हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मुहर्रम की सातवीं तारीख को शहर की विभिन्न इमामबारगाहों में इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों की याद में मजलिसों, मातमी जुलूसों और नोहाख्वानी का सिलसिला जारी रहा। इस अवसर पर अधिकतर मजलिसों में शहजादा कासिम (अ.स.) की शहादत का मार्मिक वर्णन किया गया।
लाला बाजार स्थित इमामबारगाह छोटी कर्बला में आयोजित अशरे की मजलिस में मौलाना सैयद अब्बास बाकरी ने "इमामत : ईश्वरीय जीवन व्यवस्था" विषय पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जैसे इंसानी जीवन को अतीत, वर्तमान और भविष्य के संदर्भ में समझा जाता है, उसी प्रकार शिया विचारधारा के इतिहास में भी कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। उन्होंने बताया कि पैगंबर-ए-इस्लाम की हिजरत के बाद ग़दीर-ए-ख़ुम की घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहां अल्लाह के आदेश पर हज़रत अली (अ.स.) को पैगंबर के उत्तराधिकारी और मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
मौलाना ने कहा कि ग़दीर और कर्बला का आपस में गहरा संबंध है। ग़दीर नेतृत्व और इमामत की घोषणा का प्रतीक है, जबकि कर्बला उस नेतृत्व और मूल्यों की रक्षा के लिए दी गई सर्वोच्च कुर्बानी का नाम है। उन्होंने कहा कि यज़ीद ने ईश्वरीय व्यवस्था की अवहेलना करते हुए सत्ता पर अधिकार कर लिया और इमाम हुसैन (अ.स.) से अपनी अधीनता स्वीकार करने की मांग की, जिसे इमाम ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया।
उन्होंने कहा कि कर्बला का मूल संदेश अन्याय के विरुद्ध डटकर खड़े होना है। इमाम हुसैन (अ.स.) ने अत्याचार के सामने झुकने के बजाय सत्य और न्याय की राह में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। मौलाना ने कहा कि आज भी जो समाज कर्बला के आदर्शों को अपनाता है, वह कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों पर कायम रह सकता है।
मजलिस के अंतिम चरण में मौलाना बाकरी ने हज़रत इमाम हसन (अ.स.) के सुपुत्र हज़रत कासिम (अ.स.) की शहादत का भावुक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि कम उम्र में ही कासिम (अ.स.) ने कर्बला के मैदान में बहादुरी और सब्र की मिसाल कायम की। इस दर्दनाक प्रसंग को सुनकर उपस्थित अकीदतमंद गहरे शोक में डूब गए। सोज़ख्वानी की जिम्मेदारी सुहैल काज़मी ने निभाई।
नमाज़-ए-जौहरैन के बाद अज़ाखाना शाह कर्बला वक्फ मंसबिया में आयोजित मजलिस में मौलाना मुज़फ्फर हुसैन ज़ैदी ने "इमामत और कुरान" विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने संबोधन में हज़रत कासिम (अ.स.) और हज़रत अली अकबर (अ.स.) की शहादत का उल्लेख करते हुए उनके अद्वितीय त्याग और साहस को याद किया। इस दौरान माहौल पूरी तरह गमगीन रहा और श्रद्धालुओं ने अश्कबार होकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
मजलिस के उपरांत हज़रत कासिम (अ.स.) और हज़रत अली अकबर (अ.स.) के प्रतीकात्मक ताबूत निकाले गए, जिनके साथ अंजुमन दस्ता-ए-हुसैनी ने मातम किया। बड़ी संख्या में लोगों ने उपस्थित होकर अहलेबैत के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
मुहर्रम कमेटी की मीडिया प्रभारी डॉ. इफ्फत जकिया ने जानकारी दी कि मगरिब की नमाज के बाद जुलूस-ए-जुल्जनाह छत्ता अली रज़ा, वैली बाजार से प्रारंभ हुआ। यह जुलूस विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए अज़ाखाना शाह कर्बला पहुंचकर संपन्न हुआ। जुलूस के संयोजक अली हैदर (चांद) थे। इस अवसर पर शहर की विभिन्न मातमी अंजुमनों ने नोहाख्वानी और सीनाजनी की, जबकि बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने जुलूस में भाग लेकर कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
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