे हुए हैं। कर्बला में जो कुछ हुआ, वह इज़्ज़त और हमासा की बुनियाद पर था। यहां तक कि ग़म और मुसीबतें भी इज़्ज़त व वक़ार के साथ सहन की गईं। हज़रत ज़ैनब (स.अ.) का इब्ने ज़ियाद की मजलिस में यह फ़रमान कि मैंने ख़ूबसूरती के सिवा कुछ नहीं देखा इसी बुलंद किरदार की दलील है।
उन्होंने कहा कि जब हज़रत ज़ैनब स.अ. ने मैदान-ए-कर्बला में देखा कि इमाम हुसैन (अ.स.) की जान ख़तरे में है और कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं बढ़ रहा, तो वह स्वयं मैदान में पहुँचीं। बाद में कूफ़ा और शाम में अहलेबैत (अ.स.) ने अपने ख़ुत्बों के ज़रिये अक़्लानियत, हमासा और आतिफ़त के माध्यम से लोगों को हिदायत की दावत दी।
इमाम सज्जाद (अ.स.) के कूफ़ा के ख़ुत्बे ने लोगों को रुला दिया, लेकिन इसके बावजूद उनकी ख़ामोशी ने उन्हें इस महान अपराध में शरीक बना दिया। यदि उस समय कूफ़ा के लोग आवाज़ उठाते, तो तारीख़ का रुख़ बदल सकता था।
उन्होंने आगे कहा कि इमाम हुसैन अ.स.अपने छह माह के शहीद बेटे हज़रत अली असग़र (अ.स.) की शहादत और शाम के खंडहरों में तीन वर्षीय बेटी हज़रत सकीना (स.अ.) के दर्दनाक मसाइब के माध्यम से इंसानियत की करुणा को जगाते हैं।
आज फ़िलिस्तीन और लेबनान के मज़लूम बच्चों की तस्वीरें भी उसी ऐतिहासिक आतिफ़त की याद ताज़ा करती हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अक़्लानियत, हमासा और आतिफ़त इन तीनों तत्वों को समाज की हिदायत और बेदारी के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए और इन्हें किसी भी सूरत में कमज़ोर नहीं पड़ने देना चाहिए।
आपकी टिप्पणी