हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , इस्लामी इतिहास की कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जो किसी एक दौर या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि हर युग में हक़ और बातिल की पहचान का पैमाना बन जाती हैं।
वाक़िआ-ए-कर्बला भी ऐसा ही एक अबदी, फ़ैसला-कुन और तारीख़-साज़ बाब है। इसी तरह कर्बला के बाद मदीना मुनव्वरा पर यज़ीद की फ़ौज का हमला, फिर मक्का मुकर्रमा का मुहासरा और ख़ाना-ए-काबा पर यज़ीदी लश्कर की संगबारी भी तारीख़-ए-इस्लाम का एक अत्यंत दर्दनाक सानिहा है।
यह घटना इस हक़ीक़त को बेनक़ाब करती है कि जब इक़्तिदार ज़ुल्म, जब्र, आमिरियत और दीन-दुश्मनी के साथ मिल जाए, तो न रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की हुरमत महफ़ूज़ रहती है, न बैतुल्लाह की अज़मत बरक़रार रहती है और न ही इंसानी अक़दार तथा दीनी मुक़द्दसात का एहतराम बाक़ी रहता है।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मैदान-ए-कर्बला में अपने मुक़द्दस ख़ून से दीन-ए-इस्लाम की बक़ा की ज़मानत दी। आपकी शहादत के फ़ौरन बाद यज़ीदी हुकूमत ने जो मज़ालिम ढाए, उन्होंने पूरी उम्मत पर यह हक़ीक़त आश्कार कर दी कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का क़ियाम इक़्तिदार हासिल करने के लिए नहीं था, बल्कि दीन-ए-इस्लाम के तहफ़्फ़ुज़, अद्ल के क़ियाम, अम्र बिल-मअरूफ़, नहीं अनिल-मुन्कर तथा ज़ुल्म व इस्तिबदाद के ख़ातमे के लिए था।
इसी वजह से वाक़िआ-ए-आशूरा ने उम्मत-ए-मुस्लिमा के इज्तिमाई ज़मीर को झकझोर कर रख दिया। अहले-मदीना, अहले-मक्का और हिजाज़ के दूसरे इलाक़ों के मुसलमानों ने महसूस किया कि जिस हुकूमत ने फ़र्ज़न्द-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम को बेदर्दी से शहीद किया, वह इस्लामी ख़िलाफ़त की हक़ीक़ी नुमाइंदा नहीं हो सकती।
यज़ीद की हुकूमत शराबनोशी, लह्वो-लअब, ज़ुल्म, बेहयाई, बैतुलमाल की लूट-मार और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से खुली दुश्मनी की अलामत बन चुकी थी। चुनाँचे हिजाज़ के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में अवामी बग़ावतें शुरू हुईं और अहले-मक्का ने भी यज़ीदी कारिंदों को शहर से निकालकर ज़ुल्म व जब्र के ख़िलाफ़ अपने अज़्म, ग़ैरत और इस्तिक़ामत का भरपूर इज़हार किया।
इसी अवामी मुज़ाहमत को कुचलने के लिए यज़ीद ने शाम से एक अज़ीम लश्कर मक्का मुकर्रमा की ओर रवाना किया।
मशहूर मोअर्रिख़ इब्न असीर अपनी प्रसिद्ध किताब अल-कामिल फ़ित-तारीख़ में लिखते हैं कि 26 मुहर्रम 64 हिजरी को यज़ीदी फ़ौज ने मक्का मुकर्रमा का मुहासरा कर लिया। शहर के चारों ओर स्थित ऊँची पहाड़ियों पर बड़ी-बड़ी मिंजनीकें नस्ब की गईं और मक्का मुकर्रमा पर लगातार पत्थर बरसाए गए।
अहले-मक्का अपनी जान बचाने के लिए मस्जिदुल हराम में पनाह लेने लगे, लेकिन लश्कर के सिपहसालार हुसैन बिन नुमैर ने मस्जिदुल हराम और ख़ुद ख़ाना-ए-काबा को भी मिंजनीकों का निशाना बनाने का हुक्म दे दिया। यह मुहासरा तक़रीबन पैंतालीस (45) दिनों तक जारी रहा। (इब्न असीर, अल-कामिल फ़ित-तारीख़, जिल्द 4, सफ़्हा 124)
यह केवल एक तारीख़ी रिवायत नहीं, बल्कि उम्मत-ए-मुस्लिमा के इज्तिमाई ज़मीर पर दर्ज ऐसा गहरा ज़ख़्म है, जिसकी कसक सदियों बाद भी महसूस की जाती है।
क्या यही ख़िलाफ़त थी?
यहाँ तारीख़ ख़ुद कुछ बुनियादी सवाल उठाती है
अगर यज़ीद वाक़ई "अमीरुल मोमिनीन" था, तो उसके लश्कर ने बैतुल्लाह पर संगबारी क्यों की?
अगर वह इस्लाम का मुहाफ़िज़ था, तो मस्जिदुल हराम की हुरमत क्यों पामाल की गई?
अगर उसकी हुकूमत दीनी हुकूमत थी, तो रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के नवासे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शहीद करने, हरम-ए-नबवी मदीना मुनव्वरा पर हमला करने और फिर ख़ाना-ए-ख़ुदा पर हमला करने का क्या जवाज़ था?
तारीख़ का गैर-जानिबदार और मुनसिफ़ाना मुतालेआ इस हक़ीक़त की गवाही देता है कि वाक़िआ-ए-कर्बला, वाक़िआ-ए-हर्रा और मुहासरा-ए-मक्का एक ही ज़ालिमाना फ़िक्र के मुख़्तलिफ़ मज़ाहिर थे।
यज़ीदी फ़िक्र की पहचान:
यज़ीद केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि एक फ़िक्र, एक तर्ज़-ए-हुकूमत और एक ज़ालिमाना निज़ाम-ए-इक़्तिदार की अलामत है। वह फ़िक्र जो सत्ता की ख़ातिर दीन को क़ुर्बान कर दे; वह फ़िक्र जो अहले-हक़ की आवाज़ दबाने के लिए ज़ुल्म और जब्र का सहारा ले; वह फ़िक्र जो उलेमा, मुस्लिहीन और हक़गो अफ़राद को ख़ामोश कर दे; वह फ़िक्र जो ताक़त, दौलत, ज़राए-ए-इबलाग़ (मीडिया) और प्रोपेगेंडा के ज़रिये बातिल को हक़ तथा ज़ुल्म को इंसाफ़ बनाकर पेश करे; और वह फ़िक्र जो सत्ता की हवस में बैतुल्लाह की हुरमत तक पामाल करने से भी गुरेज़ न करे।
इसीलिए यज़ीद इतिहास का एक किरदार बनकर रह गया, लेकिन यज़ीदियत मुख़्तलिफ़ शक्लों में आज भी ज़िन्दा है और हर दौर में नए चेहरों के साथ सामने आती रहती है।
आज की दुनिया और इस्लाम-दुश्मनी:
अगरचे आज ख़ाना-ए-काबा पर मिंजनीकों से पत्थर नहीं बरसाए जा रहे, लेकिन इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुश्मनी ने नई सूरतें इख़्तियार कर ली हैं।
क़ुरआन-ए-मजीद की बे-हुरमती की जाती है। रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की शान-ए-अक़दस में गुस्ताख़ियाँ की जाती हैं। मसाजिद, तालीमी मराकिज़ और दूसरे मुक़द्दस मक़ामात को निशाना बनाया जाता है।
फ़िलस्तीन, बिलख़ुसूस ग़ज़्ज़ा में हज़ारों निहत्ते मर्द, ख़वातीन और बच्चे जंग, मुहासरे, भूख और तबाही का सामना कर रहे हैं।लेबनान, यमन, शाम और दूसरे इलाक़ों में भी बेगुनाह शहरी ज़ुल्म, जंग और बे-इस्तिहकाम की संगीन आज़माइशों से गुज़र रहे हैं।
इसी तरह ईरान पर अमरीका और इस्राईल के हमले, उनके जराइम तथा कुछ तथाकथित मुस्लिम देशों की ख़ियानतें भी यज़ीदी फ़िक्र व किरदार का हिस्सा हैं। आला क़ियादत आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनई र०अ०, अहम ज़िम्मेदारों, निहत्ते शहरियों तथा डेढ़ सौ (150) से अधिक बेगुनाह बच्चियों की शहादत को इस दावे के समर्थन में पेश किया जाता है।
इसी प्रकार इन हमलों और दहशतगर्दी के नतीजे में अनेक फ़ौजी, वैज्ञानिक शख़्सियात और आम शहरी भी शहीद हुए हैं। इन शुहदा और मज़लूमों की क़ुर्बानियाँ यह याद दिलाती हैं कि ज़ुल्म के मुक़ाबले में सब्र, इस्तिक़ामत, बसीरत, इत्तेहाद और हक़ पर साबित-क़दमी ही कामयाबी का रास्ता है।
इस्लाम-दुश्मन क़ुव्वतें मुख़्तलिफ़ ज़रियों से मुसलमानों के दरमियान तफ़रक़ा पैदा करने, उनकी फ़िक्री बुनियादों को कमज़ोर करने और उन्हें अपनी दीनी पहचान से दूर करने की मुसलसल कोशिश कर रही हैं। ऐसे हालात में उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए निहायत ज़रूरी है कि वह क़ुरआन-ए-करीम, सुन्नत-ए-नबवी सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम और मकतब-ए-अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की तालीमात से मज़बूत वाबस्तगी इख़्तियार करे।
अलबत्ता इन जराइम और ख़ियानतों के मुक़ाबले में महज़ जज़्बाती रद्दे-अमल काफ़ी नहीं है, बल्कि इल्म, बसीरत, इत्तेहाद, अख़लाक़, किरदार और अमली जद्दोजहद (कोशिश) भी ज़रूरी है।
उम्मत-ए-मुस्लिमा पर लाज़िम है कि वह ज़ुल्म के ख़िलाफ़ मुत्तहिद होकर आवाज़ बुलंद करे, हर मज़लूम की हिमायत करे, नई नस्ल को अपनी मुस्तनद तारीख़ से रौशनास कराए, इल्मी मैदान में ख़ुद को मज़बूत बनाए और हर क़िस्म की फ़िक्री यलग़ार का जवाब हिकमत, दलील और आला अख़लाक़ के साथ दे।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उम्मत को सिर्फ़ गिरया करना नहीं सिखाया, बल्कि ग़ैरत, बसीरत, इज़्ज़त, आज़ादी, अद्ल, हक़गोई और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ क़ियाम का अबदी दर्स अता फ़रमाया।
आज अहले-क़लम, उलेमा, ख़ुतबा, उस्ताद और दानिश्वरों पर अहम ज़िम्मेदारी आयद होती है कि वे कर्बला, वाक़िआ-ए-हर्रा, मुहासरा-ए-मक्का और इस्लामी तारीख़ के दूसरे अहम वाक़िआत को मुस्तनद मआख़िज़ की रोशनी में नई नस्ल तक पहुँचाएँ, ताकि तारीख़ को मस्ख़ करने की हर कोशिश नाकाम हो जाए।
जो क़ौम अपनी तारीख़ से बेख़बर हो जाती है, वह अपनी पहचान, अपनी तहज़ीब और अपने मुस्तक़बिल से भी महरूम हो जाती है।
मक्का मुकर्रमा का मुहासरा और ख़ाना-ए-काबा पर संगबारी इस्लामी तारीख़ का एक सियाह बाब है, जो यह सबक़ देता है कि जब ज़ुल्म को बेलगाम छोड़ दिया जाए, तो वह कर्बला से लेकर काबा तक किसी हुरमत, तक़द्दुस और इंसानी अज़मत का लिहाज़ नहीं करता।
आज भी यदि उम्मत-ए-मुस्लिमा इज़्ज़त, आज़ादी, वहदत और सरबलंदी की ख़्वाहाँ है, तो उसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पैग़ाम, क़ुरआन-ए-करीम की तालीमात और सीरत-ए-मुहम्मद व आले मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम को अपनी इंफ़िरादी और इज्तिमाई ज़िन्दगी का महवर बनाना होगा।
तारीख़ गवाह है कि तलवारें जिस्मों को ज़ख़्मी कर सकती हैं, मिंजनीकें इमारतों को ढहा सकती हैं और आग ज़ाहिरी निशानियों को जला सकती है, लेकिन हक़ की आवाज़ को कभी ख़ामोश नहीं किया जा सकता।
इसीलिए कर्बला आज भी ज़िन्दा है, बैतुल्लाह आज भी क़िब्ला-ए-आलम है, और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का पैग़ाम आज भी दुनिया के हर आज़ाद इंसान को ज़ुल्म, जब्र और बातिल के मुक़ाबले में इस्तिक़ामत, इज़्ज़त, आज़ादी और हक़ पर साबित-क़दम रहने का अबदी दर्स देता है।
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