बुधवार 12 अगस्त 2026 - 13:38
28 सफ़र: अमीरुल मोमेनीन की इमामत का आग़ाज़ / एक शोधपरक और विश्लेषणात्मक लेख

इस्लामी इतिहास में 28 सफ़र एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ग़मगीन दिन की हैसियत रखता है। यह दिन रसूले अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा की रहلت-ए-शहादत, हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब की इमामत के आग़ाज़ और हज़रत इमाम हसन मुज्तबा की शहादत की याद से जुड़ा हुआ है। इस दिन के अवसर पर उम्मते मुस्लिमा, विशेष रूप से अहलेबैत से मोहब्बत रखने वाले लोग, अपने आका व मौला हज़रत रसूले ख़ुदा और ख़ानदाने रिसालत की मज़लूमियत और मुसीबतों को याद करते हैं।

लेखक: सय्यदा नाज़िमा हुसैनी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी

मुक़द्दमा

इस्लामी इतिहास में 28 सफ़र एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ग़मगीन दिन की हैसियत रखता है। यह दिन रसूले अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की रहलत ए-शहादत, हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम की इमामत के आग़ाज़ और हज़रत इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम की शहादत की याद से जुड़ा हुआ है। इस दिन के अवसर पर उम्मते मुस्लिमा, विशेष रूप से अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से मोहब्बत रखने वाले लोग, अपने आका व मौला हज़रत रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम और ख़ानदाने रिसालत की मज़लूमियत और मुसीबतों को याद करते हैं।

रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम वह महान हस्ती हैं, जिन्होंने इंसानियत को अज्ञानता के अंधेरों से निकालकर तौहीद, न्याय, नैतिकता और हिदायत की रोशनी प्रदान की। आपकी रहलत के बाद उम्मत की रहनुमाई का सिलसिला हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम के माध्यम से जारी रहा, जबकि आपके नवासे हज़रत इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम ने दीन-ए-इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए बेमिसाल सब्र, बुर्दबारी और क़ुर्बानी पेश की।

1- रसूले अकरम की रहलत

मशहूर शिया रिवायतों के अनुसार 28 सफ़र सन 11 हिजरी को रसूले अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने 63 वर्ष की आयु में शहादत पाई। आपकी मुबारक ज़िंदगी इंसानियत के लिए एक मुकम्मल आदर्श है।

क़ुरआने मजीद आपके मक़ाम को इस तरह बयान करता है:

"वमा अरसल्नाका इल्ला रहमतल लिलआलमीन"

अर्थात हमने आपको तमाम जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा है।

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की पूरी ज़िंदगी तौहीद की तब्लीग़, न्याय की स्थापना, क़ुरआन की शिक्षा और इंसानियत की तरबियत में गुज़री। आपने अपने बाद उम्मत की हिदायत के लिए अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम को हिदायत का केंद्र क़रार दिया।

बीमारी के आख़िरी दिन

रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में आपकी तबीयत बहुत ख़राब हो गई। कुछ रिवायतों के अनुसार 24 सफ़र के बाद बीमारी में शिद्दत पैदा हुई। इसी दौरान आपने अपने क़रीबी और सबसे प्यारे व्यक्ति को बुलाया।

रिवायतों में नक़्ल हुआ है कि जब हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम हाज़िर हुए तो रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने उन्हें अपने पास बुलाया और उनसे विशेष बातचीत फ़रमाई। हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम ने बाद में फ़रमाया कि रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने मुझे ज्ञान के ऐसे अध्याय प्रदान किए, जिनमें से हर अध्याय से आगे एक हज़ार अध्याय खुलते हैं।

यह घटना इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम के सबसे क़रीबी इल्मी वारिस और उम्मत के लिए ज्ञान व हिदायत का स्रोत थे।

2- रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की आख़िरी वसीयतें

रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने अपनी मुबारक ज़िंदगी के आख़िरी पलों में हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम को कई महत्वपूर्ण वसीयतें फ़रमाईं।

शिया रिवायतों में बयान हुआ है कि जिब्रईल अलैहिस्सलाम और अन्य फ़रिश्ते इस वसीयत के गवाह थे। इन रिवायतों में अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम पर आने वाली भविष्य की मुसीबतों और हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम के अधिकारों के छीने जाने की ख़बर भी बयान हुई है।

ये वसीयतें केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी संदेश रखती हैं कि रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम के बाद अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की हिदायत और उनके अधिकारों की हिफ़ाज़त की जाए।

3- रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की तजहीज़ व तकफ़ीन

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की रहलत के बाद हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम ने आपकी तजहीज़ व तकफ़ीन की ज़िम्मेदारी निभाई।

रिवायतों के अनुसार हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम को ग़ुस्ल दिया और नमाज़े जनाज़ा अदा की। आपके सहाबा और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम आपके विसाल के ग़म में डूबे हुए थे।

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की वफ़ात उम्मत के लिए एक बहुत बड़ी आज़माइश थी। जिस हस्ती ने अपनी पूरी ज़िंदगी उम्मत की हिदायत में गुज़ार दी, उनके बाद उम्मत को एक मज़बूत हिदायती व्यवस्था की आवश्यकता थी।

4- रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की तदफ़ीन

हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम ने रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम को उसी स्थान पर दफ़्न करने का निर्णय लिया, जहां आपकी रूह मुबारक क़ब्ज़ हुई थी।

चुनांचे रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम को आपके हुजरे मुबारक में सुपुर्दे ख़ाक किया गया।

यह स्थान आज भी मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र स्थानों में गिना जाता है और मदीना मुनव्वरा आने वाले ज़ायरीन रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की बारगाह में सलाम पेश करते हैं।

5- रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की ज़िंदगी पर एक संक्षिप्त नज़र

हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की विलादते बासआदत मक्का मुकर्रमा में हुई। आपके वालिद हज़रत अब्दुल्लाह आपकी विलादत से पहले या आपकी शुरुआती उम्र में ही दुनिया से रहलत कर गए।

कम उम्र में आपकी वालिदा हज़रत आमिना बिन्ते वहब का भी इंतिक़ाल हो गया। इसके बाद आपकी परवरिश पहले आपके दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब और फिर आपके चचा हज़रत अबू तालिब अलैहिस्सलाम ने फ़रमाई।

25 वर्ष की उम्र में आपका निकाह हज़रत ख़दीजतुल कुबरा सलामुल्लाह अलैहा से हुआ। 40 वर्ष की उम्र में आपको मंसबे रिसालत अता हुआ।

आपने मक्का में 13 वर्षों तक तौहीद और इस्लाम की दावत दी, फिर मदीना मुनव्वरा की ओर हिजरत फ़रमाई। मदीना में लगभग 10 वर्षों तक दीन-ए-इस्लाम की बुनियादों को मज़बूत किया और अंततः 28 सफ़र सन 11 हिजरी को इस दुनिया से रहलत फ़रमाई।

6- हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का ग़म

रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की रहलत हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के लिए एक असहनीय सदमा थी।

आप अपने बाबा की जुदाई में बहुत रोया करती थीं। रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में हज़रत फ़ातिमा अलैहा सलाम को अपने पास बुलाया और उनसे राज़दाराना बातचीत फ़रमाई।

रिवायत के अनुसार आपने अपनी बेटी को ख़बर दी कि अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम में सबसे पहले वही आपसे मुलाक़ात करेंगी। इस ख़ुशख़बरी से हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा का ग़म कुछ कम हुआ।

यह घटना पिता और बेटी के बीच बेमिसाल मोहब्बत और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के रूहानी मक़ाम को दर्शाती है।

7- हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम की इमामत का आग़ाज़

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की रहलत के बाद हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम की इमामत का दौर शुरू हुआ।

शिया अक़ीदे के अनुसार हज़रत अली अलैहिस्सलाम रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम के बाद उम्मत के नियुक्त इमाम और उत्तराधिकारी थे। वाक़ेए ग़दीर में रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने फ़रमाया:

"मन कुन्तु मौलाहु फ़हाज़ा अलीय्युन मौलाहु"

अर्थात जिसका मैं मौला हूं, अली भी उसके मौला हैं।

इसलिए 28 सफ़र हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की इमामत के आग़ाज़ के लिहाज़ से भी एक महत्वपूर्ण दिन है।

इस दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम की ज़ियारत की भी रिवायतों में ताकीद मिलती है।

8- ख़िलाफ़त के ग़स्ब का आग़ाज़

शिया ऐतिहासिक दृष्टिकोण के अनुसार रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की रहलत के तुरंत बाद उम्मत के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा ख़िलाफ़त और उत्तराधिकार का था।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम को रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने विभिन्न अवसरों पर अपना उत्तराधिकारी और वली के रूप में परिचित कराया था, विशेष रूप से वाक़ेए ग़दीर में।

लेकिन रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की रहलत के बाद सक़ीफ़ा बनी साअदा में एक राजनीतिक स्थिति पैदा हुई, जिसके परिणामस्वरूप हज़रत अली अलैहिस्सलाम की ख़िलाफ़त तुरंत स्थापित नहीं हो सकी।

शिया मसलके फ़िक्र में इसे हक़े ख़िलाफ़त के ग़स्ब और वाक़ेए ग़दीर की प्रतिज्ञा को तोड़ने के रूप में याद किया जाता है।

यह विषय इस्लामी इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से है और इस पर सदियों से इल्मी और ऐतिहासिक चर्चा जारी है।

9- इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम की शहादत

28 सफ़र की एक महत्वपूर्ण निस्बत हज़रत इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम की शहादत भी है।

मशहूर शिया मत के अनुसार इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत सन 50 हिजरी में हुई। हालांकि ऐतिहासिक रिवायतों में शहादत की तारीख़ के बारे में मतभेद पाया जाता है। कुछ रिवायतों में 7 सफ़र और कुछ में आख़िरी सफ़र या अन्य तारीख़ें बयान हुई हैं।

इमाम हसन अलैहिस्सलाम, हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के पुत्र और रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम के नवासे थे।

आपकी पूरी ज़िंदगी बुर्दबारी, सहनशीलता, उदारता, इबादत और दीन की हिफ़ाज़त से जुड़ी हुई थी।

10- इमाम हसन अलैहिस्सलाम को ज़हर दिया जाना

रिवायतों के अनुसार इमाम हसन अलैहिस्सलाम को ज़हर दिया गया और आपने लंबे समय तक उस ज़हर की तकलीफ़ बर्दाश्त की।

शिया ऐतिहासिक स्रोतों में जअदा बिन्ते अशअस के माध्यम से इमाम हसन अलैहिस्सलाम को ज़हर दिए जाने और मुआविया की ओर से इस साज़िश में भूमिका निभाए जाने का उल्लेख मिलता है।

हालांकि ऐतिहासिक रिवायतों की विस्तृत बातों में मतभेद भी मौजूद है, इसलिए इस विषय पर चर्चा करते समय विश्वसनीय स्रोतों और रिवायत के दर्जे को सामने रखना आवश्यक है।

इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने अपने भाई हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को अपनी शहादत के बाद के हालात के बारे में वसीयत की और उन्हें सब्र और हिकमत की ताकीद फ़रमाई।

11- इमाम हसन अलैहिस्सलाम की आख़िरी वसीयत

जब इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत का समय क़रीब आया तो आपने अपने भाई हज़रत सय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को वसीयत फ़रमाई कि आपको रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम के निकट दफ़्न करने की कोशिश की जाए, लेकिन अगर इस सिलसिले में ख़ूनरेज़ी का ख़तरा हो तो आपकी वसीयत के अनुसार बक़ीअ में दफ़्न किया जाए।

यह वसीयत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की दूरदर्शिता और उम्मत के ख़ून की हिफ़ाज़त के जज़्बे की एक महान मिसाल है।

आप जानते थे कि दुश्मन किसी भी बहाने से मुसलमानों के बीच ख़ूनरेज़ी करवा सकता है। इसी वजह से आपने अपने भाई को सब्र और टकराव से बचने की वसीयत फ़रमाई।

12- इमाम हसन अलैहिस्सलाम के जनाज़े की तशई

इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आपकी तजहीज़ व तकफ़ीन की।

रिवायतों के अनुसार जब इमाम हसन अलैहिस्सलाम के जनाज़े को रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम के रौज़े मुबारक की ओर ले जाया गया तो वहां कड़ी मुख़ालफ़त सामने आई।

आख़िरकार इमाम हसन अलैहिस्सलाम को उनकी वसीयत के अनुसार जन्नतुल बक़ीअ में हज़रत फ़ातिमा बिन्ते असद सलामुल्लाह अलैहा के क़रीब दफ़्न किया गया।

इमाम हसन अलैहिस्सलाम की तदफ़ीन का वाक़िया इस्लाम के इतिहास का एक अत्यंत दर्दनाक अध्याय है। यह घटना अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की मज़लूमियत और सब्र व इस्तिक़ामत की तस्वीर पेश करती है।

13- इमाम हसन अलैहिस्सलाम की सीरत का संदेश

हज़रत इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम की ज़िंदगी हमें यह शिक्षा देती है कि हक़ की हिफ़ाज़त केवल मैदान-ए-जंग में तलवार उठाने का नाम नहीं है, बल्कि कभी सुलह, कभी ख़ामोशी, कभी सब्र और कभी क़ुर्बानी भी दीन की हिफ़ाज़त का ज़रिया बनती है।

इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने ऐसे दौर में इमामत की ज़िम्मेदारी संभाली, जब हालात बेहद पेचीदा थे। आपने उम्मत के व्यापक हित और दीन की हिफ़ाज़त को प्राथमिकता दी।

इसीलिए इमाम हसन अलैहिस्सलाम की सीरत हमें दूरदर्शिता, सब्र, हिकमत, नैतिकता और त्याग का पाठ पढ़ाती है।

14- 28 सफ़र का केंद्रीय संदेश

28 सफ़र हमें तीन महान वास्तविकताओं की याद दिलाता है:

पहली: रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की रहलत हमें क़ुरआन, सुन्नत और सीरते नबवी से जुड़ने का निमंत्रण देती है।

दूसरी: हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम की इमामत हमें विलायत और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की पैरवी के महत्व को समझाती है।

तीसरी: इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम की शहादत हमें सब्र, हिकमत, क़ुर्बानी और दीन की हिफ़ाज़त का पाठ पढ़ाती है।

समापन

28 सफ़र केवल एक ऐतिहासिक तारीख़ नहीं, बल्कि ईमान, विलायत, मोहब्बत और ज़िम्मेदारी का दिन है।

रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने अपनी पूरी ज़िंदगी इंसानियत की हिदायत के लिए समर्पित कर दी। आपने एक ऐसी उम्मत की बुनियाद रखी, जिसे क़ुरआन, तौहीद, नैतिकता और न्याय का रास्ता दिखाया।

आपके बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इमामत और विलायत की ज़िम्मेदारी संभाली और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम ने अपनी पूरी ज़िंदगी इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए क़ुर्बान कर दी।

हज़रत इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम ने सब्र और हिकमत के माध्यम से दीन की हिफ़ाज़त की और आख़िरकार ज़हर की तकलीफ़ सहते हुए शहादत का जाम नोश फ़रमाया।

इसलिए 28 सफ़र का वास्तविक संदेश यह है कि हम रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम से मोहब्बत को केवल शब्दों तक सीमित न रखें, बल्कि आपकी सीरत को अपनी ज़िंदगी में लागू करें, अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की शिक्षाओं से जुड़े रहें, हक़ और न्याय का साथ दें, सब्र और नैतिकता को अपनाएं और दीन व इंसानियत की सेवा को अपनी ज़िंदगी का उद्देश्य बनाएं।

परवरदिगार हमें रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम की सच्ची मोहब्बत, अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की मारिफ़त, विलायत पर इस्तिक़ामत और उनकी सीरत पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिं व आले मुहम्मद व अज्जिल फ़रजहुम।

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