रविवार 12 जुलाई 2026 - 23:57
शबीह साज़ी नहीं, इंसान साज़ी की ज़रूरत है

यह सवाल सिर्फ़ एक जुमला नहीं, बल्कि हमारे इज्तिमाई ज़मीर से किया जाने वाला एक संजीदा सवाल है। हम आख़िर कहाँ जा रहे हैं? हमारी मंज़िल क्या है? हम किस सिम्त गामज़न हैं? बनाम-ए-अकीदत, बनाम-ए-अज़ादारी और बनाम-ए-हुसैन (अ.) हम क्या कुछ कर रहे हैं, और क्या कुछ करना भूल चुके हैं?

लेखकः मौलाना तक़ी अब्बास रिज़वी कलकत्तवी
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! यह कौन सी अकीदत का इज़हार है?

यह सवाल सिर्फ़ एक जुमला नहीं, बल्कि हमारे इज्तिमाई ज़मीर से किया जाने वाला एक संजीदा सवाल है। हम आख़िर कहाँ जा रहे हैं? हमारी मंज़िल क्या है? हम किस सिम्त गामज़न हैं? बनाम-ए-अकीदत, बनाम-ए-अज़ादारी और बनाम-ए-हुसैन (अ.) हम क्या कुछ कर रहे हैं, और क्या कुछ करना भूल चुके हैं?

हर गुज़रते ज़माने के साथ हमारी अज़ादारी के मज़ाहिर तो बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन क्या हमारे अंदर *शऊर-ए-हुसैनी* भी उसी रफ़्तार से परवान चढ़ रहा है? इज्तिमाआत वसीअ हो रहे हैं, जुलूस तवील हो रहे हैं, इंतिज़ामात शानदार होते जा रहे हैं, मगर क्या हमारी क़ौम इल्म, किरदार, इत्तेहाद, अख़लाक़, तालीम, मआशियत और समाजी शऊर में भी आगे बढ़ रही है? अगर नहीं, तो फिर हमें रुककर अपने आप से यह सवाल ज़रूर करना चाहिए कि कहीं हम मक़सद से दूर और वसाइल में तो नहीं उलझ गए?

हज़रत इमाम हुसैन (अ.) ने कर्बला में सिर्फ़ एक मआरका नहीं लड़ा था, बल्कि एक ऐसी फ़िक्री, अख़लाक़ी और इंसानी तहरीक की बुनियाद रखी थी, जिसका मक़सद इंसान को बेदार करना, उम्मत की इस्लाह करना, ज़ुल्म के मुक़ाबले में कलिमा-ए-हक़ बुलंद करना और समाज में अद्ल, इंसाफ़, दियानत, इज़्ज़त-ए-नफ़्स और इंसानी करामत को ज़िंदा करना था। कर्बला सिर्फ़ एक तारीखी वाक़िआ नहीं, बल्कि हर दौर के इंसान के लिए एक ज़िंदा दरसगाह है।

मेरे नौजवानो!

मुल्क व समाज के बदलते हुए सियासी, समाजी, फ़िक्री और तहज़ीबी हालात इस बात के मुतक़ाज़ी हैं कि हम इमाम हुसैन (अ.) के मक़ासिद-ए-क़ियाम, तालीमात, इरशादात और सीरत-ए-तय्यिबा को अपनी ज़िंदगी का अमली मंशूर बनाएँ। आज क़ौम को ऐसे नौजवानों की ज़रूरत है जो सिर्फ़ जज़्बाती वाबस्तगी न रखते हों, बल्कि शऊर, बसीरत, इल्म, किरदार और एहसास-ए-ज़िम्मेदारी के साथ मैदान-ए-अमल में उतरें।

हमें अपनी क़ौम व मिल्लत की बिगड़ती हुई दीनी, तालीमी, अख़लाक़ी, मआशरती, मआशी और सियासी सूरत-ए-हाल पर संजीदगी से ग़ौर करना होगा। हमारी नई नस्ल तालीम में क्यों पीछे रह गई? हमारी सफ़ों में इत्तेहाद की जगह इंतिशार क्यों पैदा हो गया? हमारे इदारे कमज़ोर क्यों हो गए? हमारे नौजवान बे-मक़सद क्यों होते जा रहे हैं? हमारी अज़ादारी इन सवालात का जवाब तलाश करने का ज़रिया क्यों नहीं बन रही?

मुहर्रम व सफ़र का अस्ल पैग़ाम यही है कि इंसान अपने आप को बदले, अपने घर को बदले, अपने समाज को बदले और अपनी क़ौम के मुस्तक़बिल की तामीर का अज़्म करे। अगर ये दो मुक़द्दस महीने भी हमें अपनी कमज़ोरियों का एहसास न दिला सकें, तो फिर साल के बाक़ी महीनों से क्या उम्मीद रखी जा सकती है?
आज ज़रूरत इस बात की नहीं कि हम मुहर्रम व सफ़र को सिर्फ़ ज़ाहिरी मज़ाहिर, रस्मों और शबीहसाज़ी तक महदूद रखें, बल्कि इन मुक़द्दस अय्याम को *तक़दीरसाज़ी, किरदारसाज़ी, इंसानसाज़ी, क़ौमसाज़ी और मआशरासाज़ी* की एक मुस्तक़िल तहरीक बना दें।

हर मजलिस सिर्फ़ मसाएब सुनाने की मजलिस न हो, बल्कि इल्म, फ़िक्र, आगाही और बसीरत का मरकज़ भी बने। हर जुलूस सिर्फ़ अकीदत का इज़हार न हो, बल्कि नज़्म-ओ-ज़ब्त, इत्तेहाद, ख़िदमत और समाजी ज़िम्मेदारी का अमली नमूना भी हो। हर आँसू सिर्फ़ ग़म की अलामत न रहे, बल्कि अपने किरदार की इस्लाह, अपने ज़मीर की बेदारी और अपनी ज़िंदगी को हुसैनी उसूलों के मुताबिक़ ढालने का अहद भी बने।

यह भी एक तल्ख़ हक़ीक़त है कि कभी-कभी हम रस्मों के तहफ़्फ़ुज़ में इतने मशग़ूल हो जाते हैं कि मक़ासिद हमारी निगाहों से ओझल हो जाते हैं। याद रखिए! जब मक़सद कमज़ोर हो जाता है, तो रस्में भी अपनी रूह खो बैठती हैं। इमाम हुसैन (अ.) ने हमें रस्मपरस्ती नहीं, बल्कि मक़सदपरस्ती का दरस दिया है। आपने हमें यह सिखाया कि बातिल के साथ मुआहिदा नहीं, बल्कि हक़ पर इस्तिक़ामत ही मोमिन की पहचान है।

यहीं एक बात पूरी वज़ाहत के साथ अर्ज़ करना ज़रूरी है। मजालिस-ए-अज़ा, जुलूस-ए-अज़ा, मातम, मर्सिया, नौहा और दीगर शआइर-ए-हुसैनी हमारी दीनी और मज़हबी शनाख़्त का अहम हिस्सा हैं। ये अहले-बैत (अ.) से मुहब्बत के ज़िंदा मज़ाहिर हैं। इनका एहतराम, तहफ़्फ़ुज़ और फ़रोग़ हर साहिब-ए-ईमान की ज़िम्मेदारी है। इन शआइर की अहमियत से किसी भी ज़ी-शऊर इंसान को इंकार नहीं हो सकता।

लेकिन सवाल यह है कि क्या हमने इन शआइर के साथ उनके अस्ल मक़ासिद को भी ज़िंदा रखा है?

क्या हमारी मजलिसों से इल्म बढ़ रहा है? क्या हमारे नौजवान बसीरत हासिल कर रहे हैं? क्या हमारे जुलूस समाज में अख़लाक़, नज़्म, इत्तेहाद, ख़िदमत और क़ानून-पसंदी का पैग़ाम दे रहे हैं? क्या हमारी अज़ादारी ज़ुल्म, बदउनवानी, जहालत, फ़िर्क़ापरस्ती, ख़ुराफ़ात और हर क़िस्म के फ़िक्री व अमली इनहिराफ़ के ख़िलाफ़ एक मज़बूत दीवार बन रही है?

अगर जवाब नकारात्मक है, तो हमें दूसरों पर उँगली उठाने से पहले अपने गिरिबान में झाँकना होगा। हमें अपने आप से पूछना होगा कि क्या हम इमाम हुसैन (अ.) के नाम पर सिर्फ़ एहसासात का इज़हार कर रहे हैं, या उनकी फ़िक्र, सीरत और पैग़ाम को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा भी बना रहे हैं?
इमाम हुसैन (अ.) ने सिर्फ़ आँसू हासिल करने के लिए क़ुर्बानी नहीं दी थी, बल्कि ऐसे इंसान तैयार करने के लिए क़ुर्बानी दी थी जो हक़ के अलमबरदार हों, अद्ल के पासबान हों, मज़लूम के हिमायती हों, इल्म के तलबगार हों, अख़लाक़ के पैकर हों और ख़ुदा के बंदों की ख़िदमत को अपनी ज़िंदगी का मक़सद समझते हों।

आज हमें ऐसे ही हुसैनी नौजवानों की ज़रूरत है; ऐसे नौजवान जो मस्जिद और इमामबाड़े से भी वाबस्ता हों और मदरसे, स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी से भी; जो मेहराब की रूहानियत भी रखते हों और मआशरे की तामीर का शऊर भी; जो इबादतगुज़ार भी हों और अमानतदार भी; जो अज़ादार भी हों और अपने किरदार से इमाम हुसैन (अ.) के हक़ीक़ी पैरोकार भी।

आज हमारी क़ौम को ऐसे नौजवानों की ज़रूरत है जो डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, वकील, साइंटिस्ट, एडमिनिस्ट्रेटर, सहाफ़ी, कारोबारी और सियासी क़ियादत के मैदानों में भी इमाम हुसैन (अ.) के अख़लाक़ और किरदार की नुमाइंदगी करें। क्योंकि कर्बला सिर्फ़ मस्जिद और इमामबाड़े का पैग़ाम नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी का निज़ाम है।

अगर हमने इस मुहर्रम व सफ़र में सिर्फ़ अज़ादारी की, लेकिन अज़ादारी के पैग़ाम को अपनी ज़िंदगी में नाफ़िज़ न किया, तो ख़दशा है कि आने वाले बरसों में हमारे इज्तिमाआत तो बढ़ते जाएँगे, मगर हमारी इज्तिमाई क़ुव्वत कमज़ोर होती जाएगी। हमारी तादाद बढ़ेगी, लेकिन असर घटता जाएगा। हमारे जुलूस लंबे होंगे, लेकिन हमारी नस्लें कमज़ोर होती जाएँगी। हमारी आवाज़ें बुलंद होंगी, लेकिन हमारा किरदार ख़ामोश होता जाएगा। फिर हमारे पास हसरत, पशेमानी और *कफ़-ए-अफ़सोस मलने* के सिवा कोई चारा नहीं बचेगा।

आइए! इस साल हम एक नया अहद करें।

हम शबीह साज़ी नहीं, तक़दीर साज़ी* का सफ़र शुरू करें।

हम हुजूम जमा करने के बजाय इंसान तैयार करें।

हम सिर्फ़ तादाद न बढ़ाएँ, बल्कि मयार बुलंद करें।

हम सिर्फ़ याद-ए-हुसैन (अ) का चिराग़ न जलाएँ, बल्कि फ़िक्र-ए-हुसैन की रौशनी अपने घरों, अपने बच्चों, अपने तालीमी इदारों, अपनी मस्जिदों, अपने इमामबाड़ों और अपनी समाजी व क़ौमी ज़िंदगी में भी फैलाएँ।

अपने नौजवानों को सिर्फ़ मातम करना न सिखाएँ, बल्कि उन्हें इल्म हासिल करना, किरदार बनाना, क़ौम की ख़िदमत करना, वक़्त की क़दर करना, इत्तेहाद पैदा करना, इंसाफ़ के लिए खड़ा होना और ज़ुल्म के मुक़ाबले में डट जाना भी सिखाएँ। यही इमाम हुसैन (अ) की तालीम है, यही कर्बला का पैग़ाम है और यही अज़ादारी की रूह है।

याद रखिए! किसी भी क़ौम की तक़दीर मजलिसों की तादाद से नहीं, बल्कि उन मजलिसों से पैदा होने वाले शऊर, किरदार, इल्म, अमल और इत्तेहाद से बदलती है।

जिस दिन शआइर-ए-हुसैनी के साथ शऊर-ए-हुसैनी भी ज़िंदा हो जाएगा, जिस दिन अज़ादारी के साथ इल्म, अख़लाक़, अमल, तामीर, ख़िदमत और क़ौमी बेदारी भी जुड़ जाएगी, उसी दिन हमारी अज़ादारी अपने हक़ीक़ी मक़सद को पा लेगी, हमारी क़ौम अपना खोया हुआ वक़ार दोबारा हासिल कर लेगी और कर्बला का पैग़ाम तारीख़ की किताबों से निकलकर हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाएगा।

यही इमाम हुसैन (अ) से हक़ीक़ी वफ़ादारी है।
यही अज़ादारी की रूह है।
यही कर्बला का पैग़ाम है।
और यही हमारी दुनिया और आख़ेरत की कामयाबी का रास्ता है।

"बेशक अल्लाह किसी क़ौम की हालत नहीं बदलता, जब तक वह ख़ुद अपनी हालत बदलने का इरादा न करे।" (सूरह अर-रअद: 11)

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha