हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हिंदुस्तान के मशहूर खतीब ज़ाकिर ए अहलेबैत अ.स.हुज्जतुल इस्लाम सैयद सफ़दर हुसैन ज़ैदी (निदेशक: जामिया इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.), सदर: इमामबाड़ा, जौनपुर से रहबर की तशई के मौके पर एक खुसूसी इंटरव्यू लिया गया जिसमें उन्होंने कहां,शहीद आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनई (1939-2026 ई.) की शहादत केवल एक व्यक्ति का हादसा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक महान ऐतिहासिक मोड़ की हैसियत रखती है। यह वह घटना है जिसने आलमें-ए-इंसानियत के कमज़ोरों और मज़लूमों को हिम्मत व ताक़त बख़्शी और इंक़लाब-ए-इस्लामी को स्थायी स्थिरता प्रदान की हैं।
इंटरव्यू कुछ इस प्रकार है:
हौज़ा न्यूज़ : मौलाना साहब सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह,पहला सवाल यह है कि आज दुनिया के सामने रहबर की शहदत को केवल एक व्यक्तिगत घटना नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक मोड़ क्यों कहा जा रहा है?
मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी सहाब : यह शहादत किसी एक व्यक्ति की शहदत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है जिसने वैश्विक स्तर पर इंसाफ़, प्रतिरोध और मज़लूमों की आवाज़ को नई ताक़त दी। इसके बाद उत्पन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रभावों ने इसे एक व्यापक मानवीय घटना का स्वरूप प्रदान किया हैं।
हौज़ा न्यूज़ :रहबर-ए-मुअज़्ज़म के विचार में "शहादत की संस्कृति" का वास्तविक अर्थ क्या है?
मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी सहाब : उनके दृष्टिकोण में शहादत केवल युद्ध में प्राण न्योछावर करने का नाम नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, ईश्वरभक्ति और मानवता के लिए सर्वोच्च त्याग का प्रतीक है। यह संस्कृति व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठाकर समाज और मानवता की सेवा के लिए प्रेरित करती है तथा नैतिक और आध्यात्मिक जागरण का माध्यम बनती है।
हौज़ा न्यूज़ :समाजशास्त्रीय और राजनीतिक दृष्टि से इस शहादत का सबसे बड़ा प्रभाव क्या माना जाता है?
मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी सहाब : समाजशास्त्रीय दृष्टि से इस घटना ने सामूहिक चेतना, सामाजिक एकजुटता और वैचारिक प्रतिबद्धता को मज़बूत किया। राजनीतिक स्तर पर इसे प्रतिरोध की विचारधारा, राष्ट्रीय एवं धार्मिक पहचान तथा अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के संकल्प को नई ऊर्जा देने वाली घटना के रूप में देखा गया हैं।
हौज़ा न्यूज़ :उम्मत-ए-मुस्लिमा और दुनिया के मज़लूमों पर इस शहादत का क्या प्रभाव पड़ा?
मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी सहाब : इस घटना ने अनेक लोगों के भीतर एकता, आत्मविश्वास और प्रतिरोध की भावना को प्रोत्साहित किया। समर्थकों के अनुसार इससे दुनिया भर के मज़लूमों को नैतिक साहस मिला और न्याय के लिए संघर्ष को एक नई वैचारिक प्रेरणा प्राप्त हुई।
हौज़ा न्यूज़ :नई पीढ़ी और युवाओं के लिए इस शहादत का क्या संदेश है?
मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी सहाब : नई पीढ़ी के लिए इसका संदेश यह है कि जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, नैतिकता और समाज की भलाई के लिए ज़िम्मेदारी निभाना भी है। युवाओं को ज्ञान, चरित्र, सेवा और त्याग की भावना के साथ भविष्य का निर्माण करने की प्रेरणा मिलती है।
हौज़ा न्यूज़ :शिक्षा और मनोविज्ञान के क्षेत्र में शहीद हस्तियों की क्या भूमिका हो सकती है?
मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी सहाब : शैक्षणिक दृष्टि से ऐसी हस्तियाँ आदर्श चरित्र के रूप में प्रस्तुत की जा सकती हैं, जिनके जीवन से ईमानदारी, नेतृत्व, अनुशासन, धैर्य और समाज सेवा जैसे मूल्यों की शिक्षा मिलती है। मनोवैज्ञानिक रूप से वे कठिन परिस्थितियों में भी उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं।
हौज़ा न्यूज़ :शहादत की संस्कृति को समाज में जीवित रखने में मीडिया, साहित्य और कला की क्या भूमिका है?
मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी सहाब : मीडिया, साहित्य, फ़िल्म, कविता, चित्रकला और अन्य सांस्कृतिक माध्यम शहीदों के विचारों और मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रभावी साधन बन सकता हैं। साथ ही शहीद परिवारों के सम्मान, ऐतिहासिक दस्तावेज़ीकरण और सकारात्मक सामाजिक मूल्यों के प्रचार में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
हौज़ा न्यूज़ :आपके विचार में इस शहादत की सबसे बड़ी और स्थायी विरासत क्या है?
मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी सहाब : इस शहादत की सबसे बड़ी विरासत यह मानी जाती है कि सत्य, न्याय, नैतिकता और मानव गरिमा के लिए संघर्ष करने वाले विचार समय और स्थान की सीमाओं से परे जीवित रहते हैं। यदि इन मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक सही रूप में पहुँचाया जाए, तो यह विरासत समाज में जागरूकता, आत्मबल और न्यायप्रियता को लंबे समय तक प्रेरित करती रहेगी।
हौज़ा न्यूज़ : आपका बहुत-बहुत शुक्रिया मौलाना साहब, आपके विचारों से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला और आपने युवाओं को एक संदेश दिया
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