हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में इरावानी ने कहा कि ईरान रूस और चीन के उस सिद्धांतगत रुख की सराहना करता है, जिसके तहत दोनों देशों ने प्रस्ताव 2231 पर बैठक आयोजित करने का विरोध किया, क्योंकि इस बैठक का कोई कानूनी आधार नहीं था।
उन्होंने पाकिस्तान और सोमालिया का भी धन्यवाद किया, जिन्होंने बैठक के पक्ष में मतदान नहीं किया। इरावानी ने कहा कि सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 2231 18 अक्टूबर 2025 को अपनी अवधि पूरी कर चुका है, इसलिए अब उसका कोई कानूनी या व्यावहारिक महत्व नहीं रह गया है।
उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव के अंतर्गत स्थापित सभी अधिकार, रिपोर्टिंग दायित्व और प्रक्रियाएँ समाप्त हो चुकी हैं। इसलिए महासचिव की रिपोर्ट, संयुक्त राष्ट्र सचिवालय की ब्रीफिंग और इस विषय पर सुरक्षा परिषद में चर्चा का कोई कानूनी आधार नहीं है।
इरावानी ने कहा कि महासचिव की रिपोर्ट और संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव रोज़मेरी डी कार्लो की ब्रीफिंग, संयुक्त राष्ट्र सचिवालय के अधिकारों और दायित्वों के विपरीत थी।उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रस्ताव 2231 को किसी भी बहाने या प्रक्रिया के माध्यम से प्रभावी बताने का हर प्रयास कानूनी रूप से अमान्य है और यह सुरक्षा परिषद के अधिकारों के दुरुपयोग के समान है।
इरावानी ने कहा कि तथाकथित "स्नैपबैक" (स्वतः प्रतिबंध बहाली) तंत्र पर ईरान का रुख हमेशा स्पष्ट रहा है और इस विषय पर चीन और रूस भी ईरान से सहमत हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने परमाणु समझौते और प्रस्ताव 2231 के तहत अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं, बल्कि ईरान की शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों का भी समर्थन किया।
इसलिए उनके पास ईरान के खिलाफ किसी कानूनी कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं है।इरावानी के अनुसार, वर्तमान संकट की मूल वजह 2018 में अमेरिका का परमाणु समझौते (JCPOA) से एकतरफा हटना, यूरोपीय देशों द्वारा अपने वादे पूरे न करना तथा जून 2025 और 28 फ़रवरी 2026 को ईरान की परमाणु सुविधाओं पर अमेरिका और इज़राइल के हमले हैं।
उन्होंने कहा कि ये हमले संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) तथा बल प्रयोग पर प्रतिबंध के मूल सिद्धांत का खुला उल्लंघन हैं और इससे वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुँची है।
इरावानी ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति स्वयं इन हमलों की जिम्मेदारी स्वीकार कर चुका हैं, जबकि यूरोपीय देशों ने भी इनका समर्थन किया।इसलिए ईरान के खिलाफ उनके आरोपों का कोई नैतिक या कानूनी आधार नहीं है।
उन्होंने दोहराया कि ईरान 1970 से परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का जिम्मेदार सदस्य है, उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और वह हमेशा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में संचालित होता रहा है।इरावानी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने में विफल रही, जिससे अंतरराष्ट्रीय कानून के और अधिक उल्लंघनों को बढ़ावा मिला।
अंत में इरावानी ने कहा कि ईरान अब भी इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन को सद्भावना के साथ लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है, बशर्ते अमेरिका भी अपनी सभी जिम्मेदारियाँ निभाए। यदि वॉशिंगटन अपने उल्लंघन जारी रखता है, तो ईरान भी स्वयं को इस समझौते का पालन करने के लिए बाध्य नहीं मानेगा।
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