रविवार 12 जुलाई 2026 - 10:21
शहीद रहबर ने उम्मत-ए-इस्लामिया को प्रतिरोध की बुलंदियों तक पहुँचाया।हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अलीरज़ा पनाहियान

हौज़ा / मशहद के पवित्र हरम ए इमाम रज़ा (अ.स.) में आयोजित शहीद रहबर की याद में आयोजित श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अलीरज़ा पनाहियान ने कहा कि शहीद रहबर की सबसे बड़ी विरासत इस्लामी समाज की बौद्धिक और आध्यात्मिक परवरिश है। उन्होंने कहा कि शहीद रहबर ने अपने नेतृत्व से केवल राजनीतिक मार्गदर्शन ही नहीं किया, बल्कि उम्मत के भीतर जागरूकता, दूरदर्शिता और धार्मिक विवेक को भी मजबूत किया हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , मशहद के पवित्र हरम ए इमाम रज़ा (अ.स.) में आयोजित शहीद रहबर की याद में आयोजित श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अलीरज़ा पनाहियान ने कहा कि शहीद रहबर की सबसे बड़ी विरासत इस्लामी समाज की बौद्धिक और आध्यात्मिक परवरिश है। उन्होंने कहा कि शहीद रहबर ने अपने नेतृत्व से केवल राजनीतिक मार्गदर्शन ही नहीं किया, बल्कि उम्मत के भीतर जागरूकता, दूरदर्शिता और धार्मिक विवेक को भी मजबूत किया हैं।जिसके परिणामस्वरूप ईरान और प्रतिरोधी मोर्चा पहले से अधिक संगठित और दृढ़ हुआ।

उन्होंने कहा कि किसी ईश्वरीय नेता का प्रभाव केवल उसके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी शहादत के बाद भी उसका संदेश और व्यक्तित्व समाज को प्रेरित करता रहता है। उनके अनुसार शहीद रहबर की शहादत ने इस्लामी जगत में एक नई वैचारिक चेतना और आध्यात्मिक जागरण पैदा किया है। आज लाखों लोगों की श्रद्धांजलि और प्रतिरोध के समर्थन में दिखाई देने वाली एकजुटता इसी प्रभाव का प्रमाण है।

पनाहियान ने कहा कि वास्तविक धार्मिक नेतृत्व केवल भाषणों से नहीं होता, बल्कि वह लोगों के दिलों और विचारों को बदल देता है। उन्होंने मरहूम आयतुल्लाह बहजत के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार इमाम खुमैनी (र.) की आध्यात्मिक शक्ति ने लोगों को क्रांति के लिए प्रेरित किया था, उसी प्रकार शहीद रहबर ने एक जागरूक, साहसी और प्रतिरोधी राष्ट्र का निर्माण किया। उन्होंने कहा कि शहादत के बाद ऐसे महान व्यक्तित्वों का प्रभाव और भी व्यापक हो जाता है।

अपने संबोधन में उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इस्लाम में सबसे महत्वपूर्ण तत्व 'अक्ल' अर्थात विवेक और बुद्धिमत्ता है। उन्होंने कहा कि ईमान, इबादत, अहलेबैत (अ.स.) से प्रेम, दुआ, कुरआन का पाठ और नैतिकता तभी मूल्यवान हैं जब वे विवेक और समझ पर आधारित हों। उनके अनुसार पैग़म्बरों और उनके उत्तराधिकारियों का मुख्य उद्देश्य समाज की बुद्धि और दूरदर्शिता का विकास करना है, न कि केवल बाहरी धार्मिक रस्मों का विस्तार।

पनाहियान ने उन विश्लेषणों को खारिज किया जिनमें इस्लामी क्रांति और शहीद रहबर के समर्थन को केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया बताया जाता है।

उन्होंने कहा कि लाखों लोगों की लगातार मौजूदगी, प्रतिरोध के समर्थन और बलिदान की भावना यह सिद्ध करती है कि यह आंदोलन गहरी धार्मिक और राजनीतिक समझ पर आधारित है। यदि यह केवल भावनाओं का परिणाम होता, तो इसमें इतनी स्थिरता, अनुशासन और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती।

उन्होंने कुरआन की विभिन्न आयतों का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह ने हमेशा मोमिनों की सहायता और अत्याचारियों की योजनाओं को विफल करने का वादा किया है। इसी विश्वास के आधार पर इमाम खुमैनी (र.ह.) ने कहा था कि "अमेरिका कुछ नहीं बिगाड़ सकता", और शहीद रहबर ने भी इसी दिव्य दृष्टिकोण के साथ इस्लामी गणराज्य की शक्ति और आत्मविश्वास को मजबूत किया।

उन्होंने कहा कि दुश्मन के अपराधों का जवाब देने की मांग भावनात्मक नहीं, बल्कि राष्ट्र की गरिमा, सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए आवश्यक और विवेकपूर्ण नीति है।

अपने संबोधन के अंत में पनाहियान ने कहा कि इमाम रज़ा (अ.स.) का पवित्र हरम हमेशा से विलायत, जिहाद और अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध का केंद्र रहा है। उन्होंने कहा कि शहीद रहबर का इस पवित्र स्थान के निकट दफ़्न होना इस ऐतिहासिक परंपरा का प्रतीक है।

उन्होंने शहीद रहबर की शहादत पर इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.), उनके परिवार और समस्त इस्लामी उम्मत को संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि जनता की अभूतपूर्व भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि प्रतिरोध, विलायत और शहादत का मार्ग आगे भी पूरी शक्ति के साथ जारी रहेगा।

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